SrijanGatha

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अन्तरराष्ट्रीय मंच



 क्रांति है प्रेम
कैसे इतना
उलट -पलट जाता है सब कुछ
प्रेम में
प्रेम करके जाना
कि प्रेम एक क्रांति है
एक आश्चर्य
विलीन हो जाता है अहंकार
एक पवित्र औदात्य में
शब्द अपने केंचुल उतार
धारण कर लेते हैं नए
अनछुए अर्थ
खुद हम हो उठते हैं इतने नए कि
मुश्किल हो जाये पहचान
अपनी ही
कैसे तमाम बड़ी -बड़ी बातें भी
बेमानी लगने लगती हैं
रूमानी बातों के आगे
यह जान सकता है
कोई
प्रेम करके ही|
क्या नहीं ?
सीपियों में
मोती का बनना
छीमियों में दानों का उतरना
जाना
तुमसे मिलने के बाद
कहाँ जानती थी क्या होता है प्रेम
तुमसे मिलने से पहले
भरोसा भी कहाँ था
किसी पर
कहाँ पता था यह भी कि प्रेम
एक ही बार नहीं होता
जीवन में..कल्पना में ..बसते हैं
असंख्य प्रेम
कहाँ जाना था
तुमसे प्रेम से
पहले
अब जबकि हो बहुत दूर
फड़फड़ाते होंगे
तुम्हारे होंठ
जब तितली होती हूँ यहाँ
पढ़ते होगे तुम वहाँ
मेरी सांसों की लिखी चिट्ठी
किसी चुराए क्षण में
सच कहना
क्या नहीं?
कविता
तुम्हारी आँखों के
स्वच्छ नीले विस्तार में
एक कविता पढ़ी थी मैंने
कविता में पक्षियों की चहक थी
सुबह के टटकेपन के साथ
चौराहों पर उसी वक्त बिकने को खड़े
मजदूरों की बेचैनी भी
जंगलों की हरियाली थी
कटते पेड़ों का रूदन भी
फूलों की ताजगी और खुशबू थी
बाल-श्रमिकों के मुरझाएं चेहरे भी
समुद्र की उद्दाम लहरें थीं
छोटी-बड़ी कई धाराएं भी
जिन्हें एक बड़ी धारा में बदलना था
जाने कैसे तुम्हारी आँखों में
घिर आए हैं काले-काले बादल
देखो मेरी कविता आँसू बनकर
बरस ना जाए |