बचपन में स्कूल जाने, घर में पहनने अथवा कहीं शादी वगैरह में जाने के लिये मेरे पास मात्र एक ही ड्रेस थी। गंदी हो गई तो शाम धोकर डाल दी और सुबह फिर उसी को पहन कर चल दिये, भले ही वह गीली क्यों न हो। अन्य कोई जुगाड़ था ही नहीं। शादी वगैरह में जाना होता तब भी सुबह धोकर डाल देते और शाम को शादी में शरीक हो आते। पैरों में पन्हैयों का कोई जुगाड़ नहीं था। जुगाड़ कर सकता था अगर किसी मंदिर में जाता। पैरों के लिये अगर नहीं होता तो सिर के लिये अवश्य हो जाता। किसी बड़े बाप के बेटे के चमकते व प्रेसशुदा कपड़े देखकर ये नहीं कह पाता, भला इसकी शर्ट मेरी शर्ट से ज्यादा सफेद क्यों है? हाँ, मेरे कपड़ों पर पड़ी सिलवटें देखकर साथी ये जरूर कहते-देखो, इस उल्लू के पट्ठे पर एक ही ड्रेस है, वो भी रात को किसी मटके में घुसेड़ कर रख देता है। थोड़ी बुद्धि का विकास हुआ तो हमने जुगाड़मेंट की ओर कदम बढ़ाया। उस वक्त न तो बिजली थी और न बिजली की प्रेस। लोहे की साधारण प्रेस खरीदने की भी औकात नहीं थी। फिर करते क्या? कपड़ों पर प्रेस करने का जुगाड़ तो करना ही था। पीतल के समतल तली के एक लोटे में चूल्हे से आग भर लेता और उससे कपड़ों पर प्रेस कर लेता था। प्रेस का जुगाड़ हो गया था किंतु दूसरी ड्रेस का जुगाड़ नहीं हो पा रहा था। गाँव से ही एक और लड़का मेरे क्लास में पढ़ता था। उस के घर की हालत ज्यादा अच्छी नहीं थी। कभी-कभी हम दोनों एक दूसरे की ड्रेस पहन कर चले जाते थे जिससे सहपाठी यह समझ सकें कि हमारे पास एक से ज्यादा ड्रेस हैं। इस तरह दूसरी ड्रेस का भी जुगाड़ कर लिया था।
जुगाड़ से बड़े-बड़े काम निकाले जा सकते हैं। अगर जुगाड़ की कला में माहिर हो तो प्रतिभा की कमी, कला का फूहड़पन, आर्थिक कमजोरी और दूरदृष्टि का अभाव इन सब को पछाड़ा जा सकता है। खिलाड़ी तो हम बचपन से ही रहे हैं। यह बात दीगर है कि आज तक हमने सोने की तो छोड़ो, लोहे का मैडल भी नहीं जीता। लेकिन उससे क्या फर्क पड़ता है। खेल भावना हम में कूट-कूट कर भरी थी। पढ़ाई के टाइम तो खेल रहे हैं, काम के टाइम तो खेल रहे हैं, खाने-सोने के टाइम तो खेल रहे हैं। खेल का सामान न होने के बावजूद खेलने में कोई कमी नहीं थी। खेल के ऑरीजिनल सामान में गिल्ली-डंडा के अलावा हमारे पास और किसी का जुगाड़ नहीं था। गेंद का जुगाड़ पुराने कपड़ों की गेंद से तथा बल्ले का जुगाड़ एक लकड़ी के डंडे से कर लिया था। हमारे देश में जुगाड़बाजी की एक महान व गौरवशाली परंपरा रही है। असली जुगाड़क चिंतन में ज्यादा समय नहीं गँवाते। जरूरत पड़ऩे पर वे तत्काल जुगाड़ कर लेते हैं। देश के राजनीतिज्ञ भी यही सोचते हैं कि जितना जुगाड़ सको जुगाड़ लो। कल किसने देखा है। कहते हैं ये अँग्रेज जब भारत आया तो हमारी जुगाड़ से वह काफी प्रभावित हुआ। गाड़ी ड्रायविंग करते वक्त उसकी विदेशी गाड़ी यकायक रास्ते में खराब हो गई। हिंदुस्तान में पार्ट न मिल पाने के कारण वह बड़ा परेशान हो गया। अंत में एक जुगाड़ू मैकेनिक को बुलाया गया। उसने असली पुर्जे की जगह कोई अन्य पुर्जा फिट कर गाड़ी स्टार्ट कर दी। अँग्रेज ने जब पूछा कि बिना असली पुर्जे के गाड़ी कैसे स्टार्ट हो गई? तो जुगाड़ू मैकेनिक बोला-जुगाड़ से। अँग्रेज उस जुगाड़ की तकनीक से बड़ा प्रभावित हुआ। वह सोचने लगा कि तकनीक की हर क्षेत्र में हम दुनिया में सबसे आगे हैं। किंतु जुगाड़ की इस अनोखी तकनीक ने इंडिया से हम पीछे कैसे रह गये।वैसे तो जुगाड़बाजी हमारे देश में आदिकाल से चली आ रही है। किंतु आजादी के बाद जितनी उपलब्धि हमने जुगाड़बाजी के माध्यम से की है उतनी उपलब्धि साहित्य कला और तकनीक के माध्यम से नहीं की है। तमाम नामचीनी साहित्यकारों को जिंदगी हो गई। कलम घसीटते-घसीटते लेकिन पुरस्कार के नाम पर वे एक तमगे का जुगाड़ नहीं कर पाये। सरकारी अकादमी का पुरस्कार मिलता नहीं जुगाड़ा जाता है। काबिलों को नहीं चहेतों को दिया जाता है। तमाम पत्र-पत्रिकाओं में हम छपें एक दर्जन से ज्यादा किताबें लिखीं तमाम साहित्यिक कार्यक्रमों में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराई, किंतु अभी तक किसी पुरस्कार का जुगाड़ नहीं हो पाया। पुरस्कार का जुगाड़ मरदूद नौसिखिये कर के चलते बनते हैं। जुगाड़ न कर पाना अथवा जुगाड़ की कला में माहिर न होना नालायकी का दूसरा नाम है। आजकल जमाना जुगाड़ का है। बिना जुगाड़ के अब काम नहीं चलता। नेता, अधिकारी, समाजसेवी, चोर-लुटेरे सभी जुगाड़ में लगे रहते हैं। सरकारें भी जुगाड़ से चल रही हैं। देश की राजनीति में सबसे पहले जुगाड़ का आविष्कार भा.ज.पा. के शासनकाल में हुआ। लगभग बीस दलों का जुगाड़ कर एक अस्थाई सरकार का जुगाड़ किया गया। इस सरकार के महान जुगाड़क (संयोजक) का बस यही काम था वे रात दिन घूम-घूम कर अस्थिर सरकार को स्थिर रखने के लिए जुगाड़ में लगे रहे। उनकी दौड़ धूप से सरकार पाँच साल तक स्थिर रहीं। सरकार का काम काज भी स्थिर रहा। मंत्री भी स्थिर रहे। सभी जुगाड़ में लगे रहे कि इस जुगाड़तंत्र का महल किसी प्रकार ढह न जाये। लेकिन यह जुगाड़ अगली टर्म पर फेल हो गया। अब तो अधिकांश सरकारें जुगाड़ की राजनीति पर ही चल रही है। बिना जुगाड़ के न तो सरकारें चल पाती हैं न राजनीति, न नेता चल पाते हैं और न ठेकेदार, न अधिकारी चल पाते हैं और न अपराधी। ये जुगाड़ का ही करिश्मा है कि रेलगाड़ी, बसें, वायुयान तथा स्टीमर चलायमान है अन्यथा ये चल ही न पाते। सड़क और भवन बनानेवाले ठेकेदार, इंजीनियरों के खिलाफ कितनी भी शक्ति बरतें फिर भी वे अपने हिस्से के कमीशन का जुगाड़ कर लेते हैं। यह पूरा देश ही जुगाड़ के खंभों पर टिका हुआ है।
जुगाड़ कला में माहिर कुछ उस्तादों ने एक ऐसे वाहन का ईजाद किया है जिस पर सरकारी कायदे-कानून सारे बेअसर हैं। इस वाहन के लिये न तो रजिस्ट्रेशन की जरूरत है और न फिटनेस की, न ड्रायविंग लायसेंस की जरूरत है और न रोडटैक्स की। कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा के आधार पर दीगर वाहनों के रिजैक्टेड पुर्जे (पहिए, स्टेयरिंग, क्लच, बे्रक, इंजन आदि) को जोड़ जाड़ कर इस जुगाड़ नामक वाहन का आविष्कार कर लिया है। इससे खेती का काम कम सवारियाँ व माल ढोने का काम ज्यादा लेते हैं। खैर लोगों ने अपना पेट भरने का कैसे भी जुगाड़ तो कर ही लिया है। जुगाड़क स्वयं भी पेट भरते हैं और स्थानीय पुलिस के पेट का भी वेट बढ़ाते हैं। पुलिस और जुगाड़वाहक मजे मार रहे हैं और परिवहन विभाग वाले तमाशा देख रहे हैं। कितना बहुद्देशीय वातानुकूलित वाहन हैं 'जुगाड़'। सर्दी में सर्दी का अहसास और गर्मी में गर्मी का आनंद। ठंडी और गर्म हवाओं से भरपूर साक्षात्कार। बरसात में वर्षा का भरपूर मजा। चारों तरफ प्रकृति का नजारा और ऊपर नीली छतरी। इसमें सवारी करने का कभी सौभाग्य यदि प्राप्त हो तो कभी न छोडऩा। स्वर्गिक यात्रा जैसा आनंद प्राप्त होता है। तकनीकी कारणवश अगर यह कहीं लुढ़क जाये तो भी स्वर्गीय यात्रा का आंनद।
कुछ लोगों के पास एक अद्र्धांगिनी होते हुए दूसरी जुगाड़ में इसलिए लगे रहते हैं कि आधे अंग के लिये तो प्रबंध हो गया दूसरे आधे अंग के लिए भी तो जुगाड़ चाहिए। अगर पूर्णांगिनी है तो लाइफ को सही तरीके से जीने के लिए एक अदद प्रेमिका के जुगाड़ में लगे रहते सिद्धांत का कठोरता से पालन करते हैं। वे देश की कुँआरी कन्याओं को विवाह किये बिना विवाहित जीवन का सुख प्रदान करना अपना फर्ज समझते हैं। इस पवित्र कार्य के लिए दौरे का समय वे सर्वथा उपयुक्त समझते हैं। रैस्ट हाऊस का कर्मचारी भी दरवाजा खोलकर धीरे से पूछता है साब, शौक करेंगे क्या? कुछ करूँ जुगाड़?पहले देश में मनोरंजन के कोई खास साधन नहीं थे। रेडियो सुन लेते थे या कभी-कभार भालू, बंदर, सांप की उछल कूद व जादूगरों का खेल देख कर मन बहला लेते थे। अब मनोरंजन के साधनों का व्यापक स्तर पर जुगाड़ हो गया है। टीवी, सिनेमाघर, इंटरनेट जैसे आधुनिक साधन उपलब्ध हैं। सांप, भालू, बंदर, चि पांजी आदि का कौतूहल देखना हो तो चिडिय़ाघर चले जाइये अथवा घर बैठे लोक सभा का सीधा प्रसारण देख लीजिए। हालांकि चिडिय़ाघर में हम पशुओं को उतनी उत्सुकता से नहीं देखते जितनी उत्सुकता से पशु हमें देखते हैं। पशु हमें घूरकर कहते हैं, 'आप अपना चेहरा अगर आइने में अच्छी तरह देख लेते तो शायद फिर चिडिय़ाघर नहीं आते।'
रामसहाय वर्मा, बी-14, सेक्टर 15, नोएडा-201301


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