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तीन कविताएं

प्रकाशन :रविवार, 5 दिसम्बर 2010
सुधा ओम ढींगरा
पहचान
रिश्तों की
गहरी खोह में
उनकी गर्माहट लेने
जब भी जाने की कोशिश की
अपेक्षाओं का विषधर
फन फैलाए खड़ा था ।
कई बार डसा उसने,
रिश्तों की पहचान फिर भी ना हुई ।
ज़िन्दगी
जीवन की भट्ठी में
भावनाएँ
संवेग
अभिलाषाएँ
इच्छाएँ
दानों सी भून डालीं ।
जीवन का साथ फिर भी ना मिला
ज़िंदगी बालू सी हाथ से सरक गई ।
विचार
आते तो हैं
स्वछंद,
उन्मुक्त बाला से
क़लम पर बैठते ही
दुल्हन से हो जाते हैं
शब्दों की ओढ़नी
शिल्प के आभूषण
कथ्य की पाजेब पहन
भिन्न -भिन्न स्वरूप धरते हैं
कैसे सुन्दर सजते हैं

कई रंगों
कई रूपों
कई विधाओं में
बंध कर इठलाते हैं

खिलंदड़े
कागज़ों से लिपटे
पुस्तकों में बंद
चुप पड़े रहते हैं

जैसे इंतज़ार हो किसी का
कोई आए, उनका घूँघट उठाये...
  सुधा ओम ढींगरा
सुधा ओम ढींगरा
101 Guymon Ct., Morrisville, NC-27560. U.S.A.
sudhadrishti@gmail.com
 
         
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