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सिमटता आदमी

आकांक्षा यादव
 
 
सिमट रहा है आदमी

हर रोज अपने में

भूल जाता है भावनाओं की कद्र

हर नयी सुविधा और तकनीक

घर में सजाने के चक्कर में

देखता है दुनिया को

टी. व्ही. चैनल की निगाहों से

महसूस करता है फूलों की खुशबू

कागज़ी फूलों में

पर नहीं देखता

पास-पड़ोस का समाज

कैद कर दिया है

बेटे को भी

चहारदीवारियों में

भागने लगा है समाज से

चौंक उठता है

कॉलबेल की हर आवाज़ पर

मानो

खड़ी हो गयी हो

कोई अवांछित वस्तु

दरवाजे पर आकर।
 
 

 

  

 
         
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