ताना-बाना
तेरी यादों के सिरहानेमेरे हाथों की उंगलियाँ
दबी है
तुम्हारी नींदों के पैताने
संतरियों के पाँव
खरे है
क्या
प्यार का दरवाजा
किसी को
बहार आने ही नहीं देता
या
फिर किसी का
परवेश निषेध करने को
हमेशा खुला रहता है
साँझ का उल्लू
सुबह बोलता तो नहीं
किन्तु वह
जैसे देखता ही रहता है
क्यों न तुम
भोर की मांद से
बहार झांक कर
एक जोड़े बुलबुल का
चहकना सुनो
यदि किसी ने
तुम्हे प्यार ही दिया है
तो
उसकी गर्माहट की ऊन से
तुम अपनी शाल में
इन्द्रधनुषी रंग का
ताना बना बुनो
उदास शाम
अंधकार की
काली चादर ओड़
उच्चारती कोई नाम
एक उदास शाम
आया नहीं
जो लौट
अपने धाम
मौन हुआ
पंछियों का कलरव
उजाले में दिन के
कौन हुआ पंथहीन
रात में उभरेगा
कोई नाम
काली चादर ओड़
उच्चारती कोई नाम
एक उदास शाम
आया नहीं
जो लौट
अपने धाम
मौन हुआ
पंछियों का कलरव
उजाले में दिन के
कौन हुआ पंथहीन
रात में उभरेगा
कोई नाम


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