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पैराशुट

प्रकाशन :रविवार, 29 जनवरी 2012
जयप्रकाश मिश्र
जो कुछ भी घटा
उसके अंतस में तुम थे
जो कुछ भी घट रहा है
उसके भी अंतस में तुम हो
तुम्हीं लिखा रहे हो कवितायें
तुम्हीं दिखा रहे हो नौकरी के विज्ञापन
सोचता हूँ करलूं पीएच डी भी
तो और भी निखरेगा तुम्हारा सौंदर्य
 
मैं तुम्हें नहीं जानता
मैं तुम्हें नहीं पहचानता
जानूं या पहचानूँ भी कैसे
देखा ही नहीं तुम्हें जागती आँखों से
 
किस - किस में टटोला है तुम्हारा होना
शायद ही बचा हो कोई कोना
पर तुम कहाँ मिली
जैसे पत्थर की मूर्ति में साँसें
तुम नदारद थे
 
काश! मेरे पास भी होता वह पैराशुट
इस जलते हुए विमान से निकल पाता सुरक्षित
और आहिस्ता - आहिस्ता विचरते हुए हवा में
देख पाता वह मैदान .....
टीलों , नदियों और पहाड़ सा तुम्हारा प्यार.....
  जयप्रकाश मिश्र
ग्राम-बिजौरी, पोस्ट-गुठीना,
जिला-फर्रुखाबाद,
205302 (उत्तर प्रदेश),
मो.-9369772012

mishrajayprakash262@gmail.com
 
         
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