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चार कविताएँ

प्रकाशन :शुक्रवार, 15 अप्रेल 2011
डॉ. वंदना मुकेश

ज्वालामुखी

भीतर ही भीतर धधकता
एक ज्वालामुखी
इंतहा की क़गार तक
शब्द बन फट पड़ता जब
पिघलता सीसे-सा...

जलते हम ही,
भीतर की आग से
बिखरते राख से
बाहर-भीतर
रिक्त...

किसान


धरती की बिवाइयों को
सहलाता, दुलराता
तकता,
लगा टकटकी
ऊपर।
पथराई आँखों में लेकर
एक बूँद की आशा।

काश...

काश...
तुम बर्फ़ बन जाते
नहीं फटते बम कहीं
और न होती कोई हिंसा।
बाज़ारवाद और बचपन

नन्हीं गुड़िया को
उसकी गुड़िया-
बार्बी के लिये चाहिये;
मिनी कार, फ्रिज, एयर-कंडीशनर
और चाहिये
स्विमिंग, जॉगिंग और डांसिंग के
खास किस्म के कपड़े औ जूते।

बचपन अब रहा नहीं बचपन,
वह बन गया उपभोक्ता
औ आसुरी संस्कृति का संवाहक,
संसार संहारक।

बादल

जब भी देखता है वह-
सूखी धरा को,
मौन ज़रा को,
भर आता है दिल उसका,
डबडबाती हैं आँखें,
लेकिन-
नये कायदों के तहत
रो भी न पाता है।
 
         
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