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सदियों की आग

प्रकाशन :मंगलवार, 16 नवम्बर 2010
उषा राजे सक्सेना
कभी कभी
लगता है
हर गुज़रा हुआ दिन
एक फ़रियाद है
जिसे कोई सुनना नहीं चाहता

अँधेरे की बाहें लम्बी होती जा रही हैं,
खु़दग़र्ज़ हाथो में पकड़ी माचिस
बारूद की शक्ल अख़्तियार
करती जा रही है

इस दह्यत भरे माहौल में, मैं
ख़ुद को ऊँचे पहाड़ों के बीच
खड़ी पाती हूँ ।

धीरे-धीरे
मेंरे चारो ओर
असंख्य अर्ध-मृत आत्माएं
रत्ती भर ज़िंदगी, और
साँस भर मुक्त हवा के लिये
बेचैनी से करवटें बदलती हुई
सिर उठाने लगती हैं

मुझे अपने अंदर
सिर हिलाती
ख़ामोश रेंगती
बेचैन भीड़ का एहसास होता है,
जिसमें बाहर बर्फ़ की ठंडक,
और, अंदर
सदियों की आग पिघल रही होती है
  उषा राजे सक्सेना
54 Hill Rd, Mitcham,
CR4 2HQ, UK
दूरभाषः 00 44 208 640 8328
मो. 00 44 7871582399
भारत- 00 91 9960260771
usharajesaxena@gmail.com
 
         
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