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धार्मिक शिक्षा – सरकारी स्कूलों में

प्रकाशन :गुरूवार, 1 सितम्बर 2011
हरिहर झा

किसी ने ठीक कहा है कि सद्गुण आते देर लगती है पर दुर्गुण आते देर नहीं लगती। इसमें एक तो स्वार्थ और फिर दूसरा कारण यह है कि सभी अच्छी-बुरी बातों को पूर्वाग्रह ग्रस्त दिमाग तोड़ मरोड़ देता है। यह बात मूलपंथियों पर शत-प्रतिशत लागू होती है। वे किसी भी जानकारी से अपने मतलब की बात निकाल कर अन्धी मान्यताओं को मजबूत करते रहते हैं पर सुधि पाठक खुले दिमाग से विचार करते हैं। यह बात आस्ट्रेलिया की सरकारी शालाओं में धार्मिक शिक्षा की जानकारी पर भी लागू होती है जहाँ से सतही लोग गलत अपेक्षायें पाल सकते हैं। किन्तु यहाँ महत्व उस जानकारी और विश्लेषण का है जो इस बात से और बढ़ जाता है कि यूरोप के देशों का मॉडल भी लगभग यहाँ के जैसा है। यह सवाल अपनी जगह पर एकदम जायज़ है कि छात्रों को स्कूल में धार्मिक शिक्षा क्यों दी जाय और वह भी सरकारी स्कूलों में? शाला और मन्दिर अलग-अलग होना धर्मनिरपेक्ष राज्य में अति आवश्यक है। पर भारत से बाहर विशेषत: पश्चिमी समाज में क्या होता है यह जानना अध्ययन की द्रष्टि से जरूरी है। आंकड़ो की द्रष्टि से आस्ट्रेलिया कोई धर्मप्राण देश नहीं है बल्कि जनगणना में यहाँ लगभग19% नागरिक ’कोई धर्म नहीं’ पर टिक करते हैं और इसके अलावा 11% अपने धर्म को अनकहा, अघोषित रखते हैं।

आस्ट्रेलिया के सरकारी स्कूलों में इस विषय पर पहला कानूनी प्रावधान सम्प्रदाय-रहित धार्मिक शिक्षा का है। धार्मिक शिक्षा को भी पाठ्यक्रम का हिस्सा मानकर अध्यापक पढ़ा सकते हैं पर ऐसा व्यवहार में नहीं होता। एक दूसरा प्रावधान 19 वीं शताब्दी में आस्ट्रेलिया बनते समय रखा गया था। जिसमें किसी पंथ या किसी धर्म-विशेष की चर्च को स्कूल में प्रवेश कर अपने अनुयायी अभिभावक के बच्चों को धार्मिक शिक्षा देने व आध्यात्मिक मार्गदर्शन करने का अधिकार है। जिसे चर्च द्वारा स्कूल में “प्रवेश के अधिकार” के नाम से जाना जाता है। यह कितना भी अजीब लगे पर सत्य है और इस मामले में भारतीय धर्मनिरपेक्षता की तुलना में यह प्रावधान धर्मनिरपेक्ष शिक्षा की अवधारणा को कमजोर बनाता है। चर्च के प्रतिनिधि-मंडल (जिन्हे यहाँ Access Ministries कहा जाता है ) से चुने गये पादरी या स्वयंसेवक एक सप्ताह में आधा घंटा पढ़ाते है। शुरू में ईसाई चर्च को ही बुलाया जाता था पर अब विद्यार्थियों के हिसाब से अन्य धर्म के पादरियों को भी बुलाना संभव है। यह प्रथा प्राथमिक शिक्षा के स्कूलों में प्रचलित है। सेकेंडरी स्कूलों में इस ’विशेष धार्मिक शिक्षा’ के समय में ऐसा नहीं होता पर वर्ष में दो बार धार्मिक सेमिनार होते है। 1970 से धार्मिक शिक्षा के अंक विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिये गिने जाते हैं क्योंकि इसे “दूसरे मान्य विषयों का दर्जा” मिल गया है। इसमें आश्चर्य नहीं कि सरकारी शालाओं की तुलना में कैथोलिक स्कूलों में धार्मिक शिक्षा और यह कार्यक्रम ज्यादा जोश और उत्साह से चलाये जाते हैं।

कईं कारणों से पहले प्रावधान यानी ’सर्वधर्म’ या विश्व-धर्म की शिक्षा यहाँ प्रसिद्ध नहीं हो पाई और आस्ट्रेलिया में इस धारणा का विकास नहीं हो पाया। राजकीय स्कूल के अध्यापकों को धार्मिक शिक्षा देने की कोई ट्रेनिंग नहीं दी जाती। इसमें शुरू से अध्यापकों को न तो कैरियर में आगे बढ़ने का मार्ग रहा है और न ही यहाँ पढ़ाने की कोई आधारभूत संरचना बनी है। इस प्रकार के धर्म की परिभाषा भी मुश्किल है। क्योंकि प्रश्न यह उठता है कि क्या इसे संप्रदायनुमा एक धर्म के विरोध में परिभाषित किया जाना चाहिये? इन कठिनाइयों के अतिरिक्त कारण यह भी रहा है कि चर्च के अधिकारी स्कूल में ’प्रवेश के अधिकार’ को जानबूझ कर भला क्यों खोने लगे?

प्राय: शिक्षाविद यह कहते पाये जाते हैं कि धार्मिक शिक्षा के बदले नैतिक शिक्षा दी जानी चाहिये और इसी प्रकार सभी धर्मों के साथ नास्तिकवाद की धारणा को भी समझाया जाना चाहिये। जिससे छात्र स्वतंत्र रूप से अपने विचारों का निर्माण कर सकें। इसके विरोधी कहते हैं कि धार्मिक शिक्षा यदि भोजन है तो नैतिक शिक्षा केवल विटामिन की गोली है। तात्पर्य यह कि भोजन के बदले में गोलियां लेना तो बुद्धिमानी नहीं है। आस्ट्रेलियन एसोसियेशन फ़ोर रिलिजियस एजुकेशन (AARE) अपने पक्ष में इस शिक्षा के आध्यात्मिक, सामाजिक व धार्मिक आयाम की बड़ी-बड़ी बातें व बड़े-बड़े वादे भी कर देता है। किन्तु पादरी या स्वयंसेवक केवल धर्मप्रचार के लिये प्रशिक्षित होते हैं, उनसे क्या उम्मीद रखी जाय? इसे उपमा की भाषा में कहा जाए, यदि स्कूल के पीटी अध्यापक के बदले किसी प्रसिद्ध फुटबाल टीम के स्वयंसेवक बच्चों को फुटबाल सिखाएं तो बच्चों पर अन्य खेलों की तुलना में ’फुटबाल-धर्म’ का प्रभाव न पड़े यह कैसे हो सकता है? हम ऐसा तो नहीं सोचते कि किसी स्कूल में राजनीति-विज्ञान सिखाने के लिये राजनैतिक दलों से स्वयंसेवक मांगे जाएं! तब कैसा रहे? बच्चों के अभिभावक फैसला करें कि किस पार्टी के स्वयंसेवक उनके बच्चों को शिक्षा दें। स्वयंसेवक से ऐसी उम्मीद रखें कि वे अपनी पार्टी का प्रचार नहीं करेगें और विरोधी पार्टियों की चर्चा में उनके साथ अन्याय नहीं होगा क्योंकि उनकी भी तो चमड़ी की जुबान है; फिसल जाए तो वे भी क्या कर सकते हैं?

यही सब देख कर धार्मिक शिक्षा के विरोध में आवाज उठने लगी है क्योंकि प्राय: इसका पाठ्यक्रम अनुपयोगी बातों से भरा रहता है। उसमें आध्यात्मिक या नैतिक समस्याओं का जिक्र नहीं होता और न ही धर्म में स्त्रियों का स्थान, अंधविश्वास और आस्था में अंतर आदि समसामयिक समस्याओं का जिक्र होता है। विद्यार्थी सोचने लगते हैं कि उनके धार्मिक कानून का दर्जा संविधान से भी ऊँचा है। आए दिन ऐसी भी शिकायतें आई है कि चर्च के अध्यापक या प्रतिनिधि नरक का डर दिखाकर स्कूलों को अपने प्रचार का हथकन्डा बनाते है। जैसा कि अभी-अभी ’साउथ आस्ट्रेलिया’ राज्य में हुआ कि शहीद-दिवस ( ANZAC Day ) को आनन-फ़ानन में धर्म-प्रचार की गोष्टी बना डाली और न्यू-टेस्टामेन्ट की प्रतियां दबावपूर्वक वितरित की गई। इसके विरोध में आवाज मन्त्री-स्तर तक पहुँचाना आवश्यक हो गया।

प्राय: अभिभावक जो कि मूलधारा के होते हैं, वे विरोध करते हैं यानी आप ऐसा न सोंचे कि विरोध करने वाले प्रवासी या अल्पसंख्यक होंगे। शिकायत करने पर इन अभिभावकों को स्कूल द्वारा बताया जाता है कि बालकों को ’नरक की आग’ के बिना यदि कुछ कहा जाए तो बात के समर्थन में मजबूती नहीं आती! यह भला कैसी सत्यनिष्ठा हुई? सच कहने में तो भय की जरूरत नहीं पड़ती पर केवल पारंपरिक रिवाजों और मान्यताओं को विद्यार्थियों के दिमाग में ठूँसने के लिये डर का सहारा लेना पड़ेगा। पाठ्यक्रम में आधुनिक महत्व की बातों का सर्वथा अभाव होते हुये भी इसके पक्ष में ’समझदार’ लोग यह कहते पाये जाते हैं कि “सभी धर्मों का सार एक है।“ फिर सभी धर्मों के मुँह में “सत्य, अहिंसा, मानवता आदि” उडेल कर अपनी बात की पुष्टि कर दी जाती है। सच तो यह है कि धर्म में नैतिक बातों का केवल संयोगवश जिक्र होता है और अनैतिक शिक्षा से भी परहेज नहीं होता। ’चोरी करना बुरा है’ यह धर्मग्रन्थ में आ जाता है पर ’शोषण’ शब्द इनके शब्दकोष से नदारद है फिर आधुनिक युग की वास्तविकताओं से इनका क्या वास्ता हो सकता है? धर्मग्रन्थ पर तर्क करने तथा ईश्वर-पुत्र ( दूसरे संदर्भों में पैगंबर या देवी-देवता) में आस्था का विरोध करने पर धमकियाँ होती है। विश्वास के हिसाब से देखें तो किसी धर्म में मूर्ति-पूजा का स्वीकृत विधान है तो किसी में मूर्ती-पूजक को काफ़िर या नास्तिक का पर्याय माना जाता है। अपने-अपने धर्मों में खींचने के प्रयास या अपने धर्म को सर्वोपरी बताने के प्रयास यह सिद्ध करते हैं कि ’सार की एकता’ के दावे बिल्कुल खोखले हैं। जब सभी धर्मों के मूलभूत विश्वास, विधान और मान्यतायें अलग अलग हैं तो फिर ’सार की एकता’ कौनसी बला हुई? अच्छी से अच्छी स्थिति में भी रिलिजियस टोलरेन्स अपने शाब्दिक अर्थ में दिखाई पड़ती है याने अपना अस्तित्व बचाने के लिये सभी धर्म एक दूसरे को ’सहन करने के लिये’ राजी हो जाते हैं। यह कैसी सार की एकता हुई?

धार्मिक शिक्षा के नियन्त्रण का यह आलम है कि अभी अभी मेलबोर्न में हॉथोर्न प्राईमरी स्कूल कौंसिल ने बच्चों के अभिभावकों का एक सर्वे प्रारंभ किया था कि वे शाला में धार्मिक शिक्षा के बारे में क्या सोचते हैं? इन सभी स्कूलों में ’विशेष धार्मिक शिक्षा’ के नियमों का पालन शिक्षा विभाग का वेल-बीइंग डिविज़न करवाता है। इस डिविज़न ने कौंसिल को चेतावनी दी कि वह यह सर्वे न करे। क्योंकि ऐसा करना उन्हें ’उत्तेजित’ करने के बराबर है। इस पर स्कूल कौंसिल के एक सदस्य जोन बोरनास ने कहा कि अभी हम कोई परिवर्तन नहीं ला रहे हैं, केवल बच्चों के माता-पिता की राय तक नहीं जान सकते यह तो “चौकाने वाली बात” है। बात बढ़ कर जब मुद्दा कौंसिल के अधिकारों में हस्तक्षेप का हो गया तब जाकर शिक्षा-विभाग को कहना पड़ा कि “हम सर्वे के लिये मना नहीं करते पर इसका हम अनुमोदन नहीं करते।“ हाल ही में एक्सस मिनिस्ट्री के मुख्य प्रशासक डॉ. पेडिसन ने जोर शोर से घोषित किया है कि “गैर-सरकारी स्कूलों के विद्यार्थी धार्मिक शिक्षा से छूट न जाएं इसलिये वे वहाँ कदम रख कर 5 वर्ष का महत्वाकांक्षी मिशन चलाने वाले हैं।“ इस पर अधिकतर बुद्धिजीवियों का कहना है कि डॉ. पेडिसन व उनका धार्मिक ग्रुप वास्तविकता से कितना कटा हुआ है! क्योंकि गैर-सरकारी स्कूल वैसे भी धर्म-आधारित हैं और वहाँ धार्मिक शिक्षा पूरी तरह दी जाती हैं। कुछ नाम मात्र के गैर सरकारी स्कूल धर्मनिरपेक्ष भी हैं और वहाँ पर अभिभावक अपने बच्चों को इसलिये भेजते हैं कि वे किसी भी एक धर्म का प्रभाव अपने बच्चों पर नहीं चाहते हैं। तो फिर वे अपना मिशन कहाँ चलाना चाहते हैं?

मोनाश विश्वविद्यालय के एक शिक्षाविद टोनी टेलर का कहना है “एक्सस मिनिस्ट्री का पाठ्यक्रम अपने आदिम रूप में और शिक्षा विरोधी है । यह धर्म-प्रचारक के उपदेशो का अपरिष्कृत रूप है जो 1950 से दकियानूसी करार दिया गया हैं। मूलधारा की ईसाई स्कूलों को दयनीय शर्म का सामना करना पड़ेगा। यदि कक्षाओं में इस प्रकार की हास्यास्पद, असंगत और खीज़ भरी बकवास पाई गई।“ कहना न होगा भारत के शिक्षाविदों का भी यह कर्तव्य है कि वे धार्मिक पूर्वाग्रह को छोड़ कर खरी-खरी बातों से सरकार और जनता को अवगत करायें ।

  हरिहर झा
मेलबोर्न, आस्ट्रेलिया
hariharjha2007@gmail.com
 
         
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