उसके नेत्र छलकने को आतुर थे
, यद्यपि वह अपने अश्रुओं को पलकों की कोरों में भरे रहने का भरपूर प्रयत्न कर रहा था। वह स्वयं क्षीणकाय था, परंतु उसके नेत्र उसके नाम के अनुरूप विशाल थे। नेत्रों में बहुत कुछ छिपा रहता है एवं नेत्रों से बहुत कुछ प्रकट होता है। हमारे अंतर्मन के वे समस्त भाव, जिन्हें हम सामाजिक लज्जा, पारम्परिक बंधन अथवा भय के कारण अपनी जिह्वा द्वारा प्रकट होने से दबा जाते हैं, हमारे नेत्रों में वारिद-घटा के समान छा जाते हैं और अनुभूति के अधिक गहरा होने पर अश्रु बनकर छलक जाते हैं। विशाल नेत्रों वाले व्यक्ति के लिये इन वारिद-घटाओं को सामने वाले की निगाह से छिपा पाना और कठिन होता है। बड़े नेत्रों में अभिव्यक्ति की क्षमता (अथवा अपने भावों को न छिपा पाने की दुर्बलता) नैसर्गिक होती है। इसी कारण से लेखकों ने व्यक्तित्व की सुंदरता का बखान करते समय मृगनयन की कल्पना की है- मृग के नयन बड़े भी होते हैं और वाचाल भी।
उसके बड़े-बड़े नेत्रों में भी अभिव्यक्ति की नैसर्गिक क्षमता अन्यों से अधिक थी। उसका नाम विशाल था, जो ’आँखों के अंधे नाम धरो नैनसुख’ की कहावत चरितार्थ कर रहा था क्योंकि वह केवल ढाई फ़ीट ऊँचा था और लगभग एक फ़ुट चौड़ा। बस उसके नेत्र अवश्य विशाल थे और उतने ही अभिव्यक्तिपरक। वह मेरे आवास के वाह्य-भाग में निर्मित कमरे में रहने वाले रीता और अमरजीत का चार वर्ष का बेटा था। उसकी एक वर्ष की एक छोटी बहिन भी थी- विशाली। इन लोगों को मैंने रहने की अनुमति तो दे दी थी परंतु उनके आते ही स्पष्ट कह दिया था कि आवश्यकतानुसार ये लोग स्वयं तो मेरे घर में अंदर आ सकते हैं, परंतु बच्चों को बाहर ही रहने की आदत डालें। आज आत्म-विश्लेषण करने पर मुझे लगता है कि इस निर्देश का कारण सामाजिक स्तर की भिन्नता से उदगमित उनके प्रति हमारे मन में छिपी हुईं आशंकायें थीं; साथ ही स्तर की इस भिन्नता को बच्चों के माध्यम से पाटने के किसी प्रयत्न को रोकना भी रहा होगा। इन लोगों ने मेरे इस निर्देश का सदैव अक्षरशः पालन किया था। दरवाज़े के निकट खेलते रहने के अतिरिक्त विशाल तथा विशाली ने घर में घुसने का कभी भूल से भी प्रयत्न नहीं किया था। हाँ, हमारे सामने पड़ जाने पर वे एक आकर्षक मुस्कान अवश्य बिखेर देते थे। इसके अतिरिक्त विशाल एक काम और करता था। मेरे बाहर जाते समय मेरे द्वारा कार में बैठते ही और बाहर से आने पर मेरी कार का हार्न सुनकर विशाल बिना किसी के कहे ही दौड़कर गेट खोलने आ जाता था।
उस सायं धुंधलका छा गया था जब मैं अपनी बैठक से बाहर निकला था। मैंने बाहर विशाल को अकेला खड़ा देखा। मुझे देखकर वह न तो मुस्कराया और न गेट खोलने हेतु दौड़ा। वह एक भयभीत मृगछौने सा घबराया हुआ था और उसके नयनों की कोरों से अश्रु छलकने को आतुर थे। मैंने कौतूहलवश पूछा, "विशाल, क्या बात है?"
उसके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला। मेरे द्वारा आज तक उससे निकटता स्थापित करने का कोई प्रयास न किये जाने के कारण वह अपने मन की बात कहने से झिझक रहा था।
मैंने आज से पहले उसे कभी अकेला नहीं देखा था, सदैव विशाली के साथ ही देखा था। अतः फिर पूछा, "विशाली कहाँ है।?"
उसके नेत्रों में हल्क़ा सा कम्पन हुआ, पर अभी भी उसके मुँह से कोई ध्वनि नहीं निकली। तब मैंने उसके कमरे की ओर देखा। उसमें न तो प्रकाश था और न कोई हलचल। मुझे अनोखा लगा और मेरी उत्सुकता और बढ़ गई। कारण जानने को मैंने अपनी जिह्वा में मिठास भरकर पूछा, "तुम्हारे मम्मी-पापा कहाँ हैं?"
तब उसकी दाहिनी आँख के कोने से एक बूंद टपक पड़ी और मुख से उसकी क्षीण वाणी निकली, "विशाली को लेकर डाक्टर को दिखाने गये हैं।"
परिस्थिति मेरी समझ में आ गयी। साइकिल पर बिठाने की जगह न होने के कारण विवशता में विशाल को अकेला छोड़ गये होंगे। मेरे निर्देश के कारण मेरे घर में अंदर छोड़ने को कहने का साहस नहीं कर पाये होंगे। अंधकार हो जाने से बालक भयभीत हो गया था और सुरक्षा की आशा में मेरे दरवाज़े के सामने खड़ा था, परंतु मेरे द्वारा किये गये निषेध के कारण न अंदर आने का साहस कर रहा था और न हमें पुकारने का। मैं उस निरीह बालक के उन अश्रुओं को देखकर द्रवित तो हो ही रहा था- साथ ही अपने निर्देश की कठोरता से ग्लानि का अनुभव भी कर रहा था।
मैंने विशाल को घर में अंदर आ जाने को कहा, तो उसके मुख पर आश्वस्ति का भाव तो आया, परंतु वह एकदम अंदर आने का साहस नहीं कर पाया। तब मैंने उसे पुनः प्यार से अंदर चलने को कहा और वह धीरे धीरे क़दम बढाते हुए अंदर आ गया। वहाँ उसे बिस्कुट खाने को देने पर वह लगभग सामान्य हो गया। इसके कुछ देर उपरांत ही अमरजीत और रीता आ गये और विशाल के नेत्रों में स्मित-रेखा वापस लौट आयी।
मेरी कार का हार्न सुनकर विशाल अब और तेज़ी से दौड़कर गेट खोलने लगा है।

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