टेसू के फूलों की महक
एवं आम के पेड़ो पर छाई मोरों अमराई की भीनी भीनी ख़ुशबु ने फागुन की दस्तक दे दी है। भगोरिया उत्सव का मौसम आ गया है। मध्यप्रदेश भारत के हृदय प्रदेश के रूप में प्रतिष्ठित है। मालवा अंचल मध्यप्रदेश का ऐतिहासिक व सांस्कृतिक इलाके के रूप में जाना जाता है। धार, झाबुआ, खरगोन जिले मालवा अंचल के आदिवासी संस्कृति के प्रमुख केन्द्र हैं। भगोरिया राजा भोज के समय से ही मनाया जाता है। उस समय के दो भील राजाओं कासूमार व बालून ने अपनी राजधानी भागोर में विशाल मेले और हाट का आयोजन करना शुरू किया। ऐसा आदिवासी संस्कृति पर रचित पुस्तकों में उल्लेख मिलता है। इन संदर्भां के अनुसार भगोरिया का प्रारम्भ राजा भोज के समय लगने वाले हाटों को कहा जाता था। ऐसी मान्यता है कि क्षेत्र का भगोर नाम का गाँव देवी मां के श्राप के कारण उजड़ गया था। वहॉ के राजा ने देवी को प्रसन्न करने के लिए गाँव के नाम से वार्षिक मेले का आयोजन शुरू कर दिया। चूँकि यह मेला भगोर से शुरू हुआ, इसलिये इसका नाम भगोरिया रख दिया गया। वैसे इसे गुलालिया हाट यानी गुलाल फेंकने वालों का हाट भी कहा जाता है। धीरे-धीरे भील राजाओं ने इन्ही का अनुसरण करना शुरू किया जिससे हाट और मेलों को भगोरिया कहना शुरू हुआ। अन्य राय के अनुसार चूँकि इन मेलों में युवक युवतियॉ अपनी मर्जी से भागकर शादी करते हैं इसलिए इसे भगोरिया कहा जाता है। भगोरिया उत्सव होली का ही एक रूप है और हर तरफ फागुन और प्यार का रंग बिखरा नज़र आता है।
धार झाबुआ व खरगोन जिले आदिवासी संस्कृति के केन्द्र है। आदिवासी संस्कृति का बोध कराता सात दिवसीय भगोरिया 13 मार्च 2011 से प्रारम्भ हो रहा है। इसे संस्कृति के मेलों के रूप में ख्याति प्राप्त है। मस्ती व उमंग से भरपूर आगामी सप्ताह में क्षेत्र के हाट बाजार भगोरिया हाट के नाम से जाने जाते हैं। इसमें महुए और ताड़ी की मादक गंध के साथ आदिवासी युवाओं के पैर संगीत की स्वर लहरियों के साथ मांदल की थाप पर थिरकेगें। साथ ही चकरी-झूलों का उन्मुक्त होकर आनंद लेगें। ठेठ आदिवासी युवक युवतियॉ परम्परागत परिधान में तथा पढ़े-लिखे आधुनिक वस्त्रों में नजर आयेगें। भगोरिया हाटों के दौरान बिकने वाली बस्तुएँ गुड़, खजूर, नारियल,, हार, कंगन, सेंब-भजिए, जलेबी, चावल तथा कपड़े व सौन्दर्य प्रसाधन आदि की दुकानें सज गई हैं, वहीं आदिवासी ढोल, मांदल, बांसुरी सहित अपने वाद्ययंत्रों को भी तैयार करने में लग गये हैं। पलायन कर चुके आदिवासी धीरे धीरे अपने आशियानों की और लौट रहे हैं। आदिवासी संस्कृति में अब शिक्षा को लेकर काफ़ी हद तक जागरूकता भी देखने को मिल रही है। क्षेत्र के बच्चे होस्टलों व कॉलेजों में पहुँचकर अच्छी शिक्षा ले रहे हैं। इसके बावजूद वे इस अवसर पर भगोरिया पर्व को हर्षोल्लास से मनाने के लिए अपने घरों की ओर पहुँच रहे हैं।
आलीराजपुर, धार, बड़वानी, खरगोन, झाबुआ, सेंधवा, पेटलावद, थांदला, भीकनगाँव, फूलमाल, कालीदेवी, मेघनगर, रानापुर, खेतिया, मालवन, नानपुर, कुक्षी, नालछा, मांडव आदि के अतिरिक्त क़रीब 100 से अधिक स्थानों पर प्रणय पर्व भगोरिया आगामी सप्ताह में पूरे जोश ख़रोश के साथ मनाने की तैयारी पूर्ण कर ली है।
भगोरिया हाट बाजारों
में युवक युवती बेहद सजधज कर अपने भावी जीवनसाथी को ढूँढने आते हैं। इनमे आपसी रजामंदी जाहिर करने का तरीक़ा भी बेहद निराला होता है। सबसे पहले लड़का लड़की को पान खाने के लिए देता है। यदि लड़की पान खाना स्वीकार कर ले तो हॉ समझी जाती है। इसके बाद लड़का लडकी को लेकर हाट से भाग जाता है और दोनों विवाह कर लेते हैं। इसी तरह यदि युवक युवती के गाल पर गुलाबी रंग लगा दे और जवाब में युवती युवक के गाल पर गुलाबी रंग मल दे तो भी रिश्ता तय माना जाता है।
यह उत्सव फागुन की मदमाती बयारों और बसंत के साथ इस अंचल में भगोरिया पर्व होली के एक सप्ताह पूर्व लगने वाली बाजार हाट से होलिका उत्सव तक चलता है। रंग-रंगीले, मस्ती भरे, परंपरागत लोक संस्कृति के प्रतीक भगोरिया पर्व में ढोल मांदल की थाप, बांसुरी की मधुर धुन और थाली की झंकार के साथ युवाओं व यहॉ के बाशिंदो के उमंग का आलम देखने को मिलता है। नव पल्लवित वृक्षों के समान ही नये-नये परिधानों में सजे युवक युवतियॉ जब इस उत्सव को मनाने के लिए टोलियों में आते हैं तो उनके मन की उमंग देखते ही बनती है। युवतियों का श्रृंगार तो दर्शनीय होता ही है, युवक भी उनसे पीछे नहीं रहते। आदिवासियों को मुख्य धारा से पिछड़ा मानने वाले हम यदि उनकी परंपराओं पर बारीक़ी से नज़र डालें तो पायेगें कि जिन परंपराओं के अभाव में हमारा समाज तनावग्रस्त है वही परंपराओं का निर्वाह व उसे विकसित कर ये आदिवासी तनावमुक्त नजर आते हैं।
हमारे सभ्य समाज में मनपसंद जीवनसाथी की तलाश करने में स्वेदकण बहाने वालों को अपने गिरेबान में झाँककर देखना चाहिए कि हमारे पास अपनी युवा पीढी को देने के लिए क्या है? क्या हमारे पास हैं ऐसे कुछ उत्सव जो सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रणय परिणय से संबंधित हों? लेकिन आदिवासियों के पास हैं इस मामले में वे हमसे अधिक समृद्ध हैं। झाबुआ जिले में मुख्यतः भील आदिवासी ही हैं। यहॉ भगोरिया हाट बड़े ज़ोर शोर से मनाये जाते हैं। मूल आदिवासी समाजों की यह एक अनोखी व विशिष्ट संस्कृति आज भी विश्व मानचित्र पर अपनी छवि बनाये हुए है, जिसका ज्वलंत उदाहरण है प्रेम पर्व भगोरिया। इस पर्व में भील संस्कृति के कुछ महत्वपूर्ण तत्व स्पष्ट रूप से उभरकर अभिव्यक्त होते हैं, जैसे लोक जीवन, लोकगीत, लोकनृत्य, भील व्यंग्य, शारीरिक अलंकरण, सौंदर्य, कलात्मकता आदि। इस उत्सव में झाबुआ और आलीराजपुर क्षेत्र के 60 से अधिक स्थानों पर धूम मच जाती है। बखतगढ, वालपुर, छकतला के मेलों में मध्यप्रदेश के अलावा गुजरात और राजस्थान के सीमा वर्ती गावों से भी लोग पहुँचते है। झाबुआ और आलीराजपुर के अलावा सौण्डवा, जोबट, कटठीबाड़ा, उमराली, भाबरा और आम्बुआ की भगोरिया हाट मे स्थानीय ही नहीं देशी विदेशी सैलानियों का भी जमावड़ा रहता है।
भील भिलाले
एवं पटलिया जनजाति अपनी परंपरा के अनुसार उत्साह से नाचते गाते हुए भगोरिया हाट में आते हैं। इस पर्व की ख़ास बात यह है कि आदिवासी अपनी जन्मभूमि, अपने गाँव से कितनी भी दूर क्यों न हों लेकिन भगोरिया के रूप में माटी की पुकार पर वो ’अपने देस’ दौड़ा चला आता है। पलायन कर चुके आदिवासी इस पर्व का आनंद लेने के लिए अपने घर लौट आते हैं। हम कह सकते हैं कि भगोरिया हाट भीलों की जीवन-रेखा भी है। यहॉ यह प्रचलित है कि भील साल भर हाड़ तोड़ मेहनत मजदूरी करते हैं और भगोरिया में अपना जमा धन लुटाते हैं। यहॉ से ही वे अनाज और कई तरह का सौदा सुलफ लेते हैं। यहीं गीत संगीत और नृत्य में शमिल हो मनोरंजन करते हैं। भगोरिया प्राचीन समय में होनेवाले स्वयंवर का ही जनजातीय स्वरूप है। इन हाट बाजारों मे युवक युवती बेहद सजधज कर जीवन साथी ढूँढते है ये दृश्य बहुत ही मनमोहक होते हैं। फिर देवता की पूजा अर्चना के साथ शुरू होता है उत्सव पूजा के बाद बुजुर्ग पेड़ के नीचे बैठकर विश्राम करते हैं और युवाओं की निगाहें भीड़ में मनपसंद जीवन साथी तलाशती हैं। फिर शुरू होता है प्रेम के इजहार का सिलसिला। लाल गुलाबी, हरे पीले फेटे, कानों में चांदी की लड़ें, कलाइयों और कमर में कंदोरे, आँखों पर काला चश्मा और पैरों में चांदी के मोटे कड़े पहने नौजवानों की टोलियॉ हाट की रंगीनी बढाती है। वहीं सुर्ख लाल, नांरगी, नीले, जामुनी, बैंगनी, काले कत्थई आदि चटख शोख रंग मे भिलोंडी लहॅगें और औढनी पहने, सिर से पाँव तक चांदी के गहनों से सजी अल्हड़ बालाओं की शोखियाँ भगोरिया की मस्ती को सुरूर में तब्दील करने के लिए काफ़ी हैं। अब इन पारंपारिक वेशभूषा में हेडफोन व मोबाइल भी विशेष रूप से युवक युवतियों की पसंद बनते जा रहे हैं जिनका प्रयोग ये बात करने में कम एफएम रेडियो ओर गाने सुनने में ज्यादा करते हैं। प्रसिद्व रिबोक व एक्शन जैसी अन्य नामी कम्पनियों की तरह बनने वाले स्पोटर्स शू का फैशन भी बढा है।
दस पंद्रह वर्ष पूर्व तक प्रणय निवेदन तथा स्वीकृति के बीच दोनों पक्षों मे ख़ून-ख़राबा होना बहुत सामान्य बात थी। लेकिन अब प्रशासन की चुस्त व्यवस्था से पिछले वर्षो में कोई अप्रिय घटना नहीं हुई है। मेलों में अब सशस्त्र बल व घुड़सवार पुलिस की तैनाती से अब मामले हिंसक नहीं हो पाते। हालाँकि भगोरिया हाटों में अब परंपरा की जगह आधुनिकता हावी होती नज़र आती है। ताड़ी की जगह शराब का सुरूर सिर चढ कर बोलता है। छाछ नींबू व रंगीन शरबत की जगह प्रसिद्व कंपनियों के पेय ने ले ली है। लेकिन रंगीन शरबत आज भी पहली पसंद बना हुआ है। ऐसा कहने में अतिश्योक्ति नहीं कि भगोरिया के आदर्शो, गरिमाओं और भव्यता के आगे योरप और अमेरिका के प्रेम पर्वो की संस्कृतियों को भी फ़ीका करने का माद्दा है, क्योंकि ये अपनी पवित्रता, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों की धरोहर से आज भी ओतप्रोत है।


![Validate my Atom 1.0 feed [Valid Atom 1.0]](valid-atom.png)