माँ
ट्रैन की सूचना मिलते ही
वह अपने बेटे को ले तैयार थी.
अपनी फटी पुरानी साड़ी को समेटे
प्लैटफॉर्म पर बैचन नज़रों से देख रही थी.
अपने आठ साल के पुत्र का हाथ थामे
घर से निकली, पता न था वह क्यों, कहाँ जा रही थी
वह बेबस थी, लाचार थी, स्वाभिमानी भी
पति को परलोक गए साल न हुआ था
ससुराल वालों ने सड़क पर ला खड़ा किया था
एक छोटा सा पोटला, जो उसका संसार था
निकली अपने बेटे के लिए आसमान जय करने
मन का अटूट विश्वास उसकी पूंजी
नन्हीं उँगलियों को थामे निकाल पड़ी
ट्रैन की सीटी पर दिल सहम गया, क्या वह ठीक थी?
वह एक स्वाभिमानी माँ थी जो जय करना चाहती थी.
भीड़ ने जब धकेला, नयी स्फूर्ति के साथ विरोध किया
अपनी नन्हे संसार से वास्तविक संसार को जय करने निकाल पड़ी ......


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