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इंसान और भगवान

प्रकाशन :गुरूवार, 22 दिसम्बर 2011
दीप्ति मित्तल

“डॉक्टर साब, मेरे बच्चे का ऑपरेशन कर दीजिये वरना वो मर जायेगा... “, रोगी के पिता गिडगिडा रहा था।

“मगर तुमने अभी तक पूरे पैसे जमा नही किये... बगैर पूरे पैसे जमा किये ऑपरेशन का नम्बर नही लगेगा“, राउंड पर आया डॉक्टर बोला।

“कर दूंगा साब दो तीन दिन की मोहलत तो दीजिये..., मेरा बच्चा यहाँ ऐडमिट है... मै कही भाग थोडे ही जाऊँगा।“

“आजकल कुछ लोग ऐसा भी कर डालते है.. “,.डॉक्टर लापरवाही से बोला।

“डाक्टर साब.... “, रोगी का पिता आवेशित हो उठे स्वर को बमुश्किल संयत कर पुनः गिडगिडाने लगा.. “डॉक्टर तो भगवान होते हैं साब...आप तो भगवान...।“

“नही बनना मुझे भगवान.. “, डॉक्टर लगभग चीखते हुए बोला। “जानते हो मुझे भगवान बनाने के चक्कर में मेरे बाप ने अपनी सारी जमा पूंजी लगा दी.. लाखो का कर्ज हो आया उसके सिर पर... पढाई करते करते आधी उम्र निकल गई..कितने स्पेशलाइजेशन कोर्स कर डाले फिर भी अभी तक मेडिकल फील्ड में पूरा सेटल नही हो पाया हूँ...शाम को घर जाता हूँ तो पिता आस भरी नजरों से देखता हैं कि कब मै उसें उधार की जलालत से मुक्त करूगां... भगवान बन कर मैं उसका कर्ज नहीं उतार सकता, इसके लिए मुझे इंसान ही बनना पडेगा।“ कह कर डॉक्टर चला गया और वो बेबस पिता उस मजबूर इंसान को जाते देखता रहा।

  दीप्ति मित्तल
403-डाहलिया, न्याति मिडोज, वडगॉवशेरी,पुणे (महाराष्ट्रा), पिन – 411014 मो. 9595886864
 
         
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