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सभी हैं रंग फीके से

प्रकाशन :मंगलवार, 20 दिसम्बर 2011
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
सभी हैं रंग फीके से,
धरा के रंग के आगे।
इन्हीं को देखकर सोये हुए,
अनुभाव हैं जागे।

चलाई कूचियाँ अपनी,
सजाया कल्पनाओं को।
लिए हैं रंग कुदरत से,
बनाया अल्पनाओं को।
बुनी चादर जुलाहों ने,
लिए रंगीन से धागे।
इन्हीं को देखकर सोये हुए,
अनुभाव हैं जागे।

उकेरे शब्द कवियों ने,
किया साहित्य का संगम।
पहाड़ों के शिखर से,
हो रहा धाराओं का उदगम।
लगा ऐसा कि जैसे,
मिल गये मोती बिना माँगे।
इन्हीं को देखकर सोये हुए,
अनुभाव हैं जागे।

  डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
टनकपुर रोड, खटीमा, ऊधमसिंहनगर, उत्तराखंड, भारत - 262308. Phone/Fax: 05943-250207, Mobiles: 09368499921
 
         
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