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चैत मास की भरी दोपहरी। इंद्रावती का मधुप्रवाह । संपूर्ण देह जल में अदृश्य । दृश्यमान केवल माथा। श्रृंगधारी काला जीव । एकाकी पथिक देख ले तो धड़कनें पहाड़ा हो जाय। पाँव पर्वत। देह-रोम बबूल के काँटे । अचेतन, अंधविश्वासी मन में पैठा कल्पित दैत्यपशु साकार हो उठे। अनावृत कांतार में वनमहिषों के नैकट्य-दर्शन की साध आज पूरी हो रही थी। छतनार साल के सानिध्य में उन्हें अपलक निहारे जा रहा था मैं । साथ में बस्तर में पदस्थ बैचमेट पांडेय जी और कुटरू राष्ट्रीय अभयारण्य का परिचारक महादे । अब तक हरियल निस्तब्धता दो ही कारणों से क्षीण हो रही है। पहला-वनपाखियों की कूजन। दूसरा-महादे का व्याख्यान। महादे रास्ते भर हमारी साम्मतिक चुप्पी के बावजूद कुछ-न-कुछ कहे जा रहा था। पर इतना भी नहीं, कि उसे ‘बकरनाथ’ की उपाधि से अलंकृत किया जाय। अनपढ़ता के बाद भी एनिमल हसबेंडरी में दक्ष वनवासी। पांडेय जी पूछ रहे थे- “एजी ऊ मुड़ी बार-बार केकरा ख़ातिर बूडावत हाय ?” मेरी दृष्टि-साधना लगभग भंग हो इसके पहले ही महादे टपक पड़ा- साहेब ! सिंग में कीट-दंशन होता है ना, और माखी-भूसड़ी भी भिनभिनाते हैं।”
“पंडित जी ! यह वनमहिष का ललिता को समर्पित श्रृंगोदक है। यह निरा-स्नान नहीं। प्रायश्चित स्वरुप प्राशन है उसका।” - मैंने पांडेयजी की प्रश्नवाचकता का सामना करते हुए कहा- “देह-ताप का शमन मनस्ताप शमन बिना कहाँ संभव होता है ? वातावरण के ताप को देहजल भेद सकता है। अंतःकरण के परिताप को जल भी नहीं भेद पाता है !”
महिष- अशेष शाप से ग्रसित । महिष- युगों-युगों से मानरहित। अंतहीन दोष से विमुक्ति को कलपता जीव। दुष्टग्रहों की कोप-परिधि में भटकने को विवश। भावुक सर्जकों के लिए भी वर्जित । इतिकथाओं में उपेक्षित। हाय ! घोर अन्याय ! ! तिमिरदेही हाथी को नवनिधि का आदर्य और महिष के लिए असह्म अपमान। लोकचित्त में भी वह स्मरणीय नहीं। गज, बाजी, वृषभ, धेनु, व्याघ्रादि की इतनी लोककथाएँ हैं, इतने लोकगीत हैं कि पृथक-पृथक दीर्घकाय ग्रंथ बन जायें। कीट-पतंग, सर्प-वृश्चिक, गोह-गिरगिट तक के लिए उत्सुक लोक महिष को एकबारगी बिसार देता है। जाने किस भ्रम, जाने किस मिथक और जाने किस पूर्वाग्रह का शिकार है वह...
महिष की जगह नवशिक्षित होता! गली-गली में क्षुद्रतामूलक आंदोलन खड़ा हो जाता। धवलधोतीधारी पुण्यात्माओं को हॉट पोलिटिकल इशु मिल जाता। चूके हुए सुर्खियाँकामी बुद्धिजीवियों के हाथों नए विमर्श-बखेड़ों का औजार आ जाता । मार्क्स के नाम पर गुलछर्रे उड़ाने वाले कामचोर कर्मियों को महिषजाति कर्मचारी संघ (मजाक्स) के पंड़ाल की हरी-भरी छाँव नसीब हो जाती, और सरकारें इनकी आड़ में अनुदान, आरक्षण, अनुग्रह के मालपुए ख़ुद हज़म करती चली जातीं। महिष है कि कोई आपत्ति नहीं लेता। शस्य-संपूर्ति पर्व है। किसान का पूरा परिवार जुटा हुआ है। बैलों को चंदन-तिलक चढ़ रहा है। अदुग्धा धेनुओं को भी खीर-पुरी परोसी जा रही है। सांड़ों को चंपा-चमेली की हार भेंट हो रही है। इससे क्या? महिषजी को कोई ईर्ष्या नहीं। कोई द्वेष नहीं। खूँटे में गेरवाँ से बँए हुए । निहार रहे हैं टुकुर-टुकुर।
महिष विशुद्ध भारतीय है। उसका मूल पता भारत है। कहा जाता है सार्गान के समय (ईसा पूर्व 24 वीं सदी में) पहली बार ये भारत से मेसोपेटोमिया चले गए। वहाँ से मिश्र । 18 वीं वंशावली काल अर्थात् साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व। ये वस्तुतः वनैले हैं। फेरल नहीं। घर-गाँव से जंगल नहीं पहुँचे। श्रीलंका, उत्तरी आस्ट्रेलिया आदि अन्य प्रदेश इसके अपवाद हैं। वहीं वे घर से वनवासी हुए हैं। महिष भारतीय परिवेश में सिंह, हाथी, बैल, वृषभ आदि के समकालीन है। सैंधव्य सभ्यता में उसकी प्रतिष्ठा शक्ति के प्रतीक के रूप में रही । तब वह पूजनीय रहा। तात्कालीन मृण्मय मूर्तियाँ, खिलौनों और मुद्राओं में उसका अंकन मिलता है। जन समाज में तब उसे परम पुरुष का वरद्हस्त प्राप्त था। एक विशेष मुहर में वन्यजीवों से समावृत ध्यानस्थ योगी दिखाई देते हैं। इन जीवों में हाथी, गैंडा, सिंह, हरिण के साथ महिष को भी समतुल्य पद प्रदत्त है। इस चित्र से शिव की धारणा का आभास होता है। शिव का पशुपति नाम भी संपुष्ट होता है। इसमें सींग वाला सिरस्त्राण त्रिशूल की अभिव्यक्ति है। यानी कि त्रिशुलधारी परमपुरुष शिव, और परमपुरूष शिव का पड़ोसी वन्यप्राणी महिष। सैंधव्य संस्कृति के परंपरानुकूल आज भी बैल, गाय, गरुड़, नागादि संपूर्ण हिन्दूजाति में अर्चनीय हैं। स्मृतियों, पुराणों और निबंधों में महिष-दान की बहुल-चर्चा मिलती है। यह उसके पुण्य-प्रतापी होने की मान्यता का प्रमाण है। चण्डिका सकल जगत् की जननी है। मुझे विश्वास नहीं होता कि माँ क्षुधा शांति के लिए अपने ही संतानों की बलि स्वीकारती है। फिर भी कालिका पुराण(71-3-5एवं 95-96) के संदर्भों का उल्लेख करना उचित होगा। जिसमें कहा गया है कि दुर्गा एवं भैरव के सम्मान में महिषरक्त चढ़ाया जाता है। राजसी एवं तामसी पूजाविधान में महिष को महाबलि माना गया है। आज भी महानिर्वाणतंत्र (3 उल्लास 6 पद 105) में भी लुलाष (मर्हिष) को दश बलिपशुओं में शुमार किया गया है।
कालान्तर में महिष की सांस्कृतिक छवि जाने क्यों धुमिल होती चली गई ? मुझे इसके मूल में वर्णाग्रह का घटाटोप नज़र आता है । भारतीय वर्णव्यवस्था रंगभेद एवं जातिभेद की अग्रि में घृत सदृश है। अतिरिक्त धवलप्रियता, वर्णनैष्ठिक और प्रजातिवादी मानसिकता का दुखांत है। इसमें भारतीयता के मौलिक स्वरों के बहिष्कार का दुर्गंध भी है। इसे मैं कामकीट प्रेरित प्रदूषण कहना उचित समझता हूँ । कृष्णावतार इसी दुर्गंध का परिष्क्रमण है। महादेव का श्मशानी अधोरमुद्रा अनर्थक देह-वर्णभक्ति का निराकरण है। विश्रान्ति कृष्णरंगी निशा का उपहार है। नवयौवना की केश की कालिमा में योगी का चित्त भी संसारी बनने को आतुर हो उठता है। काजल के सानिध्य से शुष्क नैन सरोवर-सी सजल बन जाती हैं। गुंथा हुआ आटा काली तवा और काले अंगार में पके बिना पुण्यवान नहीं हो सकता है। काली स्याही से रची गई कविता कालजयी सिद्ध होती है। फिर भी औसत संसारी मन काले चीज़ों से दूर रहता है । संसारी होकर क्या वह प्रकृति से दूर नहीं जाता होता है ? जबकि प्रकृति तो अंतर्विरोधी रंगों का समाहार है। प्रकृति समन्वयधर्मी है। समन्वय ही आनंद है। आनंद में रस ही रस है। रस का उत्स सौंदर्य है। चाक्षुस सौंदर्य एक भ्रम भी है। उसमें शिवत्व की अवधि नियत है। ऐसे सौंदर्य में नीरसता की संभावना से कोई बचाव नहीं होता। सौंदर्य का असली स्वाद वही चख सकता है, जो बोध की अतल गहराई में उतर सके। ऐसी गहराई तक पहुँचते-पहुँचते रंग-रूप, जाति-प्रजाति, कुल-गोत्र, जीव-अजीव, चर-अचर आदि सभी मानुष-विरोधी वर्जनाएँ धुल जाती हैं। चारों दिशाओं में केवल रस ही रस की स्निग्ध तरंगें उमड़ने लगती हैं। प्रकृति और पुरुष दोनों मधुसंपन्न दिखाई देते हैं। चाक्षुस सौंदर्य दर्शन ताक-झाँक के अलावा आख़िर क्या है ? दरअसल मन-प्राण की रस-आतुरता ही सौंदर्य-बोध की पहली सीढ़ी है। इस सीढ़ियों पर चलना सौंदर्य-साधना है। भारतीय मनीषा ताक-झाँक विश्वासी नहीं। वह सौंदर्य-साधना का पक्षधर है।
महिष को औसत लोक उथली दृष्टि से लेता है। काला कलूटा चतुष्पद, कहकर उसकी कार्मिकता की सर्वथा उपेक्षा कर दी जाती है। वह अन्न-साधक है। शस्यश्यामला की उर्वरता में उसका नमक भी धुला हुआ है। वह कोटि-कोटि जनों की उदरपूर्ति की चिंता में माटीपुत्र के साथ अहर्निश जुटा हुआ है। वह आदिसंगी है कृषकों का। उसके लिए कर्म ही साधना है। कर्म ही साध्य है। खुर चटक रहे हैं, फिर भी, वह है कि हल के पीछे-पीछे चल रहा है। काँधे की चमड़ी उखड़ चुकी है, फिर भी वह है कि शकट खेंच रहा है। महिषी का दुध गोदुग्ध से अधिक गुरु व शीतल होता है। उसके दुध में घी भी अधिक । महर्षि चरक भी मानते हैं कि उसके दूध में अनिद्रा को जीतने का जादू होता है। पाण्डु रोग के लिए दूध और मूत्र का संयोग रामवाण औषध है। वह मनुष्य का हितैषी तो है ही, स्वबंधु सहायक भी है। गाय और घोड़े की रूग्णता में महिष-मूत्राशय शर्तिया दवा है।
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