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साहित्य, संगीत और ललित कला के पर्याय

प्रकाशन :गुरूवार, 15 सितम्बर 2011
तरुण कुमार दाधीच

गुरुदेव टैगोर का जन्म7 मई 1861 ई. को जोडासाँको कलकत्ता में हुआ। पिता देवेन्द्र नाथ टैगोर और माता शारदा देवी की चौदहवीं संतान को शैशव काल से ही उच्च कोटि के संस्कार मिले। इसका मुख्य कारण यह था कि उन दिनों उनके पिता के घर जाने-माने साहित्यकारों, शिक्षाविदों, संगीतज्ञों, शिल्पकारों और विद्वानों का आना-जाना लगा रहता था। इन गणमान्य लोगों का गहरा प्रभाव रवीन्द्रनाथ पर पडा। वे बचपन से ही प्रखर बुद्धि के थे। उनमें बौद्धिक प्रतिभा के साथ-साथ आध्यात्मिक चिन्तन की धारा भी प्रकाशित होने लगी। परिणामस्वरूप उनका बहुमुखी व्यक्तित्व विश्व के समक्ष आने लगा।

वर्तमान परिवेश में साहित्य, संगीत, कला एवं शिक्षा के प्रति रवीन्द्रनाथ टैगोर का योगदान उल्लेखनीय एवं महत्त्वपूर्ण पक्ष है। उनका मानना था कि बौद्धिक या वैचारिक दासता, राजनीतिक दासता से कहीं अधिक भयानक है। उनका आग्रह था कि हमें शिक्षा के दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना होगा। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो हमारी भाषा और जीवन के साथ हमारे हृदय में उठने वाले भावों का ठीक तरह से उचित समन्वय कर सके।

टैगोर का मानना था कि मनुष्य हृदयवृत्ति के माध्यम से अपने व्यक्तित्व का विकास कर पाता है। इस हृदयवृत्ति का विकास कला शिक्षा के सहयोग से ही सम्भव है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली में कला शिक्षा के लिए स्थान नहीं है। इसके अभाव में हमारी कर्म शक्ति कमजोर पड जाती है। अतएव वर्तमान शिक्षा प्रणाली में कला शिक्षा की आवश्यकता है।

टैगोर का यही चिन्तन शांति निकेतन का साकार रूप लिए है! वास्तव में देखा जाय तो शांति निकेतन की स्थापना करके टैगोर ने साहित्य, संगीत, ललित कला एवं शिक्षा सम्बन्धी अपनी परिकल्पना को असली रूप दिया। आज यह बहुउद्देशीय विश्वविद्यालय है। ऐसा कोई अन्य संस्थान स्थापित नहीं होने से आज शांति निकेतन की प्रासंगिकता बढ गई है। अपने जापान प्रवास के पश्चात् टैगोर का बहुउद्देशीय शिक्षा के प्रति चिन्तन स्पष्ट है - ’’यदि बौद्धिक युग में तपोवन हो सकते हैं, बौद्ध युग में नालन्दा और विक्रमशीला की स्थापना हो सकती है तो हमारे युग में वैसा क्यों नहीं हो सकता ? मैं मंगलमय उच्च आदर्श से अनुप्राणित होकर इस संकल्प को साकार रूप देने चला हूँ। हमारे लिए यही एक मात्र मुक्तिपथ है। अब तक हमने सच्ची शिक्षा की जो अवमानना की है, उसका दाग धो डालने का यही मात्र उपाय भी है।‘

‘ वास्तव में टैगोर का चिन्तन उच्चकोटि का था क्योंकि जब व्यक्ति उच्च मानव मूल्यों के धरातल पर पहुँचने लगता है तो समाज में व्याप्त आज की अनेक निम्न स्तर और घटिया प्रवृत्तियों पर स्वतः अंकुश लगना सम्भव हो पाता है। देश के उत्थान के लिए मानव मूल्यों की स्थापना वर्तमान की महत्त्वपूर्ण जरूरत है। शांति निकेतन के विश्व भारती विश्वविद्यालय में कला भवन की स्थापना करते समय राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण अभिहित थे। बहुउद्देशीय शिक्षा के विषय में टैगोर का यह साकार योगदान आज के हलचल भरे युग में सर्वाधिक प्रासंगिक है।

टैगोर जीवन भर साहित्य के प्रति समर्पित रहे। 1873 में 12 वर्ष की अल्पायु में टैगोर कविताएँ लिखने लगे। इसी वर्ष उन्होंने ’पृथ्वीराज पराजय‘ नाटक लिखा और शेक्सपीयर के प्रसिद्ध नाटक ’मैकबेथ‘ का बंगला में अनुवाद किया। उनका ध्यान संस्कृत के जयदेव और मैथिली के विद्यापति जैसे वैष्णव कवियों की रचनाओं के अध्ययन की ओर भी गया। परिणामस्वरूप उन्होंने इन कवियों की भावभूमि पर अनेक कविताएँ रच डालीं। प्राचीन कवियों के नामों के अनुरूप उन्होंने अपना नाम भानु सिंह रखा और उन्हें काफी प्रसिद्धि भी मिली। 14 वर्ष की आयु में कविता के साथ-साथ गद्य साहित्य के कहानी, उपन्यास आदि अन्य विधात्मक रूपों के लेखन की तरफ भी ध्यान देना शुरू किया। ’तत्त्वबोधिनी‘ पत्रिका के साथ-साथ ’भारती‘ पत्रिका में भी उनकी रचनाएँ प्रकाशित होने लगीं। ’भारती‘ में उनका ’कल्पना‘ नामक उपन्यास धारावाहिक रूप में छपा।

साहित्य लेखन की दृष्टि से रवीन्द्रनाथ टैगोर का चरमोत्कर्ष काल बडी तेजी से उनकी ओर सरका आ रहा था। ’बंग-भंग‘ आन्दोलन से हट जाने के बाद उनका मन देशकाल की सभी प्रकार की संकुचित सीमाओं से ऊपर उठकर विस्तृत मानवता के हित साधन की ओर उन्मुख होने लगा। उनके मन में जो नया भाव बोध जाग गया था, अब वह उनकी रचनाओं में स्पष्ट रूप से प्रकट होने लगा। इसी भाव-भूमि पर उन्होंने ’गोरा‘ और ’नौका डूबी‘ जैसे उपन्यास तो लिखे ही, ’समाज‘ तथा ’पूरब और पश्चिम‘ जैसे उत्कृष्ट निबन्ध भी लिखे। फिर आया 1909-10 का वर्ष। इन वर्षों में उनकी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रचना ’गीतांजलि‘ सर्वप्रथम बंगाली भाषा में प्रकाशित हुई। साथ ही ’अचलायतन‘ और ’राज‘ जैसी उत्कृष्ट रचनाएँ भी प्रकाश में आईं। 1911 में उनका प्रसिद्ध नाटक ’डाकघर‘ प्रकाशित हुआ।

इन रचनाओं के प्रकाशन के साथ ही उनका यश, मान राष्ट्रीय और देशकाल की सीमाओं को पार कर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक फैल गया। अब उनका मन समूचे विश्व की ओर मानव मात्र की समस्याओं के निराकरण की ओर आने लगा। कई रचनाओं के प्रकाशन से यद्यपि टैगोर ने बंग्ला साहित्य में शीर्षस्थ स्थान प्राप्त कर लिया, बंकिम चन्द चटर्जी जैसे साहित्यकारों से भी यह मान्यता प्राप्त कर ली कि यह साहित्याकाश पर उदित सर्वाधिक जगमगाता हुआ सितारा है। फिर भी कुछ तथाकथित विद्वान और साहित्यकार उनके विरोध में डटे रहे। इस बात का दुःख टैगोर के मन में था कि उनकी ’गीतांजलि‘ को जो मान, यश और स्थान मिलना चाहिए, वह समाज और साहित्य में प्राप्त नहीं हो सका। इसी कारण उन्होंने ’गीतांजलि‘ का अंग्रेजी में अनुवाद करना प्रारम्भ कर दिया।

50 वीं वर्षगाँठ पर सम्मान पाने के बाद टैगोर ने अब स्वतंत्र रूप से यूरोप की यात्रा की। इस यात्रा के समय वे अपनी ’गीतांजलि‘ और अन्य रचनाओं का अंग्रेजी अनुवाद अपने साथ ले गए। वहाँ उनकी भेंट आयरलैण्ड के प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि यीट्स से हुई। यीट्स टैगोर की ’गीतांजलि‘ पढकर बेहद प्रभावित हुए। विश्व प्रसिद्ध ’नोबल पुरस्कार सोसायटी‘ के एक सदस्य विख्यात चित्रकार रॉथन स्टीन ने ’गीतांजलि‘ पढी तो उनके मुँह से निकला - ’’इसका रचयिता कोई महाकवि होना चाहिए।‘‘ फिर क्या था - सी.एफ. एण्ड्रयूज जैसे व्यक्तियों ने भी नोबल पुरस्कार देने वाली स्वीडीश अकादमी से ’गीतांजलि‘ के कवि को उस वर्ष का साहित्यिक पुरस्कार देने की सिफारिश कर दी। इस प्रकार1913 में टैगोर को साहित्य के लिए नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया। इस कारण टैगोर ’गीतांजलि‘ के कारण विश्व कवि हो गए और भारत का यह महान् सपूत भारतमय होने के साथ-साथ विश्वमय भी हो गया।

इंग्लैण्ड से अध्ययन करके स्वदेश आकर टैगोर ने साहित्य और संगीत के क्षेत्र में नए-नए प्रयोग करने प्रारम्भ किए। वहाँ से वह मूर की आयरिश रागों की एक सचित्र पुस्तक साथ लाए। पियानो पर बैठकर वे राग छेडते। धीरे- धीरे कई रागों पर उनकी पकड हो गई। एक बार उन्होंने अपने मित्रों को रागें सुनाई तब उनके मित्रों ने कहा - ’’रवि की आवाज अब कैसी हो गई है। अब तो वह विचित्र और विदेशी-सी मालूम होने लगी है। स्वर भी एकदम बदल गया है। मित्रों ने ठीक कहा था। धीरे-धीरे भारतीय और विदेशी संगीत के मिश्रण से टैगोर अब कुछ नई प्रकार की रचनाएँ रचने में प्रवृत्त हुए। वह अब गीतिनाट्य रचने की ओर ध्यान देने लगे। परिणामस्वरूप उनका पहला गीति नाट्य ’वाल्मिकी प्रतिभा‘ नाम से सामने आया। टैगोर ने देशी-विदेशी राग- रागिनियों का मेलकर इस रचना में एक नए संगीत को जन्म दिया।

इस गीतिनाट्य की सफलता और प्रशंसा से प्रेरणा पाकर टैगोर ने ’काल मृगया‘ और ’माया का खेल‘ नामक गीतिनाट्यों की रचना कर डाली। एक बार टैगोर को ’’बैथुल सोसायटी‘ की तरह से उनके एक विशेष उत्सव पर ’संगीत‘ विषय पर एक निबन्ध पढने का निमंत्रण मिला। रेवडेन्ड के.एम. बनर्जी उस आयोजन के सभापति थे। उन्होंने रवीन्द्र की संगीत साधना के बारे में सुन रखा था। पहली बार टैगोर ने जब अपना निबन्ध पढा तो उन्हें खूब प्रशंसा मिली। बीच-बीच में दिए गीतों को सस्वर सुनाने से सुनने वालों पर बडा प्रभाव पडा। कलकत्ता के सभी प्रतिष्ठित और भद्र समाज में संगीत विषयक उनके ज्ञान की चर्चा और प्रशंसा मुक्त कंठ से होने लगी। प्रेरणा और उत्साह मिलने के कारण रवीन्द्रनाथ टैगोर के कदम नई राहें नापने लगे।

टैगोर के जीवन में कला (चित्रकला) का विशेष महत्त्व रहा। टैगोर ने विद्यार्थी जीवन में कहीं कला शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। असाधारण काव्यमयवृत्ति व सूक्ष्म ग्राहक संवेदन क्षमता, उनकी कला के साधन थे, अपनी आयु के 67 वें साल तक उन्होंने चित्रकला की दिशा में कोई विशेष प्रयत्न नहीं किए। वे विश्वविख्यात कवि बन चुके थे और उनकी प्रतिभा काव्य निर्मिति में व्यस्त थी। कविता लिखते समय शब्दों या पंक्तियों को रेखाओं से मिटाने पर जो अकल्पित आकार निर्मिति होती, उसकी ओर ध्यान आकृष्ट होकर कुछ दृश्य कल्पना मग्न होते। इन स्वयंसिद्ध आकारों से वे इतने मोहित हुए कि जिस कविता को लिखते समय जो आकार प्रकट हुए थे, उसका अस्तित्व ही वे भूल गए एवं आकारों के विकास पर उन्होंने ध्यान केन्द्रित किया और उनकी अतियथार्थवादी कला का आरम्भ हुआ। भारतीय कला के इतिहास में यह अभूतपूर्व प्रयोग था।1930 में टैगोर के चित्रों की प्रदर्शनी पेरिस के ’गालेरी पिगाल‘ नामक स्थान पर हुई और प्रदर्शित चित्रों की प्रशंसा हुई। लोगों को आश्चर्य हुआ कि टैगोर न केवल महाकवि हैं बल्कि एक श्रेष्ठ चित्रकार भी हैं। कालान्तर में उनके चित्रों की अनेक प्रदर्शनियाँ आयोजित हुईं।

टैगोर की कला में भिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ साकार हुई हैं। ’थके हुए यात्री‘, ’माँ व बच्चा‘, ’सफेद धागे‘ जैसे चित्रों में मानव जीवन का व्यापक दार्शनिक विचार है तो अंडाकृति मानव शीर्षों में जीवन की गहरी अनुभूतियों से निर्मित अन्तर्मुखीवृत्ति का दर्शन है। ’प्राचीन कानाफूसी‘ जैसे चित्र स्मृति व्याकुल हैं तो दृश्य चित्र प्रकृति की रमणीयता से ओत-प्रोत हैं। सहज स्फूर्त रेखाओं द्वारा निर्मित काल्पनिक प्राणियों में आन्तरिक जीवन का अद्भुत संचार व अमानवीय किन्तु नैसर्गिक भावनाओं का दर्शन है। कुमारस्वामी ने टैगोर की कला के सम्बन्ध में लिखा है कि उनकी मौलिक सहज सिद्ध अभिव्यक्ति असामान्य नित्य युवती प्रतिभा का प्रमाण है।

टैगोर की प्रतिभा बहुमुखी थी। वे केवल कवि, उपन्यासकार, नाटककार एवं कहानी लेखक ही नहीं थे बल्कि एक बडे संगीतज्ञ, चित्रकार, पत्रकार, तत्त्वज्ञानी, अध्यापक, वक्ता एवं अभिनय की कला में प्रवीण थे। मानव महत्त्व के इस पुजारी ने देश-विदेश में भ्रमण करके मानवता को दानवी शक्ति से छुटकारा दिलाने की अमरवाणी सुनाई। सत्य का वह अन्वेषक तो 8 अगस्त1941 को चला गया पर अपने महान् कार्यों में उजागर होकर उनका सत्य हमेशा-हमेशा के लिए मानवता का पथ-प्रदर्शन करता रहेगा। टैगोर के सम्बन्ध में निःसंदेह कहा जा सकता है कि वे साहित्य, संगीत एवं कला के पर्याय थे।

  तरुण कुमार दाधीच

 
         
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