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अशोक कुमार पांडेय की तीन कविताएँ

प्रकाशन :सोमवार, 1 मार्च 2010
अशोक कुमार पांडेय

इन दिनों बेहद मुश्किल में है मेरा देश

दरवाज़े की कोई भी खटखट हो सकती है उनकी
ज़रूरी नही कि रात के अँधेरों ही में हो उनकी आमद
किसी भी वक़्त हमारी ज़िंदगी में
उथल-पुथल मचा सकती है उन बूटों की आवाज़
इन दिनों संविधान की तमाम धारायें संवेदनशील हैं
कविताओं के बाहर बोलने पर
मंदिरों की तरह है देश की सुरक्षा इन दिनों

ज़रूरी नहीं कि हथियार हों आपके हाथों में
उनकी बन्दूकों के सामने अप्रस्तुत होना पर्याप्त है
पर्याप्त हैं अख़बार की कुछ कतरनें
फ़ुटपाथ से ख़रीदीं कुछ किताबें
लिख दिया गया कोई सपना- गा दिया गया कोई गीत
पूछा गया एक असहज प्रश्न
यहाँ तक कि किसी दोस्त की लाश पर गिरा एक आँसू भी

इन दिनों बेहद मुश्किल में है मेरा देश
जितना अभी है कभी ज़रूरी नहीं था विकास
जितने अभी हैं कभी उतने भयावह नहीं थे जंगल
जितने अभी हैं कभी इतने दुर्गम नहीं थे पहाड़
कभी इतना ज़रूरी नहीं था गिरिजनों का कायाकल्प

इन दिनों देशभक्ति का अर्थ चुप्पी है और सेल्समैनी मुस्कराहट
कुछ भी असंगत नहीं चाहते वे इस आपातकाल में!

परिचय

यहाँ दर्ज़ करना है अपना नाम
वे डिग्रियाँ जिन्हें पलट कर भी नहीं देखा वर्षों से
विस्तार से देनी है जानकारी उस दफ़्तर की
जिसमें घुसते ही
थोड़ा और छोटा हो जाता हूँ मैं
पता लिखना है उस घर का
जिसके लिये गिरवी पड़े हैं
मेरी ज़िंदगी के बीस साल

यहाँ दर्ज़ करनी है एक जाति
जिसके दाँतों पर लहू है हजार बरस पुराना
एक धर्म... जिसे वर्षों पहले कर चुका जीवन से बहिष्कृत
लिखना है एक देश का नाम
जो कभी हो ही नहीं सका मेरा

यहाँ दर्ज़ करनी हैं तमाम ऐसी कार्यवाहियाँ
जिनके बदले लिखा जा सकता है
सिर्फ़ एक शब्द ... समझौता!

एक तस्वीर चिपकानी है
सबसे अस्वाभाविक मुद्रा में
एक तिथि लिखनी है उस घटना की
जिसके लिये कतई ज़िम्मेदार नहीं मैं

कितना कठिन है
इन सबके बाद
कविता लिखने वाले हाथों से
एक अजनबी भाषा में
दर्ज़ करना अपना हस्ताक्षर

उधार माँगने वाले लोग

छोटी हो चादर
तो पाँव न होना ही बेहतर
झुका ही रहता है हमेशा
माँगने वाले का सर
रहिमन वे नर मर चुके ...
सब याद था
उन पसरी हुई हथेलियों को

सुन रखे थे उन्होंने भी
अपमान और बरबादियों के तमाम क़िस्से
संतोष एक पवित्र शब्द था उनके भी शब्दकोष का
लालच से नफ़रत करना ही सीखा था
पूरी हिम्मत से बांध कर रखी थी मुट्ठियाँ

चुपचाप नजरें झुकाये गुज़र जाते थे बाज़ार से
आ ही जाये दरवाज़े पर तो कस देते थे सिटकनियाँ

दूर ही रखा जीभ को स्वाद से
पैरों को पंख से
आँखों को ख़्वाब से
फिर भी
पसर ही गईं हथेलियाँ एक दिन...

दरवाज़ों के दरारों से
पता नहीं कब सरक आईं ज़रूरतें
पता नहीं कौन से रोग
जाते ही नहीं जो चूरन और काढों से
पता नहीं कौन सी भूख
मिटती ही नहीं जो मेहनत से
सपनों को तो ख़ैर
हर बार कर दिया परे
पर इनका क्या करें

जान ही न हो शरीर में
तो कब तक तना रहे सिर
भूख के आगे
बिसात ही क्या कहानियों की

और पसरीं वे हथेलियाँ यहाँ-वहाँ
मरे वे नर मरने के पहले बार-बार
झुका उनका सिर
और मुँह को लग गई आदत छुपने की
लजाईं उनकी आँखें और इतना लजाईं
कि ढीठ हो गईं

वो मुहावरे अब भी याद हैं उन्हें
हँसते हैं तो कभी सुबकते हैं अकेले में
तो कभी गरियाते हुए मुहावरे की माँ को
पसार देते हैं हथेलियाँ फिर भी

  अशोक कुमार पांडेय
भावना रेसीडेंसी, सत्यदेवनगर, गांधी रोड
ग्वालियर, मध्यप्रदेश- 474002
मो.- 94257-87930
ई-मेल- ashokk34@gmail.com
  अशोक कुमार पांडेय

 
         
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