जो कुछ भी घटा 

उसके अंतस में तुम थे
जो कुछ भी घट रहा है
उसके भी अंतस में तुम हो
तुम्हीं लिखा रहे हो कवितायें
तुम्हीं दिखा रहे हो नौकरी के विज्ञापन
सोचता हूँ करलूं पीएच डी भी
तो और भी निखरेगा तुम्हारा सौंदर्य
मैं तुम्हें नहीं जानता
मैं तुम्हें नहीं पहचानता
जानूं या पहचानूँ भी कैसे
देखा ही नहीं तुम्हें जागती आँखों से
किस - किस में टटोला है तुम्हारा होना
शायद ही बचा हो कोई कोना
पर तुम कहाँ मिली
जैसे पत्थर की मूर्ति में साँसें
तुम नदारद थे
काश! मेरे पास भी होता वह पैराशुट
इस जलते हुए विमान से निकल पाता सुरक्षित
और आहिस्ता - आहिस्ता विचरते हुए हवा में
देख पाता वह मैदान .....
टीलों , नदियों और पहाड़ सा तुम्हारा प्यार.....
जयप्रकाश मिश्र
ग्राम-बिजौरी, पोस्ट-गुठीना,
जिला-फर्रुखाबाद,
205302 (उत्तर प्रदेश),
मो.-9369772012
mishrajayprakash262@gmail.com
जिला-फर्रुखाबाद,
205302 (उत्तर प्रदेश),
मो.-9369772012
mishrajayprakash262@gmail.com


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