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हिंदीतर प्रांतों के हिंदी-समर्थक

प्रकाशन :बुधवार, 4 जनवरी 2012
डॉ. मनोज श्रीवास्तव

स सच से विमुख नहीं हुआ जा सकता कि हिंदी को राष्ट्रभाषा और राजभाषा के सिंहासन पर आरूढ़ करने के लिए हिंदीतर प्रांतों के अहिंदीभाषी महापुरुषों और विद्वानों ने जितनी प्रखर आवाज़ बुलंद की थी, वैसी आवाज़ हिंदीभाषी सूबों से कभी नहीं उठी। एक लंबी फेहरिस्त है--ऐसे हिंदीतर हिंदी समर्थकों की।सर्वप्रथम, ब्रह्मसमाज के सदस्यों और विशेषतया नवीनचंद्र राय, केशवचंद्र सेन, भूदेव मुखर्जी तथा राजनारायण बोस ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप स्थापित किए जाने पर बल दिया था। इन सभी बंगबंधुओं ने अपनी पुस्तकें हिंदी में प्रकाशित करनी शुरू कीं। यह कार्य उनके लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण था क्योंकि अंग्रेज़ मिशनरी यह सोचते थे कि वे उनके ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार में बाधा पहुँचा रहे हैं। मुंशी नवीन बाबू ने तो हिंदी के प्रसार के लिए भारत-भ्रमण का ही बीड़ा उठा लिया था। वह हिंदी का प्रचार करते हुए पहले पंजाब गए, फिर लाहौर। उन्होंने लाहौर से कुछ हिंदी-पत्रिकाएँ भी निकालीं। उनके अलावा, भूदेव मुखर्जी हिंदी के प्रबल प्रचारक बने तथा उन्होंने बिहार के शिक्षा आन्दोलन में हिंदी का पताका फहराते हुए इसकी वक़ालत राष्ट्र की संपर्कभाषा के रूप में की। गुजरात के महर्षि दयानन्द ने 'सत्यार्थ प्रकाश' की रचना हिंदी में ही की। उन्होंने अधिकतर अपने धर्मोपदेश हिंदी में ही दिए। उनके द्वारा प्रवर्तित 'आर्यसमाज' (1877) की संपर्कभाषा और इसकी सभाओं तथा अधिवेशनों की व्यावहारिक भाषा हिंदी ही थी। उनके योगदान के संबंध में रामगोपाल का कथन बेहद सटीक है,

"...स्वामी दयानन्द ने...अपने हिंदीभाषी अनुयायियों को हिंदी का प्रयोग करने की प्रेरणा दी। उन्होंने हिंदी सीखी और केवल उसे ही अपने व्याख्यानों तथा लेखनी का माध्यम बनाया। ...उनके धर्म-प्रचार से जो अधिक उत्तम चीज़ राष्ट्रीय जीवन को प्राप्त हुई, वह थी राष्ट्रभाषा का प्रचार।"

वह दौर भारत का पुनर्जागरण काल था जबकि हिंदी को राष्ट्रीय विस्तार प्रदान करने के लिए बड़े उत्साह और उदारता के साथ राष्ट्रीय प्रतिबद्धता दर्शाई गई थी। इसे राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठापित करने के लिए निःस्वार्थ प्रयास किए गए थे। भाषण दिए गए थे। नारे बुलंद किए गए थे। यहाँ तक कि गैर-हिंदीभाषियों ने भी हिंदी को राष्ट्रीय मंच पर मुखर करने के लिए जनसामान्य को प्रोत्साहित किया। डॉ0 विनोद कुमार सिन्हा ने गैर-हिंदीभाषियों की हिंदी के प्रति मोहग्रस्तता को बेशक़ीमती बताया है। वह कहते हैं, "हिंदी की गरिमा को अहिंदी भाषियों ने बराबर स्वीकार किया, गुणगान किया, परंतु आश्चर्य और दुःख तो यह जानकर होता है कि स्वयं हिंदी भाषियों ने ही उसकी अवमानना की, उसे शापित और अपमानित किया।"

ऐसे महापुरुषों की एक लंबी फ़ेहरिस्त है। बल्कि, यूँ कहना होगा कि अहिंदीभाषी व्यक्तियों ने ही हिंदी के पक्ष में, हिंदी के लिए ज़्यादा वक़ालत की थी। इनमें राजा राममोहन राय, केशवचंद्र सेन, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, बंकिमचंद्र चटर्जी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, रमेशचन्द्र दत्त, सुभाषचंद्र बोस, गुरुदास बनर्जी जैसी बंगलाभाषी शख़्सियतों ने हिंदी के माध्यम से समूचे राष्ट्र को एकसूत्र में बाँधे जाने का आह्वान किया था। निःसंदेह, उनमें से कुछों के मन्तव्यों को सामने रखना भी समीचीन होगा। बंकिमचन्द्र चटर्जी ने तो यहाँ तक कहा था कि 'भारतबंधु' कहलाने का अधिकारी वही भारतीय होगा जो हिंदी के माध्यम से पूरे राष्ट्र को एकसूत्र में बाँधने का प्रयास करेगा। यह विशेष रूप से उल्लेख्य है कि पुनर्जागरण आन्दोलन के सूत्रधार, राजा राममोहन राय ने 'बंगदूत' (1826) नामक एक हिंदी साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन भी शुरू किया था। वह ज़्यादातर हिंदी में ही बोला और लिखा करते थे। उन्होंने ब्रह्मसमाज के सदस्यों के लिए हिंदी बोलना आवश्यक बताया था। फलस्वरूप, ब्रह्मसमाज का सारा कार्यकलाप हिंदी में ही होता था। इससे शिक्षा के क्षेत्र में अंग्रेज़ी माध्यम को बड़ा धक्का लगा क्योंकि पाठ्यक्रमों में हिंदी माध्यमों को प्राथमिकता मिलने लगी। बंगाल के नेता राजनारायण बोस ने हिंदू महासमिति के घोषणापत्र में यह उल्लेख किया था कि, “³ÖÖ¸üŸÖ¾ÖÂÖÔ के सभी स्थानों के सदस्यगण आपस में बोलचाल और पत्राचार में हिंदी का व्यवहार करें। समिति के सदस्य सब प्रकार से इसकी चेष्टा करेंगे। बंगाल या मद्रास आदि स्थानों को भी जहाँ कि भाषा हिंदी नहीं है, हिंदी सीख लेनी “ÖÖׯü‹…"

यह भी ध्यातव्य है कि ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, सुभाषचन्द्र बोस जैसे बंगाल के हिंदी-प्रेमियों को हिंदी में इतनी महारत हासिल थी कि वे अपने व्याख्यान बंगला के अतिरिक्त हिंदी में भी बड़ी दक्षतापूर्वक दे सकते थे। इतना ही नहीं, जब वे हिंदी कटिबंध में प्रवेश करते थे तो बंगला तो बहुत दूर, वे अंग्रेज़ी तक को दरकिनार कर हिंदी का प्रयोग बेझिझक करते थे। स्वामी विवेकानन्द ने तो काशी के मूर्धन्य शास्त्रकारों से कई शास्त्रार्थ साधारण हिंदी में करके उन्हें कई बार निरुत्तर और मूक बना दिया था। इसी प्रकार लोगों को पागल बना देने वाले 'तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा' जैसे नारे के प्रणेता नेताजी सुभाष हिंदी में अत्यंत भावुकतापूर्ण भाषण दिया करते थे। कहना नहीं होगा कि उन्हें हिंदी वक्तृत्त्व में कितनी दक्षता हासिल रही होगी! बेशक, बंगाली महापुरुषों ने हिंदी को ही प्रचारित-प्रसारित करने पर जोर केवल इस तर्काधार पर दिया था कि इससे अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आज़ादी की लड़ाई को सफ़लतापूर्वक अंजाम दिया जा सकता है, क्योंकि देश की बहुसंख्य जनता हिंदी समझती-बोलती है या समझ-बोल सकती है। किंतु, इसके पीछे उनके उदार दृष्टिकोण को नहीं नकारा जा सकता। वे निश्चित रूप से हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में महिमामंडित करना चाहते थे। वे हिंदी में विद्यमान विश्वजनीन तत्त्वों के कायल थे। इसमें संपृक्त लोकप्रिय भावनाओं के प्रशंसक थे।

लगभग उसी दौर के गुजरात के विद्वानों ने भी हिंदी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित की थी। कन्हैयालाल देसाई, मगनभाई देसाई, काका कालेलकर, बाल गंगाधर तिलक, विनायक वैद्य, भांडारकर, अनन्तशयनम आयंगर, रंगनाथ रामचन्द्र दिवाकर, प्रो0 नागप्पा, के0बी0 मानप्पा, महात्मा गाँधी आदि जैसे अहिंदीभाषी विद्वानों ने मुक्तकंठ से हिंदी की राष्ट्रीय महत्ता को स्वीकार किया था। महात्मा गाँधी हिंदी को हर तरह से अंगीकृत करने की तरफ़दारी मुक्त कंठ से किया करते थे। उन्होंने 20 अप्रैल, 1935 को मध्य प्रदेश (इंदौर) में एक जनसभा में हिंदी की अहमियत को पूरी तबज़्ज़ो दी थी, "हिंदुस्तान को अगर सचमुच एक राष्ट्र बनना है तो चाहे कोई माने या न माने--राष्ट्रभाषा तो हिंदी ही बन सकती है, क्योंकि जो स्थान हिंदी को प्राप्त है, वह किसी दूसरी भाषा को कभी मिल नहीं सकता। हिंदू-मुसलमान दोनों को मिलाकर करीब 22 करोड़ मनुष्यों की भाषा, थोड़े-बहुत हेर-फेर से, हिंदी-हिंदुस्तानी है।"

उन्होंने हिंदी में उन सभी गुणों के विद्यमान होने की चर्चा कई बार की थी जिनके बल-बूते पर हिंदी राष्ट्र का शिरमौर बन सकती थी। उनके अनुसार, हिंदी में वे सभी अनुकूल तत्व मौज़ूद हैं ताकि,

1. उसे सरकारी कर्मचारी/अधिकारी आसानी से सीख सकें;

2. वह समस्त भारत में सांस्कृतिक, आर्थिक (व्यापारिक) तथा राजनीतिक संपर्क के माध्यम के रूप में प्रयोग के लिए सक्षम हो;

3. वह अधिकांश हिंदुस्तानियों द्वारा बोली जा सके;

4. वह भाषा भारतीय परम्परा से घनिष्ठता से जुड़ी हो; और

5. कभी ऐसी भाषा को चुनते समय आरज़ी या क्षणिक हितों पर ध्यान न दिया जाए।

इतना ही नहीं, विदेशियों ने भी हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकृति दी थी। इनमें श्रीमती एनी बेसेंट सर्वप्रमुख हैं जो महात्मा गाँधी की प्रार्थना सभाओं में बढ़-चढ़कर शिरकत किया करती थीं और महात्माजी के हिंदी उपदेशों को सुनकर मंत्रमुग्ध हो जाया करती थीं। डॉ0 ज्ञानवती दरबार उनके योगदान पर प्रकाश डालती हैं, "सन 1918 से 1921 तक उन्होंने गाँधीजी के साथ दक्षिण में भ्रमण करके हिन्दी का प्रचार किया। वे इसे राष्ट्रनिर्माण का एक अंग मानती थीं। उन्होंने हिन्दी को सबसे प्रचलित एक भारतीय भाषा स्वीकार करते हुए उसे राष्ट्र की एकता का मुख्य साधन माना है।"

ध्यातव्य है कि भले ही हिंदुस्तानी अंग्रेजी की तूती बोलवाना चाहते हों, उन्हें अंग्रेजी में अभी भी महारत हासिल नहीं है। इसका एक कारण यह है कि यह हमारी साँस्कृतिक भाषा नहीं है। हमारे अंग्रेजी माध्यम स्कूलों, कालेजों और विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी भाषा और साहित्य पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं का अधिकतर समय शब्दकोशों से शब्दों को कंठस्थ करने और मुहावरा-कोशों से मुहावरे रटने में जाया होता है। इसके अलावा, चाहे अंग्रेजी स्कूल का कोई प्राथमिक दर्जे का छात्र हो या विश्वविद्यालयों का कोई अंग्रेजी शोधछात्र उसे अंग्रेजी वाक्यों की सही संरचना करने के लिए अपने पास नेसफ़ील्ड या रेन की ग्रामर की किताब हमेशा रखनी पड़ती है। इतना ही नहीं सरकारी कार्यालयों में जिस स्तर की अंग्रेजी का प्रयोग होता है, वह निहायत घटिया स्तर का है। ऐसी स्थिति में भी , पता नहीं क्यों हम यह मानकर चलते हैं कि अंग्रेजी दुनिया की श्रेष्ठतम भाषा है जबकि हम इतने वर्षों बाद भी उसे भली-भाँति सीख नहीं पाए हैं। इसका अर्थ यह है कि हम अंग्रेजी में अल्पज्ञ होकर भी जो अंग्रेजी पर गर्व करने का दावा ठोंकते हैं, वह बिल्कुल झूठा और हास्यास्पद है। इस संबंध में डा0 गार्गी गुप्त का कहना है, “...¤üÖê सौ वर्षों के दीर्घ संपर्क के बावज़ूद अंग्रेजी आज भी भारत के लिए विजातीय भाषा ही है। इसे हम न तो पूरी तरह अपना बना पाए हैं और न ही इसके दामन को छोड़ पाए हैं। फिर, प्रशासन में तो अंग्रेजी केवल हावी ही नहीं है बल्कि अंग्रेज शासकों द्वारा प्रयुक्त कार्यालयी साहित्य का औपचारिक तथा भाषिक स्वरूप भी वैसा ही बना हुआ है। करेला और वह भी नीम चढ़ा। आज कार्यालयी साहित्य के अनुवाद में जो कठिनता और दुर्बोधता दिखाई देती है, उसकी यही पृष्ठभूमि है। अनूदित सामग्री दूध देने वाली गाय न होकर मात्र कागज़ी गाय बनकर रह गई Æîü…”

उल्लेख्य है कि आज़ादी के बाद अचानक हमारे हिंदुस्तानी मनोविज्ञान में हिंदी, जो 14 सितंबर 1949 को राजभाषा घोषित हुई थी, के प्रति बेरुखी झलकने लगती है। कुछ सवाल बार-बार जेहन में कौंधते हैं: क्या हिंदी को स्वतंत्रता हासिल करने के लिए एक शस्त्र के रूप में अपनाया गया था? आख़िर, अंग्रेज़ों के जाने के बाद अंग्रेज़ी का वर्चस्व फिर क्यों बढ़ने लगा? क्या अंग्रेज़ कोई साजिश कर गए थे ताकि उनके जाने के बाद भी इस देश में उनकी अस्मिता भारतीय जुबान के रूप में बनी रहनी चाहिए? अथवा क्या मुट्ठीभर भारतीय जो अंग्रेज़ों और अंग्रेज़ी शासन के समर्थक थे और हमारी आज़ादी की लड़ाई के ख़िलाफ़ अंग्रेज़ों की मदद किया करते थे और जो आज़ादी के बाद यहीं रह गए थे, अंग्रेज़ी के वर्चस्व को बनाए रखने के लिए भीतर ही भीतर संघर्ष या षड्‌यंत्र करते रहे हैं? और क्या उनकी नई नस्ल में भी वही राष्ट्रद्रोही विषाणु आज भी जीवित हैं? एक निष्कर्ष तो आसान-सा यह है कि जिन लोगों में आज भी राष्ट्रप्रेम संदेहास्पद स्थिति में है, वे ही हिंदी के प्रखर और मुखर विरोधी भी हैं।

  डॉ. मनोज श्रीवास्तव
सी-66, विद्या विहार,
नई पंचवटी, जी.टी.रोड,
गाजियाबाद, उ.प्र.--201001,
मो. नं.09910360249
drmanojs5@gmail.com
 
         
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