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परम्परा

प्रकाशन :गुरूवार, 2 फरवरी 2012
सुबोध श्रीवास्तव

त्रिपाठी जी के घर में कोहराम मचा हुआ था। हर कोई गुस्से से उबल रहा था। घर के सभी सदस्य बैठक में गहन चिंता की मुद्रा में बैठे थे। बीच-बीच में सभी एक-दूसरे का मुंह ताक लेते थे। बड़ी लड़की द्वारा अपने सहपाठी के साथ प्रेमविवाह करने का फैसला लेने की घोषणा भर से मानो भूचाल आ गया था।

आक्रोश में त्रिपाठी जी बार-बार उबल रहे थे, 'चाहे मेरी जान चली जाए, यह शादी नहीं होने दूंगा। इस घर की भी कोई मर्यादाएं हैं, परम्पराएं हैं। आखिर समाज को क्या मुंह दिखाऊंगा..? 'बड़की की मां को भी कोई कम गुस्सा नहीं आ रहा था। घर के बाकी सदस्यों का भी यही हाल था। मां ने तो बड़की को उसकी इस करतूत पर ठोक-पीट भी दिया था। स्थिति विस्फोटक देख चारों लड़कियां दूसरे कमरे में चलीं गयीं। इस डर से कि जाने क्या हो अब।

काफी देर की चुप्पी के बाद पंडिताइन ने हिम्मत बटोरकर सन्नाटा तोड़ा और गम्भीर स्वर में त्रिपाठी जी को समझाया- 'देखो जी, लड़की सयानी है। ब्याह की उमर भी है। चार-चार बैठीं हैं घर में, पैसा पास-पल्ले है नहीं। कहां से लाओगे चारों के ब्याह के लिए इतना पैसा। यूं ही कुंवारी बैठाए रखोगे क्या? बड़की कहती थी कि लड़का ऊंचे खानदान का है। कई-कई फैक्ट्रियां हैं उसके पिता की..और, उसने खुद ही ब्याह का प्रस्ताव रखा है बिटिया के सामने। इसलिए दान-दहेज का झंझट भी न होगा। ' वे एक ही सांस में सारी बात कह गयीं। उनके स्वर में विवशता साफ झलक रही थी।

'तो क्या मनमानी होने दें..? एक को देख दूसरी बिगड़ेगी..। ' त्रिपाठी जी भड़क गये। 'जैसी हैसियत है उसके हिसाब से सबके हाथ पीले करूंगा..। '

'मनमानी काहे की पंडित जी..? जरा ठंडे दिमाग से सोचो। बिटिया सयानी है। यही क्या कम है कि उसने हम लोगों को अपना पहले से बता दिया। वरना, ब्याह करके लड़के के संग कहीं चली जाती तो हम कहीं के न रहते...। ' कहते-कहते आंखें भर आईं पंडिताइन की।

'तुम शायद ठीक कहती हो बड़की की मां। मैं सोचता हूं कि जब बात इतनी बढ़ गई है तो जरा सोच-विचार के बाद लड़के के घर वालों से बात कर लेंगे चलकर। घर-बार और रिश्ता ठीक है तो हर्ज ही क्या है...। ' रूंधे गले से त्रिपाठी जी ने कहा। और तनाव से घिरे घर में एक बार फिर से खुशनुमा माहौल हो गया।


  सुबोध श्रीवास्तव
'माडर्न विला',10/518,
खलासी लाइन्स,
कानपुर (उ.प्र.)-208001
subodhsrivastava85@yahoo.in
 
         
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