खलबली मच गई कि आस्ट्रेलिया में सरकार ने शरणार्थियों की समस्या सुलझाने के लिये ’मलेशिया समाधान’ रचा उसे हाई कोर्ट ने अवैध ठहरा दिया। वैसे तो शरणार्थियों का यहाँ आना कोई नई बात नहीं, मानवतावादी योजना के अंतर्गत प्रतिवर्ष 14 हजार विस्थापित या अपने ही देश में त्रस्त लोगों को यहाँ बसने की पूरी इज़ाजत दे दी जाती है। पर मलेशिया समझौते के अंतर्गत अचानक नाव से आने वाले याने क्यू तोड़ कर आने वाले शरणार्थियों की अदला बदली का प्रस्ताव ऐसा था कि प्रति माह आने वाले लगभग 600 शरणार्थियों के आवेदन पर मलेशिया में जाँच होगी और इसके बदले में 4000 शरणार्थी जिनकी वहाँ पर वैधता साबित हो चुकी है उन्हे अगले 4 वर्षों में यहाँ ले लिया जायगा। इस योजना को UNHCR याने अंतरराष्ट्रीय संघ के हाई कमिश्नर की शरणार्थी संस्था द्वारा मान्यता भी मिल चुकी है पर यहाँ की न्यायालय ने यह कह कर इसे अस्वीकार कर दिया कि इस समझौते की वैधता के लिये यह काफी नहीं है । इस फैसले के बाद भी UNHCR ने हाल ही में मलेशिया-समाधान की जोर शोर से वकालात की है।
मलेशिया से इस समझौते के अंतर्गत प्रधान-मन्त्री जुलिया गिलार्ड की सरकार द्वारा यह प्रावधान रखा गया है कि जब तक इन शरणार्थियों के आवेदन की जाँच की जाती है लगभग 45 दिनो तक उन्हे वहाँ अवरोध-कैद में रखा जायगा और बाद में वे समाज में मिल-जुल सकेंगे। अंतरराष्ट्रीय प्रवसन संस्था(IOM) एक माह तक उन्हे निवास व अन्य सहायता प्रदान करेगी। वे नौकरी द्वारा आत्मनिर्भर बनाने वाली संस्था के संपर्क में रहेगे। अत: वे इंडोनेशिया में इंतजार करने की अपेक्षा किसी भी स्तर पर बदतर स्थिति में न रहेंगे।
पर हाई कोर्ट इन सब बातों से समझौते पर राजी होने के मूड में नहीं है। उसका मानना है कि आस्ट्रेलिया के पड़ोसी देशों में से किसी भी देश ने शरणार्थी-समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किये है तो फिर वहाँ उनके मानवीय अधिकारों का हनन नहीं होगा इसकी क्या गारंटी है? मलेशिया से इस प्रकार द्विपक्षी समझौता करने से अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी समझौता शक्तिहीन हो जायगा। UNHCR संस्था जब इस पर अपनी स्वीकृति का स्टाम्प लगाती है तो वह कृत्रिम रूप से मलेशिया जैसे देशों को शरणार्थियों को निबटाने का अधिकार दे देती हैं जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय समझौते पर हस्ताक्षर न किये हों। कोर्ट का मानना है कि UNHCR को भला ऐसा अधिकार प्रदान करने का हक किसने दिया?
एक दशक पूर्व शरणार्थियों की नाव को वापस भेजना भी एक समाधान था। शरणार्थी बड़ी धनराशी अपनी ऐजेन्सी को देकर यहाँ आते थे। वापस लौटा दिये जाने पर अपनी ऐजेन्सी से पैसा वापस लेने की मांग करते थे। पर अब शरणार्थियों को लौटाना संभव नहीं है ऐसा लोग अपने अनुभव से जान गये हैं। अत: दोनो राजनैतिक दल परोक्ष रूप से याने मलेशिया या फिर नाउरु और मनुस द्वीप पर नावें लौटाना चाहते हैं। जो लोग अपने ही देश में अत्याचार के शिकार हों उन्हें यहाँ रहने की इज़ाज़त होनी चाहिये; ऐसा मानने वाले न्यायालय के इस निर्णय से बहुत खुश हैं। इन मानवतावादी लोगों का कहना है कि अनिवार्य अवरोध-कैद को खत्म किया जाना चाहिये क्योंकि उनके अनुसार शरणार्थियों पर चाहे जितना कठोर हो लीजिये , सागर सीमा से नावों का आना बन्द नहीं होगा। अत: सभी लोगों को यह समझाना भी आवश्यक है कि ये लोग यहाँ के नागरिकों के लिये किसी प्रकार का खतरा नहीं हैं। बल्कि प्रादेशिक जनता को यह आश्वासन देना होगा कि इन शरणार्थियों की पुनर्वास समस्या को अच्छे और सही ढंग से निपटाया जायगा।
इस तरह आस्ट्रेलिया 2001 की स्थिति में आगया है जब तत्कालिन प्रधान मन्त्री जोन हॉवर्ड का वह वक्तव्य मीडिया ने खूब उछाला जिसमें उन्होने कहा था कि नाव में आने वाले लोग अपने ही बच्चों को समुद्र में फैंक कर स्वयं के लिये दया उपजाना चाहते है। वह चुनाव का समय था जिसमें वे अच्छी तरह जीत गये। सोंचिये कि सहानुभूति किसे मिली? शरणार्थियों को या खुद प्रधानमन्त्री को? बाद में पता चला कि बच्चों को नाव से पानी में फैंकने की एक भी घटना नहीं घटी थी।
नाव से आने वाले शरणार्थियों पर दया करने वालों के पक्ष में विचार जान लेने के बाद विरोध करने वालों का द्रष्टिकोण समझा जाय। उनकी द्रष्टि में यह आस्ट्रेलिया के चिर पोषित अधिकारिक एवं सफल प्रोग्राम पर हमला है क्यों कि नावों में बैठ कर क्यू तोड़ने वाले एक दूसरी समानान्तर और लाभकारी प्रवास-व्यवस्था चालू कर रहे हैं । इस दूसरी व्यवस्था को चुनौती देते हुये वे कहते हैं कि यह लोगों की तस्करी है जो सिर्फ तस्कर और उनके ग्राहकों के लिये फायदेमंद है। इसे रोकने के लिये तो बहुत ही पुराना अंतरराष्ट्रिय- शरणार्थी-समझौता अगर बाधा बनता है तो क्यों न उससे ही पल्लू झाड़ लिया जाय। वे यह भी सोंचते हैं कि न्यायाधिश इस समाज के संपर्क में नहीं हैं। क्योंकि उन्हें इस बात से कोई वास्ता नहीं है कि नाव पर खतरनाक समुद्री यात्रा को प्रोत्साहन देने से शरणार्थियों की जान जा सकती है या कि सीमा सुरक्षा के अधिकारी स्वयं को खतरे की आग में झोंकते हैं। माइग्रेशन-एक्ट को धता बता कर किस तरह शरणार्थी सीमा-रेखा के आदर को नष्ट करते हैं तथा लोक-तस्करी को बढ़ावा दे कर पैसा दे पाने वाले शरणार्थी असली शरणार्थियों के अधिकार छीन लेते हैं! इसमें दोनो पक्षों के वकिलों की चाँदी होती है और वे करदाता के पैसों से मजे करते हैं।
विरोधी यह भी कहते हैं कि धरती पर लगभग 7 अरब लोग हैं। क्या आस्ट्रेलिया और पश्चिमी देशों ने सताये गये, पीड़ित, असुरक्षित और गरीब लोगों का ठेका ले रखा है? इन लोगों को क्यू तोड़ कर ले लेना तानाशाहों के लिये उत्साह बढ़ाने वाला कदम होगा। इरान, इराक और अफ़गानिस्तान के शरणार्थियों को इस तरह लेते गये तो उनके घर बसाने के संसाधन कहाँ से आयेंगे? तानाशाहों को हटाने के प्रयास भी बहुत हो गये तो इससे क्या वहाँ प्रजातन्त्र विकसित हो गया?
मलेशिया प्रस्ताव पर तटस्थ निरीक्षकों का बयान है कि कि जो प्रस्ताव 6-1 के बहुमत से हाई कोर्ट की पूरी बैंच ने खारिज़ कर दिया उसका कुछ आभास तो जुलिया सरकार को होना चाहिये था! इस प्रस्ताव की जाँच करने वाले कानूनी सलाहकारों को क्या कहा जाय जिन्होने कानून की अवहेलना वाली भाषा की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। क्यों न उन्हे फिर से कानून के छात्र बना कर स्कूल भेजा जाय !
ऐसा समझा जाता है कि दोनो दल डर की राजनीति का उपयोग करके आस्ट्रेलिया से बाहर आवेदन को निबटाना चाहते हैं पर नैतिक रूप से माना जाता है कि सभी शरणार्थियों के आवेदन की जाँच आस्ट्रेलिया में होनी चाहिये। इन गरीब और असहाय लोगों ने इस देश की कानून-व्यवस्था का उपयोग करके एक जीत हाँसिल की है तो प्रधान मन्त्री जुलिया गिलार्ड विरोधी दल से साँठ गाँठ करके स्वयं को सर्वोपरी और कानून को शतरंज मान कर उसके नियम ही बदल देना चाहती थी पर ऐसा कर नहीं पाई। भले ही हाईकोर्ट के निर्णय को जुलिया ने निराशाजनक बताया यह कह कर कि एक अच्छे समाधान को कोर्ट ने ठुकरा कर एक महत्वपूर्ण अवसर गँवा दिया है। कोर्ट ने इस वक्तव्य पर फटकारते हुये कहा है कि न्यायालय का काम ’अवसर’ का उपयोग कर लेना नहीं है उसकी भूमिका यह देखने की है कि कोई काम गैरकानूनी न हो। जुलिया सरकार ने हाई-कोर्ट के इस निर्णय का इलाज करने के लिये माइग्रेशन-एक्ट में परिवर्तन का बिल प्रस्तावित किया पर उसे पास करवाने में वांछित समर्थन जुटाने में वह असफल रही अत: इस पराजय के कारण उसे दयनिय शर्म का सामना करना पड़ रहा है।
शरणार्थी-संसाधन-केन्द्र की अभियान-समायोजक पमेला कर ( Pamela Curr ) शरणार्थी के हितों के लिये पूरी तरह से समर्पित हैं। उन्होने प्रधान-मंत्री को फुसलाने के तरीके से सुझाव दिया कि “अवरोध-केन्द्र बन्द कर के शरणार्थियों को समाज में मिलने का मौका देना चाहिये।“ ऊँट को पहाड़ के नीचे लाने की आकांक्षा से कहा कि “तुम्हे लगता है कि मलेशिया- समाधान का अस्वीकार होना तुम्हारे मुँह पर तमाचा है। पर नहीं, यह तो उल्टा तुम्हारी पीठ ठोंकी गई है।” भला यह कैसे? “क्योंकि तुम इससे कुछ बेहतर कर सकती हो।“ भई वाह! फिसल पड़ने पर “हर गंगा” का मन्त्र कोई पमेला से सीखे। इस प्रकार का प्रयत्न भी कुछ तो रंग लाता है। जुलिया ने शरणार्थियों को आस्ट्रेलिया के परिवारों में बसाने के लिये आर्थिक और मेडिकल सहायता देने की दिशा में सोंचना शुरू कर दिया है पर इसमें राजनैतिक और आर्थिक कठिनाइयां तो आनी ही हैं।
हरिहर झा
hariharjha2007@gmail.com


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