जो लोग नवयुग लाने के पक्षधर हैं,उन्हें ऐक्य-साधना के लिए ही स्वातंत्र्य-साधना करनी होगी – उन्हें यह ध्यान में रखना होगा कि इस साधना से किसी एक जाति की मुक्ति नहीं, सारे मानव की मुक्ति हो ।
रवींद्रनाथ ठाकुर कवि, रचनाकार के रूप में विश्वविख्यात् हैं । यह ख्याति केवल उनकी रचनाओं की वजह से ही नहीं मिली है, बल्कि उन रचनाओं के बहाने उनके वैचारिक चिंतन से ओजपूर्ण कालजयी दर्शन जो सामने आया है, उसकी सदा प्रासंगिकता है । चिंतन व अनुभूति की गहराई की वजह से रवींद्र की वाणी न केवल वंगभूमि पर ख्यात हुई, समूचे भारतवर्ष में अनुगूंजित होकर विश्व साहित्य की धरोहर बन गई । रवींद्र की ऐसी अद्भुत काव्य प्रतिभा के कारण उन्हें `कवींद्र’ की संज्ञा जितनी सार्थक लगती है; अन्य विधाओं की रचनाओं तथा उनके जीवन से जो संदेश मिलता है, वह भारतीय चिंतनधारा को समृद्ध करनेवाला विशिष्ट दर्शन है जिसमें मानवीयता को सर्वोच्च स्थान है । ऐसे चिंतन की प्रतिभा के कारण ‘गुरुदेव’ के रूप में मानते हुए भारतवासियों के दिलों-दिमाग में कवींद्र रवींद्र के प्रति असीमित श्रद्धा प्रकट हो जाती है । रवि बाबू के व्यक्तित्व व उनके विचारों से अभिभूत होकर गांधीजी ने उन्हें ‘गुरुदेव’ का नाम देकर पूर्ण श्रद्धा प्रकट की थी ।
सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक क्षेत्रों के चिंतन को गुरुदेव के दर्शन से बहुत बड़ा योगदान मिला है । परतंत्र भारत में औपनिवेशिक शासकों द्वारा भारतीय संस्कृति व सभ्यता की जो उपेक्षा हो रही थी, उसे सही मायने में समझकर भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को संवर्धित करने की चेतना कवींद्र रवींद्र की भावनाओं की लहरों से उमड़ कर समूचे भारत में फैलने लगी थी । पश्चिमी सभ्यता के उत्कृष्ट मूल्यों के विवेकपूर्ण सम्मिश्रण में ही पूर्वी व पश्चिमी समाजों का हित निहित है । पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण के दौर में उजाला फैलाने की दिशा में कवींद्र रवींद्र की काव्य-चेतना निश्चय ही पतवार की भूमिका निभाने में सक्षम है ।
रवींद्र की रचनाओं के माध्यम से उनके दार्शनिक विराटता अनायास ही उभर आती है । गुरुदेव का भारतीय संस्कृति और सभ्यता पर अटूट विश्वास है । भारत की विराट सांस्कृतिक परंपरा को पश्चिमी सभ्यता के कुछ नकारात्मक मूल्यों के कारण तथा औपनिवेशिक शासकों की राजनीतिक प्रभाव की वजह से जब ठेस पहुँच रहा था, उससे वे बेहद चिंतित थे और चाहते यही थे कि तमाम प्रयासों से उसे पुनःप्रतिष्ठित किया जाए । भारतीय परंपरा में कहीं कोई रूढ़ियाँ नज़र आईं तो उनकी बेहिचक आलोचना की और सभ्यता के एक आदर्शमय रूप को विकसित करने की दिशा में उन्होंने अपनी लेखनी की हर बूंद से प्रयास किया है ।
‘ईश्वर एक’ की परिकल्पना से जुड़कर उन्होंने विभिन्न समुदायों और संप्रदायों की एकता पर ज़ोर दिया । कई विचारक यह मानते हैं कि कवींद्र रवींद्र पर संत कबीर के विचारों का भी प्रभाव रहा है ।
गुरुदेव यह मानते थे कि आजादी का सही अर्थ यही होना चाहिए कि हममें दूसरे के प्रति प्रेम और सहानुभूति हो । उनके विचार में आजादी का मतलब राजनीतिक बंधनों से मुक्ति नहीं, बल्कि दूषित परंपराओं व प्रथाओं से मुक्ति है । पराधीन भारत में जन्म लेने की वजह से परतंत्रता से भारत की मुक्ति की भावना स्वभावतः रवींद्र के मन में उत्पन्न हुई थी और इस दिशा में उन्होंने निर्भीक होकर अपने विचार प्रकट किए थे ।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अस्तित्व में आने पर औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध जो आवाज उठी थी, उसका सही फ़ायदा भारतवासियों को न मिलने पर कवींद्र रवींद्र का मन काफ़ी चिंतित था । कांग्रेस उदारवादियों के हाथों में था, उनकी नीतियों की वजह से अंग्रेजों का शासन भारत में जारी रहने व अंग्रेजों द्वारा भारतीय राष्ट्रीय विचारों की नज़रंदाजी के प्रति रवींद्र के मन में रोष था और पराए शासन में असंख्य भारतवासियों को रोटी, कपड़ा और मकान के लिए भी जूझना पड़ रहा था, इस ओर गौर करते हुए अपने विचारों को प्रकट करने में वे बेहिचक रहे । गुरुदेव का ‘गोरा’ उपन्यास इस दृष्टि वैचारिक क्रांति का एक महत्वपूर्ण कृति रही है । ‘गोरा’ उपन्यास के महत्व के अंकन के बहाने डॉ. रणजीत साहा के ये विचार अवश्य ही अवलोकनीय हैं –
“रवींद्रनाथ ठाकुर ने प्रयत्नपूर्वक राजा राममोहन राय और देवेंद्रनाथ ठाकुर की परंपरा को वृहत्तर मानवीय और वैश्विक संदर्भों से जोड़ा और धर्म की चेतना को सांप्रदायिक या समाज विशेष के संकीर्ण दायरे से बाहर निकलकर उस सामाजिक और जातीय आस्था से सींचा – जिसकी पहली और अनिवार्य इकाई थी – ‘मनुष्य’ । इस मनुष्य की तलाश में उन्हें कहीं भटकना नहीं पड़ा – हाँ, उस धर्मप्रेरित अहंकार की धूल को अवश्य हटाना पड़ा – जिसका नैतिक साहस विरले ही उठा पाते हैं । रवींद्रनाथ ठाकुर ने सर्जनात्मक स्तर पर और साहसपूर्वक और शक्ति बटोरकर और इसके लिए क़ीमत चुकाकर धर्म, समाज और मनुष्य को उसके संकीर्ण दायरे से निकालकर व्यापक परिवृत्त प्रदान किया था । वे ऐसे देवता की आराधना करना चाहते थे – ऐसे एक मंत्र का आह्वान करना चाहते थे – जिसे पाकर ‘गोरा’ (रवींद्रनाथ के उपन्यास का नायक गौरमोहन) जैसा व्यक्ति भी विधर्मी क़रार दिया जाने के बावजूद कह उठा – “आप मुझे उस देवता का मंत्र प्रदान कीजिए – जो हिंदू-मुसलमान, ईसाई और ब्राह्म – सबका समान रूप से हो सके । जिसके मंदिर का द्वार किसी जाति के किसी व्यक्ति के लिए कभी बंद न हों – जो सारे भारतवर्ष के देवता हों ।”
माँ आनंदमयी के रूप में गोरा उसी भव्य मूर्ती का दर्शन करता है और भाव-विह्वल स्वर में बोल उठता है- “जिस माँ को मैं खोजता फिर रहा था – वे तो मेरे घर में पहले से आ बसी थीं । माँ, तुम्हारी कोई जाति नहीं, किसी से भेदभाव नहीं, घृणा नहीं, तुम तो केवल कल्याण और करुणा की मूर्ति हो – तुम भारतवर्ष हो ।” केवल एक हिंदू संतान के रूप में स्वीकार किए जाने को बंधन माननेवाला और इस बंधन से मुक्त होकर गोरा हिंदू-मुसलमान-ईसाई-सबको अपनाकर स्वयं को कहीं अधिक गौरवान्वित और उन्मुक्त मानता है ।” 1
रवींद्र का राष्ट्रवाद तथाकथित राष्ट्रवाद से भिन्न व विशिष्ट था जिसमें हिंदुस्तान को औपनिवेशिक सत्ता से मुक्ति दिलाने का संकुचित लक्ष्य नहीं था मगर भारत की सांस्कृतिक गरिमा की रक्षा के साथ-साथ हिंसात्मक राष्ट्रवाद का विरोध, साम्राज्यवाद का विरोध और स्वाधीनता के बहाने वैश्विक धरातल पर दायित्वपूर्ण नागरिक होने की जिम्मेदारी निभाने की चेतना हर मनुष्य में जागृत हो जाए, यही रवींद्र की कामना थी । रवींद्र के राष्ट्रवाद के संबंध में प्रो. इंद्रनाथ चौधुरी जी के विचार अवलोकनीय हैं – “रवींद्र के राष्ट्रवाद का एक और आधार था, शास्त्रोन्मुख संस्कृत परंपरा, जो पश्चिमी नवजागरण की क्लासिकी ज्ञान के पुनर्जन्म की तरह नहीं था ।
इसमें भारत का वैविध्यमय लोक संबद्ध था और इसके द्वारा रवींद्र के लिए एक शाश्वत भारतीयता से परिचित होना संभव हुआ था । और उनका दूसरा आधार था समाज । एक मानवतावादी सामाजिक आलोचक की तरह रवींद्र ने कहा था कि हिंदू सभ्यता के मूल में समाज है । सन् 1904 में टैगोर ने ‘स्वदेशी’ समाज निबंध में उसकी ताईद की थी ।

उन्हें ऐक्य-साधना के लिए ही स्वातंत्र्य-साधना करनी होगी – उन्हें यह ध्यान में रखना होगा कि इस साधना से किसी एक जाति की मुक्ति नहीं, सारे मानव की मुक्ति हो ।
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