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ललित-कुछ बातें

प्रकाशन :बुधवार, 1 दिसम्बर 2010
डॉ. श्रीराम परिहार

भारतीय साहित्य के आस्थापरक संदर्भों में जिस लालित्य की अंत: सलिला का प्रवाह मिलता है, उसकी ठंडक की छुवन हिंदी गद्य की ललित निबंध विधा में पूरी मरज़ाद के साथ हुई है। व्यक्ति की प्रतिभा और क्षमता का संसार के हित में प्रस्फुटन ही लालित्य है, बल्कि जीव मात्र या सृष्टि के तत्व-तत्व की क्षमता का प्रस्फुटन रचनात्मक स्तर पर होने से सृष्टि में उसके कर्म का जो सौंदर्य बिखरता है, वह ही लालित्य है। साहित्य के क्षेत्र में वह विचार या भाव जो सत्यानुभूति को विशेष रसायन बनाकर शब्द-अर्थ के यौगिक स्वरूप में निसृत होता है, जिससे चित्त दशा सामान्य से कुछ विशेष होकर सौंदर्य और शिव के निकट आ जाती है, वह ललित है। उस ललित के संसर्ग से चित्त जीवन की क्रियाओं को सृष्टि के व्यापक हित में मोडऩे को तत्पर हो जाता है, तब ही ललित का शब्द रूपायन सार्थक होता है।

लालित्य केवल चाक्षुक नहीं होता। परिवेश का मात्र बाहरी सौंदर्य भी लालित्य नहीं होता। रचना के स्तर पर वाक्यगत या भाषा-शिल्पगत महीनता भी ललित नहीं है। ख़ास क़िस्म की मुलायम और आभिजात्य गुंफित शब्दावली में विषय प्रस्तुतिकरण भी ललित नहीं है। इन सबसे परे किंतु इन सबसे परिचित तत्व है। वृन्त पर फूल का खिलना या धरती पर नदी का बहना सौंदर्य का कारक हो सकता है, परंतु इनके संदर्भ ललित तब होंगे, जब फूल की पंखुरियों के रंग और पराग कणों की सुगंध से पूरा मौसम जिजीविषा से भर जाए। नदी के जल की शीतलता जीव मात्र के अंदर-बाहर की तपन बुझाने और धरती के सूखेपन को हरियाली देने हेतु धार-धार बह जाए। कर्म का सौंदर्य ही ललित का कारक और प्रसारक होता है।

ललित मनुष्य की हज़ारों वर्षों की सभ्यता और संस्कृति के मंथन से निकला नवनीत है, जो ललित कलाओं में स्निग्धता और समय के संघर्ष की आँच में तपकर घी बनता है। यह ताक़त भी देता है और घोर अँधेरे में दीपक में ढुलकर जलता भी है। प्रकाश भी देता है। ललित के इसी प्रकार से मानव बीसवीं शताब्दी के बदहवास मुहाने पर भी अपने पल्ले में कुछ अच्छा रखे हुए है। समय के प्रवाह में गंदगी भी मिलती है। पानी गंदा भी होता है। ललित वह तत्व है, जो पानी के साथ बहते हुए पानी कें गंदलेपन को दूर करता है। लालित्य नकार की बजाए सामञ्जस्य और स्वीकार की बान लिए हुए होता है। यह शिव का नंदी है, जो शिव के आस-पास घूमता है। शिव को अपनी पीठ पर बैठाकर यात्रा भी करता है। गतिशीलता ललित की अनिवार्य ढुरन है। इस गतिशीलता में वह अतीत, वर्तमान और भविष्य का नापता रहता है। अतीत से बार-बार मिलता है। वर्तमान को प्रबोधता है और भविष्य के साथ यात्रा की तैयारी में जुटा रहता है।

ओस कणों में शीतलता, सूरज-किरण में ताप, पुष्प में सुगंध, पोपट के पंखों में हरापन, फलों में स्वाद, फ़सलों के दानों में दूध, तुलसी दल में गणवत्ता बनकर यह ललित बैठा है। हिमालय से फूटती गंगा-जमना, नर्मदा के संघर्ष, किसान के श्रम, समुद्र की बड़वाग्रि, अलाव की आँच, दूब की कभी न सूखने वाली जड़ों की जिजीविषा और किसी भी देश के अपनी आत्मरक्षा में खड़े स्वाभिमान तथा अन्याय के प्रतिकार में ललित को देखा जा सकता है। ललित छुट्टे साँड की तरह डकारते हुए घूड़े पर खर्री नहीं करता। मनोरंजन का वह केन्द्र नहीं, वह सर्जन का उत्स है। वह गुदगुदाता नहीं, बहलाता नहीं, उपदेश भी नहीं देता, ख़ुद उल्लासित होता है और क्रियमानता में तत्पर होता है। उसके गुस्से में दूसरे के दोषों को जमाने को गिना-गिनाकर चिकोटी काटने का ध्येय नहीं होता, बल्कि ख़ुद की क्रियाशीलता इतनी प्रबल होती है कि वह अपनी शक्ति का रूपान्तरण अनेक रूपों के करते हुए अन्याय की सूरत और आदत बदल देता है। इसमें समय ज़रूर लगता है। ललित नर्मदा की ग्रीष्म में बहती जलधार है।

प्रकृति ललित का अक्षय स्रोत भी है, संरक्षक भी और ललित की प्रेरक भी। सारी ललित कलाओं से लेकर ज्ञान-विज्ञान का आधार प्रकृति ही है। इस ज्ञान-विज्ञान में ललित मोती में आभ की तरह, चाँदनी में शीतलता-निर्मलता की तरह, बादल में पानी की तरह और आग में ताप की तरह अवस्थित है। प्राचीन काल में एक समझदार व्यक्ति जंगल से पैदल यात्रा कर रहा था। वह एक वृक्ष की छाया में सुस्ताने बैठ गया। तभी अरण्य में उसे सुरीली ध्वनियाँ सुनाई दी। वह चौंका और ध्वनियों का उत्स खोजने लगा। बहुत खोजने के बाद उसने देखा कि एक मरे हुए बंदर की सूखी चमड़ी पेड़ की शाखाओं के बीच तनी थी और उसकी सूखी आँतों पर हवा से दूसरी शाखा के रगड़ खाने से तानें उत्पन्न हो रही थी। इन्हीं शाखों से उतरकर भारतीय संगीत में ‘सारंगी’ का प्रवेश हुआ। प्रकृति का मरण भी शिवत्व भरा होता है। इसलिए जीव-सृष्टि, प्रकृति और इनमें निहित परा-शक्ति में सामंजस्य स्थापित करते हुए संतुलित विकास का अवधानक ही ललित है।

पुराण सृष्टि की ललिता देवी जो शिव और शक्ति के सामंजस्य की अवस्था है, वह ही समयान्तर में भावपुरूष श्रीकृष्ण में रूपांतरित होती है तथा राधा की ललिता छवि जो पूरे द्वापर को अपनी उपस्थिति से उन्मीलित रमणीयता देती है। ये सब ललित से जुड़े मिथक संस्कृति के कोने-अँतरों को दूर-दूर तक प्रभावित करते हैं। विपरीतताओं की एक साथ मौजूदगी में जो सामंजस्य का कार्य करते हैं। लोक ने शिव का जो स्वरूप ग्रहण किया है, वह है बाधम्बर धारी, भभूतमय, जटाधारी, गंगाधर, सर्पमाल वाला, विषपायी, बैल पर सवार और जिसके घर-बार का ठिकाना नहीं। वे शिव ही तांडव करते हैं तथा वे ही लोक कथाओं में आकार पार्वती की करूणा पर किसी दु:खित को कनेर की सोटी छुआकर पीड़ा से उबार देते हैं। उनके तांडव में उद्धतता है, तो लास्य भी है। शिव में एक साथ संसार की स्थितियों की झाँई विपरीत-अनुकूल देखी जा सकती है, लेकिन उनके कार्यों की अंतिम परिणति कल्याण में ही होती है, इसीलिए वे शिव हैं। शिव ललित के जीवित मिथक हैं।

लोकनायक राम का जो स्वरूप है, वह अयोध्या के राज-पुत्र से कहीं अधिक और अनेक अर्थों, में ललित है। नंगे पाँव, सिर पर जटा, काँधे पर तरकश और हाथ में धनुष/राम का यह स्वरूप, राम को लोक के अधिक निकट लाता है। सावन की गरज, भादों की बरस, पुरवाई के झोंकों की झकोर में किसी वृक्ष के नीचे खड़े हुए भीगते राम, सीता, लक्ष्मण की छवि ऐसे ही भीगते हुए इस धरती के कितने-कितने किसानों-वनवासियों-गृहस्थों के रूप में दिखायी दे जाती है। पहाड़ सरीखे दु:ख को किस तरह पानी बनाकर पी लिया जाए, यह राम ही कर सकते हैं। वनवास के दु:ख को दु:ख न मानते हुए सबको दु:ख से उबारने का उपक्रम राम को सबका अपना बना देता है। उससे भी बड़ी बात अन्याय के ख़िलाफ़ पूरे सौंदर्य के साथ भिड़ पडऩे और सात्त्य को बचा लेने की राम की बान पूरे त्रेता में ललित बनकर बगर गयी है। राम मानव संस्कृति की धार का प्रवाह, शीतलता, ताक़त और शिवत्व बन गये हैं। राम का शील, गांम्भीर्य और युद्ध में क्रूद्ध रूप, ललित की आभ लिये हुए है। राक्षसों द्वारा खाकर लगायी गयी ऋषियों की हड्डियों के ढेर को देखकर राम के नेत्रों से आँसू ढुलक पड़ते हैं, दूसरी ओर रावण से लड़ते-लड़ते उनके श्याम तन पर श्रम-बिंदु उभर आते हैं। दोनों जगह जल-बिंदु, भिन्न-भिन्न कारण सो होते हुए भी दोनों राम के चरित्र में लालित्य का अवधान समान स्तर पर करते हैं। राम के स्वरूप से आगे राम के कार्य और उनके परिणामों के वृहत्तर सांस्कृतिक संदर्भों, के परिव्यापन में लालित्य आज भी बोल रहा है।

कृष्ण की रूप माधुरी का प्रभाव ब्रज पर हो सकता है, लेकिन दिक्काल को प्रभावित तो कृष्णा का लोकरंजक स्वरूप करता है। जहाँ-जहाँ युग का जन संकट मे आया, वहाँ-वहाँ कृष्ण उनकी मदद हेतु खड़े हैं। उनकी लीला का लालित्य व्यापक सांस्कृतिक संदर्भ बुनता है। एक संस्कृति पुष्ट होती है। जीवन को किसी को सौंपकर किसी का हो जाने का भाव, क्रिया बन जाता है। कृष्णा की माधुरी से उत्फुल्ल आभा, रमणीयता बनकर सारे संबंधों में फैल जाती है, तब कृष्ण की न बाँसुरी प्रमुख होती है, न मोरपंख, न गुंजमाल, न कछनी, न कामरी, न लकुटी। कुछ नहीं बचता। सिर्फ़ कृष्ण बचे रहते हैं और उससे भी आगे कृष्ण का वह क्रियात्मक स्वरूप बचा रहता है, जो सबको सगा बनाता है। कृष्ण सबके हो जाते हैं। यशोदा के लाल, राधा के साँवरे और अर्जुन के सारथी से भी आगे वे मानुष-भाव बन जाते हैं। यह क्रियात्मक कृष्ण-भाव ही लालित्य है।

राधा दर्पण देखती है। अपनी छवि को देखते हुए वह यह अनुभव करती है कि प्रियतम उसे देख रहे हैं और वह उस छवि पर मुग्ध हो जाती है। राधा की वह छवि ललिता बन जाती है, लेकिन इसमें लालित्य ‘मुग्धता’ में नहीं है, बल्कि इसमें है कि स्वयं को बिसारकर कृष्ण की उपस्थिति का भान होना और स्वयं को कृष्ण भाव में मिला देना। यह स्वयं को दूसरे में घोल देने की बेसुध चैतन्य स्थिति, चित्त दशा में ललित का सर्जन करती है और राधा फिर न अपनी रह पाती है, न ब्रज की, न बरसाने की, न यमुना की, न सखियों की। वह कृष्ण हो जाती है। वह शारदीया चाँदनी में उजास बनकर फैल जाती है। वह महारास में प्रकृति और पुरूष का एकमेव स्वरूप बन जाती है। सृष्टि के महानर्तन में क्षण-क्षण लोच बनकर विस्तारित हो जाती है। कृष्ण के माध्यम से वेणु में स्वयं ही बजती है। आत्मिक चेतना का यह ललित्यमय प्रस्फुटन और विस्फार है।

अपने राष्ट्र की आध्यात्मिक चेतना को पहचानकर निशस्त्र खड़े हो जाना तथा आत्मा की ताक़त के बल पर एक लंबी और कठिन लड़ाई को जीत लेने के मूल में यह ‘ललित’ काम करता रहा है। अपने राष्ट्र की आत्मा की आवाज़ को सुने बिना हम कुछ भी वास्तविक नहीं सुन सकते। हिंसा और अँगरेज़ी शासन की क्रूरता के विरोध में असहयोग, सविनय अवज्ञा, भारत छोड़ो आन्दोलन, डाँडी यात्रा और उपवास इस राष्ट्र की तहजीब में निहित ‘ललित’ के स्वभिमान-रक्षित क्रेाध के सकारात्मक क्रिया-पहलू हैं। दूसरी ओर ज़मीनी स्तर पर ‘ललित’ का अपनी क्रियाओं में समवेत कर वास्तविक श्रम कर स्वावलंबी संस्कृति का पोषक इस दुनिया में एकमात्र किसान है। उससे बड़ा दाता नहीं और उसकी छतरी के नीचे स्वयं को बचाने के लिए गाय का बछड़ा दौड़ा चला आता है, तथा किसान उसे अपने से सटाकर उसकी पीठ पर हाथ फेरता है, तब उसे छाते के नीचे दो प्राणी ही नहीं खड़े होते हैं, बल्कि उनके स्वरूप में ललित ही आकार पा जाता है। यह भाव, सृष्टि का सत्य भी है, सुख भी है, उत्कर्ष भी है और उत्कर्ष का कारक भी है।

कुछ हैं, जो मनुष्य होने की सार्थकता देते हैं। ऊबड़-खाबड़ के बीच कहीं से कोई सोता फूट पड़ता है। कहीं से कोई आस्था रिसती आती है और इस रिसाव में डूब जाता है-मनुष्य। उसका क्षत-विक्षत शरीर तथा लंगी मारता समय। यही आस्था है जो ललित का बोध देती है। ललित कोई कलात्मक चेतना नहीं है। ललित कोई शैली नहीं है। ललित कोई फ़ैशन नहीं है। ललित आदमी का पर्याय है। इस छीजते हुए समय में जहाँ भी आदमी शेष है, वहाँ ललित है। जहाँ भी इस शेष आदमी की हिफ़ाजत का प्रबंध है, वहाँ ललित की आदमरफ़्त है। क्षत-विक्षत के ख़िलाफ़ यही ललित जब अक्षत बनकर आता है, तब धरती के भीतर फैली दूर्बा पर सिहरन जागती है। उसकी कोमलता ओर-ओर बिखरती है। धरती के माथे पर तब और दकम उठता है-रोली और अक्षत का टीका।

ललित की सार्थकता इसमें है कि वह जीवन में कहीं राग को रचे और कहीं विराग को। काम कठिन है। ललित का संघर्ष किसी कद्दावर योद्धा का संघर्ष नहीं है। यह तो जल की ताकत है। जलधार से धीरे-धीरे चट्टान कटती है, पर कटती जरूर है। दधि-दुर्बा और अक्षत से भरे हाथों का संकल्प पृथ्वी की कोख में छोड़ते हुए प्रतीति होती है कि शाल्य अँखुओं में बदलेगा। इन अँखुओं से फूटने वाली उजास एक बेहतर भविष्य को न्यौता दे रही है।

  डॉ. श्रीराम परिहार
प्राचार्य, माखनलाल चतुर्वेदी शासकीय
स्नातकोत्तर कन्या महाविद्यालय
खण्डवा, मध्यप्रदेश 450001
मो. 9425342748
 
         
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