फागुन के आने की आहट पाकर महुआ अपने सारे पत्ते त्याग दिया है ।
महुआ का विशाल वृक्ष किसी वैधव्य भोगने वाली श्रीहीना, कोमल गात्ररहित, असुन्दर स्त्री की भाँति ठूँठ बनकर खड़ा है । अभी तो नये कोंपल फूटने के भी कोई लक्षण दृष्टिगोचर नही हो रहे हैं । ठूँठ, कभी-कभी जीवनहीन लाश की भी कुशँका उपजा देता है । पर नहीं । महुआ गाछ अभी मरा नहीं है । इसका यह विवर्णमुख होना तो अभिसारिका के श्रृंगार के पहले की तैयारी है । ज़ल्दी ही महुआ हरा-भरा होगा । फूलेगा भी और फलेगा भी । इंतज़ार है तो बस फागुन का ।
महुआ के फूल सूखकर गिरते नहीं, हरश्रृंगार पुष्प की भाँति झरते भी नहीं, टपकते हैं । हो सकता है इनका शँकुआकार और रससिक्त होना बूँद टपकने का भ्रम उत्पन्न करने का कारक का काम करता हो, इसीलिए ये झरने की बजाय टपकते हैं । इनका जीवन काल अत्यल्प होता है । रात्रि की गुलाबी शीतल निस्तब्धता में यह फूल मंजरियों के गर्भ से प्रस्फुटित होता है और ब्राह्म मुहुर्त में भोर के तारे के उदय होने के साथ टपकना शुरु कर देता है । जितनी मन्जरियों में उस रात ये फूल पुष्ठ हुए होते हैं, अपनी परिपक्वता के हिसाब से क्रमशः धीरे धीरे करके टपकने लगते हैं । यह क्रम ज़्यादा देर का नहीं होता । सूर्योदय से लेकर यही कोई तीन चार घंटे में सारा खेल ख़त्म हो जाता है ।
मुझे शुरूआती बरसात में छिटपुट बादलों से बड़ी-बड़ी बूँदों के रुप में बरसते जल और वृक्ष के नीचे सूखे पत्तों के ऊपर टपकते महुआ पुष्प में बहुत साम्य दिखता है । टपकन की ध्वनि लगभग समान होती है । महुआ पुष्प में भरे रस और तप्त धरती पर पड़ते जल बूँदों से उठती मोहक गँध, दोनो ही मुझे तंद्रिल कर अन्य लोक में ले जाते हैं, जहाँ आनन्द की निर्झरिणी मेरा सर्वाँग इतना रसप्लावित कर देती है कि मैं सुधबुध बिसरा बैठता हूँ ।
फागुन कोई एक मास विशेष का नाम भर नहीं है । यह बच्चे, युवा, बूढे सभी में मस्ती, जोश, संचरण करने का वो रस है कि प्रकृति के समस्त उपादान रस सिक्त हो मनुष्य ही नहीं समस्त जीव जगत को मदमत्त कर देने का सहज आंमत्रण के कारक में परिणत हो जाते है । किसी को कुछ करना नहीं होता, जो करता है फागुन करता है । जीवधारी तो बस फागुन में होते भर हैं । और इसी फागुन में महुआ अपने सम्पूर्ण बहार में होता है । भले ही कंदर्प देवता ने मदन बाण के रुप में महुआ को न चुना हो, उनकी तुणीर में महुआ के लिये स्थान की कमी हो गई हो, परन्तु महुआ स्वयं में इतना सक्षम है कि वह वातावरण में स्वयमेव विस्तारित होकर कामदेव के कुसुम शरों सम प्रभाव का संचरण करता रहता है । यह पेय के रुप में देवी रति के हाथों कामदेव तक अवश्य ही पहुँचा होगा और वे एकाधिक बार इसका प्रयोग भी किये होंगे । देवि रति को तो महुआ भाता ही है ।
मुझे लगता है महुआ रक्तवर्णी वृक्ष है ।
ललाई इसके रग रग में व्याप्त है । इसके पत्र वैसे तो हरित ही होते है, परन्तु जब ये सूर्य की जीवन दायिनी रश्मियों से अपने मूल से प्राप्त रस को पक्व कर लेते हैं, इनमें लालित्य सहज ही दिखने लगता है । महुआ की मन्ञरियों का रंग हल्का लाल ही होता है, जिनके गर्भ में रससिक्त श्वेत शँकुआकार पुष्प पलते बढ़ते रहते हैं ।
देव अर्चना के संदर्भ में मुझे महुआ पुष्प की कहीं कोई चर्चा नहीं मिली । किसी देवी या देवता पर ये पुष्प चढाये जाते हों ऐसा भी नहीं मिलता, परन्तु एक बात मुझे चकित करती है । भगवान काल भैरव, महुआ के सूखे पुष्पों को सड़ाकर बनायी गई मदिरा पीकर भक्तों की मनोकामना झट पूरी कर देते हैं, लेकिन महुआ पुष्प पूजा के उपादान के रुप में उन्हें भी स्वीकार नहीं । मुझे शँका होती है कि कहीं देवगण इसे पुष्प ही नहीं मानते इसीलिये तो स्वीकार नहीं करते ।
सामान्यतः इसके दो ही उपयोग पाये जाते हैं । कच्चे में पशुओं का चारा, और सड़ाकर मदिरा का निर्माण । महुआ इसी मदिरा निर्माण के नाम से ही ज़्यादह प्रसिद्धि पा सका है । देशी ठेके पर सामान्यतः महुआ फूल से बनी मदिरा ही बिकती है । सरकारी नियंत्रण में इस मदिरा में अल्कोहल की मात्रा निश्चित होती है । घर में चुआई गई दारु की बात दूसरी है ।
शायद आर्यों के इस महादेश में आने के पहले से ही यहाँ के आदि निवासियों में महुआ से दारु बनाकर पीने की प्रथा चली आ रही है । यह उनकी सांस्कृतिक विरासत का सबसे महत्वपूर्ण एवं आनन्ददायक हिस्सा बना हुआ है । ये आदिवासी दारु निर्माण की प्रक्रिया में महुआ फूल को सड़ाने और फरमेंटेशन के लिये किसी रसायन का उपयोग नहीं करते । वे इसके लिये ‘रानू’ नामक चूना मिट्टी जैसी गोलियों का प्रयोग करते हैं, जो विभिन्न प्रकार की जड़ी बूटियाँ कूटपीसकर वे स्वयँ बनाते हैं । इसीलिये उनका शरीर इस प्रकार चुआई गई दारु से कोई रोग आमन्त्रित नहीं करता ।
महुआ और समूह नृत्य का एक अजाना सा सम्बन्ध दृष्टिगोचर होता है । आदिवासी समुदाय शिशिर की गुनगुनी धूप में या फिर बसंत की मोहक चाँदनी खिली शीतल रात्री में अपने युवाओं का समूह गान के साथ नृत्य का साक्षी बनता है । कभी-कभी यह नृत्य और गान महुआ जनित उल्लास विवर्धिनी मदिरा का संयोग पाकर उन्माद की सीमा तक जा पहुँचता है । नवयौवनाओं का अभिसार पूर्व का यह नृत्यगान गहराती रात के साथ और मदिर होकर मदन देव की अर्चना के लिये आवाहन कारक तो बनता ही बनता है, कभी कभी गत यौवनाओं को भी रससिक्त कर उन्मुक्तता की सीमा रेखा लाँघ जाने के लिये सहज ही उत्प्रेरक की भूमिका निभाने लगता है । निश्चय ही मदिरा के इस आविष्कार ने उनके जीवन में सरसता का संचार करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा है ।
मनुष्य के लिये प्रकृति के कार्य व्यापार में रहस्य का तत्व हमेशा से रहा है । मनुष्य जितना प्रकृति के रहस्यों से परिचित होता जाता है, प्रकृति नये नये गूढ़ रहस्य का अनबुझ आवरण ओढ़ती जाती है ।
मानव की प्रकृति विजय की अदम्य लालसा उसे अनथक प्रयत्न के लिये उत्साहित करती रहती है । यह खेल अनादि काल से चला आ रहा है, और पता नहीं कब तक चलता रहेगा । इसी खेल-खेल में हल्दी के पीले रंग का शुभत्व उद्घाटित हुआ लगता है । माघ के महीने में जब प्रकृति अपने हरित लिबास को धीरे धीरे सूरज की शनै शनै बढ़ते ताप में सुखाकर पीले रंग में रंग लेती है, उसके नव्य श्रींगार का आगाज सहज ही समझ में आने लगता है । नयी कोंपलें, फूल और फल के लिये मात्र किंचित समय की अपेक्षा भर रह जाती है । इस अपेक्षा में महुआ हमेशा से खरा उतरता आया है । महुआ में फूल पहले आते हैं , पत्ते बाद में ।
मैं नाम के संदर्भ में महुआ के पुष्प को महा स्वार्थी मानता हूँ । महुआ शब्द को इस पुष्प ने पूरा का पूरा आत्मसात कर लिया है । महुआ के फल, काष्ठ और अन्य अवयवों के ओषधीय गुणों की चर्चा के लिये केवल महुआ नाम पूर्ण नहीं माना जाता । मुझे लगता है अपने नशाकारी गुण के ही कारण महुआ से केवल फूल ही अभिप्रेत होता आया है । हालाँकि महुआ के फल अपुष्ट अवस्था में कहीं कहीं सब्जी के रुप में प्रयुक्त होते पाये गये हैं । ये ही जब पुष्ट हो जाते हैं तब इनके बीजों से तेल निकाला जाता है । इसके तेल में अधिक स्निग्धता तथा स्वादहीन होने के कारण न्यून मात्रा में ही इसका उपयोग देखा सुना जाता है । निश्चय ही इन घटकों के अल्प उपयोगी होने का गुण ही इन्हें विस्मृत कराने के लिये पर्याप्त कारण रहा है ।
हमारे ॠषि मुनियों, दार्शनिकों, विद्वानों तथा राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के नशामुक्ति के अथक प्रयासों का प्रभाव महुआ पर किंचित मात्र भी नहीं पड़ा है । राज्य संस्था के लिये अत्यंत लाभकारी होने के कारण महुआ से मदिरा बनाकर बेचने का कार्यव्यापार दिनानुदिन बढ़ोत्तरी पर है । मैं नहीं समझता महुआ का यह उच्चासन कभी भूलुँठित होनेवाला है, चाहे धनहीन श्रमिकों, कृषकों, अवसरहीन दलितों को नशा लुब्धक बनाकर महुआ उनका सर्वस्व ही हर ले जाय ।


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