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जयप्रकाश मिश्र की दो कविताएँ

प्रकाशन :सोमवार, 26 दिसम्बर 2011
जयप्रकाश मिश्र

बीज

ये जो मैल से चीकट
कपड़ों में लिपटे बच्चे हैं
इनके अन्दर
सोया है एक निरंकुरित बीज।
इस बीज में बंद है
एक हताश अंकुर
हरित-क्रान्ति के सपने संजोये।
बाहरी दुनिया
देखने को फराफराता हुआ
यह बीज
बिना सड़े-गले .....
बिना अन्खुआये
आज भी पड़ा है
शायद यहाँ की जलवायु
अनुकूल नहीं है।

पेड़ , साया और जमीन

कितनी
अजीबो -गरीब हो गयी है
यह दुनिया भी ।

जहां पेड़ हैं
वहां साया नहीं
और
जहां साया है
वहां पेड़ नहीं हैं।

कहीं -कहीं
पेड़ और साया दोनों हैं
मगर जमीन नहीं है
बैठने भर की।

आखिर क्या लाभ है मुझे
पेड़ ,साया और जमीन
होते हुए भी
जल रहा हूँ धूप में।
  जयप्रकाश मिश्र
ग्राम-बिजौरी, पोस्ट-गुठीना,
जिला-फर्रुखाबाद,
205302 (उत्तर प्रदेश),
मो.-9369772012

mishrajayprakash262@gmail.com
 
         
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