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राजेंद्र परदेसी की दो कविताएँ

प्रकाशन :मंगलवार, 27 दिसम्बर 2011
राजेंद्र परदेसी

नदी में आकाश

शब्द
मौन हो गए
सुबह के उजाले में
कान में फुसफुसाया सूरज
जब ढलान पर था
क्षितिज पर बन गयी
पगडण्डी
आहिस्ता - आहिस्ता
सप्तरंगी किरणों से
नदी में आकाश
वृद्ध के थके कंधे पर
विश्वास भरा हाथ
उजरे उपवन में
खिल गए फूल
बिखरने लगी
संवेदनाओं की गंध
चिरयों का शोर
अस्तित्वान
खुशगवार मौसम
ढून्ढ ही लेगा
विश्वास
जीवन अपना
जवाब

चाहो तो

यादों के बाजार से
तुम भी
कुछ ले लो
प्यार की पैकिंग पर
डेट न देखो
सावन के
झूले ही ले लो
पेंगो की ऊँचाई में
इसकी कजरी
मेहंदी रचाए मिलेगी
और
यह रही
संबंधों की
बुरादे वाली अंगीठी
इसमें
जब भी तुम
कोई पकवान या
चाय पकाओगे
तुम्हे
इसकी सुगंध
और स्वाद
प्रकृति से जुडी मिलेगी
बांस की लाठी तो
शेष हो चली
चाहो तो
एक बांसुरी ही
ले लो
  राजेंद्र परदेसी
बी-1118, इंदिरा नगर,
लखनऊ-226016
rajendrapardesi@gmail.com
 
         
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