आवश्यक नहीं वही लिखा जाए जो पाठक चाहता है |
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कथोपकथन |
साक्षात्कारः जयप्रकाश मानस
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| संपादक, धरती, जयपुर, राजस्थान | |
मानस – शैलेन्द्र जी आप समकालीन कविता और कहानी के गलियारों ने विगत कई दशक से घूमते-फिरते नज़र आ रहे हैं । इस भ्रमण को कैसे देखते हैं अब ?शैलेन्द्र जी – भाव-भूमि तो यह रही कि मैं पिता के साथ विदिशा जिले के गाँवों और फिर विदिशा में अकेला रहता था। पिता प्रायमरी स्कूल में शिक्षक थे। माँ गाँव पर थीं। छोटे भाई-बहनों के साथ पिता गुस्सैल थे। बात-बात में गाली-गलौच करते। मैं डिप्रेस रहता। अच्छी बात यह थी कि वह पढ़ते बहुत थे। घर में पत्रिकाएँ, किताबें हमेशा मौजूद रहती थी। सो खाली समय में मैं उन्हें उलटत-पलटता और इच्छा होने पर पढ़ता । धीरे-धीरे मेरी रुचि साहित्य पठन पाठन में विकसित होती गई। साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, सारिका, कादंबिनी इन पत्रिकाओं में साहित्य और विज्ञान से संबंधित रचनाएँ पढ़ता। कभी-कभी किताबों को टटोलता और कहानी, कविता, उपन्यास पढ़ डालता। यह समय थात 1964 से 197मानस - तक का। यानी मेरे हायर सेकण्डरी स्कूल का। यही वह महत्वपूर्ण प्रभाव था जिसने मुझे बाद में लेखन के क्षेत्र में आने को प्रेरित किया। मानस – तो आपकी सृजन यात्रा कब और कहाँ से प्रारंभ होती है ?शैलेन्द्र जी – हायर सेकण्डरी पास करने से पहले ही मैंने कुछ कविताएँ लिखी थीं जो एक दिन मैंने स्वयं फाड़ कर गाँव के पोखर में बहा दीं। मुझे उनमें परिपक्वता नहीं दिखी। और फिर मुझे पिता से भी डर लगता था कि कहीं वह देख न लें। पर जब मैंने कॉलेज में एडमिशन लिया और अपने कुछ मित्रों को मैंने बाद की लिखी रचनाएँ पढ़वाई तो उन्होंने मुझे लिखते रहने को प्रोत्साहित किया। हमारे पीछे उन दिनों किव जगदीश श्रीवास्तव रहते थे। वह सिरोंज हायर सेकण्डरी स्कूल में शिक्षक थे। एक दिन की बातों ही बातों में कहा गुरु तुम कुछ लिखते ज़रूर हो। तुम्हारी बातें तुम्हारे साहित्यिक रुझान से ऐसा लगता है। उनके काफी आश्वस्त करने पर और प्रेरित करने पर मैंने उन्हें अपनी रचनाएँ पढ़वाई। वह बोले तुममें संभावना है, लिखते रहो। एक वर्ष बाद मैंने इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया और अपने एक अभिन्न मित्र कृष्णानंद की सहायता से लायब्रेरी का सदस्य बन गया। वहाँ से लगातार साहित्यिक किताबें लेकर पढ़ीं। कृष्णानंद से बातें करता। उसकी साहित्यिक जानकारी बहुत थी, यद्यपि वह विज्ञान का छात्र था। उन्हीं दिनों मैंने ट्यूशन करने का सोचा, एक अन्य मित्र कैलाश सत्यार्थी ने मुझे एक ट्यूशन दिला दी। दसवीं कक्षा का छात्र था वह। मुझे गणित और साइंस पढ़ाना था। उस छात्र के बड़े भाई के साप्ताहिक अख़बार निकालते थे और दैनिक वीर अर्जुन अख़बार में संवाददाता थे। उन्होंने वीर अर्जुन का पता देकर कहा इसमें आप रचनाएँ भेजिए, छपेंगी। मेरी पहली कहानी जो वहाँ छपी – वह थी ‘दादी’। तब तक मैं कहानियाँ भी लिखने लगा था। यह सन 1974-75 की बात है। फिर दो-एक कहानियाँ व कुछ कविताएँ भी वहाँ छपीं। तदुपरांत देशबंधु रायपुर एवं दैनिक भास्कर भोपाल में मेरी कहानियाँ और कविताएँ आईं। मानस – समाचार पत्रों से आगे पत्रिकाओं का रुख़ कैसे हुआ ?शैलेन्द्र जी – मेरे मित्र कृ़ष्णानंद ने ही मुझे पत्रिकाओं के साथ पत्राचार की सलाह दी। मैंने तब श्री धर्मवीर भारती और श्री कमलेश्वर से पत्राचार किया, संकोच और डर के मारे रचनाएँ नहीं भेजी। हाँ कादंबिनी में प्रवेश स्तंभ में एक कविता भेज दी, जो प्रकाशित हुई और उस पर बहुत से पत्र आए। इस तरह बात आगे बढ़ी और लघु पत्रिकाओं तक पहुँच गई। श्री स्वप्निल शर्मा मनावर, धार से एक पत्रिका उन दिनों निकालते थे ‘यथार्थ’। उन्होंने कविताएँ बुलाई और प्रकाशित कीं। मधुरा से श्री सव्यसाची ‘उत्तरगाथा’ प्रकाशित करते थे। उसमें मेरी एक कविता ‘संकल्प’ छपी। धीरे-धीरे सभी पत्रिकाओं में मैं छपने लगा। मानस – आपकी पुस्तक ‘नौ रुपए बीस पैसे के लिए’ 1983 में आती है। फिर ‘श्वेतपत्र’ को 19 वर्ष, लगभग दो दशक क्यों लग जाते हैं? आपका रचनाकार उस अंतराल में कहाँ चूकने लगा था ? जबकि फिर 2002 और 2004 में आपकी कृतियाँ साहित्यिक संसार में प्रविष्ट होती हैं। अपनी संपूर्ण रचना-यात्रा को किस तरह संतुष्टिप्रद पाते हैं ?शैलेन्द्र जी – सन 1980 से 1983 तक इलाहाबाद में था। वहाँ श्री ज्ञानरंजन, संपादक पहल, मेरी मुलाकात श्री शिवकुमार सहाय जो परिमल प्रकाशन के मालिक थे उनसे करा देते हैं। ज्ञान जी पहल छपवाने के सिलसिले में इलाहाबाद आए हए थे। फिर सहाय जी मुझे नहीं छोड़ते। बहुत अधिकार और स्नेह से कहते संकलन दीजिए, इसी वर्ष छापना है। तब तक मेरी ऐसी कोई तैयारी नहीं थी। संकलन देने की। मुझे लग रहा था कि यह थोड़ा ज़ल्दबाजी का मामला है। मैं वक्त चाहता था। पर सहाय जी की जिद और कुछ मित्रों के प्रेरित करने पर मुझे अपनी पत्नी मीना के सहयोग से पाण्डुलिपि तैयार करनी पड़ी, जो 1983 में ‘नौ रुपए बीस पैसे’शीर्षक से आई। उसके बाद मुझे लगा कि अब बीच में कम से कम तीन-चार वर्ष का गैप तो होना ही चाहिए। सो निश्चिंत हो गया। पर कविताएँ और कहानियाँ नियमित लिखता रहा जो पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं। फिर मेरे लगातार होने वाले स्थानांतरणों के कारण भी मैं पुस्तक प्रकाशन की ओर ध्यान नहीं दे सका। यहाँ एक और बात का ज़िक्र आवश्यक है कि इस बीच प्रकाशन का स्वरूप और रणनीति में परिवर्तन होता है। कविताएँ प्रकाशित नहीं हो पातीं, कहानी और उपन्यास की माँग बढ़ जाती है। चूँकि मैं इलाहाबाद से कानपुर, कानपुर से मुरादाबाद, कोटा, जयपुर, गाजियाबाद, फरीदाबाद फटाफट स्थानांतरित हो रहा था, सो पुस्तक प्रकाशन की ओर ध्यान ही नहीं गया। 1995 में पुनः सहाय जी का फोन आया आपका कहानी संग्रह देना है जल्दी से कहानियाँ भेजिए। आठ-दस कहानियाँ थीं इकट्ठी कर के भेज दीं। कहानी संग्रह 1996 में आया ‘नहीं यह कोई कहानी नहीं’। अब फरीदाबाद से भी मेरा डेरा लद गया। नागपुर पहुँचा, वहाँ से आगे चंद्रपुर भेज दिया गया। फरीदाबाद में रहते हुए मैं आलोचना में अधिक सक्रिय हो गया था। नागपुर और चंद्रपुर प्रवास में भी मैंने इसी ओर अधिक ध्यान दिया। स्थानीय दैनिक लोकमत समाचार में पुस्तक समीक्षाएँ विस्तार से लिखता। जनसत्ता, अक्षर पर्व, वर्तमान साहित्य, कृति ओर एवं कुछ अन्य पत्रिकाओं में आलोचनात्मक लेख लिखता। इस बीच कविताएँ भी आती रहीं। एक दिन श्री जगदीश श्रीवास्तव मथुरा में मिले और अपना प्रकाश प्रारंभ करने की सूचना दी और लगे हाथ मेरी कुछ कविताएँ जो मैं श्री रामकुमार कृषक को देने के लिए ले गया था वे उन्होंने फोटोकॉपी करके अपने पास रख लीं। यह अजीब स्थिति थी। मैं नहीं जानता था कि वह कैसे प्रकाशित करेंगे, पर पुराने संबंधों का ख्याल भी रखना था, सो चुप रहा। उन्होंने 2002 में ‘श्वेतपत्र’ का प्रकाशन किया। 2मानस -मानस -4 में ‘ईश्वर की चौखट पर’ छपा। मेरी सक्रियता निरंतर बनी हुई थी। पर पुस्तक प्रकाशन अवश्य विलम्बित होता रहा। मानस – पैतृक स्थान मैनपुरी, विदिशा में शिक्षा, जयपुर में बस गए और कई-कई स्थानांतरणों के बीच बड़ौदा में कर्मरत। भूगोल को किस तरह आप अपनी रचनाओं के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं ? भूगोल किस हद तक रचनाकारों को अपनी इमेज में लपेटने में कारगर होता है ? गाँ और शहर को एक रचनाकार और एक रचनाधर्मिता की दृष्टि से किस तरह चरितार्थ करते है आप ?शैलेन्द्र जी – बहुत अच्छा प्रश्न किया आपने। मध्यकाल में संत कवि निरंतर घूमते रहते थे। उनका भौगोलिक ज्ञान उनकी रचनाधर्मिता को संवर्धित करता था और धार भी पैदा करता था। वे बहुधर्मी और विविध रुचि व लसंस्कार के मनुष्यों को पास से देखते थे। उनकी यह सधुक्कड़ी और घुमक्कड़ी उनके सृजन को सशक्त एवं संप्रेषणीय बनाती थी। राहुल सांकृत्यायन ने तो घुमक्कड़ी को बाकायदा शास्त्र के रूप में देखा। निश्चित तौर पर अनुभव की विविधता से साहित्य सृजन समृद्ध और बहुकोणीय हो जाता है। उसमें संश्लिष्टता और गहरी संवेदना आती है। यथार्थ और पैनापन भी आता है। मानस – आप युवा रचनाकारों में एक खास मुकाम में देखे जाते हैं, पाठकीय प्रतिक्रिया इस बीच कैसी रही, उस प्रतिक्रिया पर आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी ?शैलेन्द्र जी – दरअसल पाठकों का मुझे प्रारंभ से ही भरपूर स्नेह मिला है। मेरी सोच, शैली अभिव्यक्ति और प्रस्तुति सब सहज एवं स्वाभाविक रहे हैं। वे आरोपित नहीं हैं। इसलिए मेरी अपनी एक खास जगह है। पाठकों की हर प्रतिक्रिया मेरे लिए महत्वपूर्ण होती है। कभी-कभी तो वे एक गंभीर चुनौती पेश करते हैं। आपको उस चुनौती का मुकाबला करना होता है। यह आवश्यक नहीं कि वही लिखा जाए जो पाठक चाहते हैं, हमारी अपनी चेतना और समझ भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। पर पाटकों की हर प्रतिक्रिया का मैं पूरा सम्मान करता हूँ। मानस – आप अंतरजाल पर भी सक्रिय रहे हैं। क्या आप समझते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम प्रकाश माध्यम को लगातार कोने में रखने के लिए सक्रिय है ? क्या आप यह भी सोचते हैं कि इंटरनेट मीडिया आने वाले दिनों में पश्चिमी दुनिया की तरह प्रिंट मीडिया को पीछे धकेल देगा ?शैलेन्द्र जी – दोनों का अपना महत्व है। यह संभव है कि कभी ऐसा हो कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रिंट मीडिया को गहरी चुनौती दे दे, पर तब भी प्रिंट मीडिया का अपना अस्तित्व कायम रहेगा। पश्चिमी देशों में भी पूरी तरह से प्रिंट मीडिया को समाप्त नहीं किया जा सका है। मानस – आपने अपने अग्रज रचनाकारों यथा त्रिलोचन, शील जी पर भी ‘धरती’ के संपादन के माध्यम से महत्वपूर्ण काम किया है। इन रचनाकारों के योगदान को आप किस तरह आँकते हैं ?शैलेन्द्र जी – बाबा नागार्जुन, त्रिलोचन जी, शील जी, शमशेर जी, मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल बड़े रचनाकार थे। हिंदी साहित्य को उनका महत्वपूर्ण अवदान रहा। इन लोगों का सानिध्य, मुक्तिबोध को छोड़ कर यदा-कदा प्राप्त होता रहा। इन लोगों से बहुत सीखने-समझने को मिला है। ‘धरती’ के कुछ अंक अच्छे निकले, लोगों ने उसकी सराहना की है। मानस – आप अपने समकालीन कवियों और कहानीकारों में स्वयं को किस तरह पृथक देखते हैं ? मैं यह भी आपसे समझना चाहूँगा कि इस सूची से बाहर जो सृजनरत रहे हैं, उनको आपके नहीं जान-पढ़ पाने का क्या कारण रहा है ? आप अपने समकालीनों की सूची किस आधार पर तय करते हैं ? तथाकथित स्तरीय पत्रिकाओं में रचना-प्रकाशन के आधार पर तथाकथित आलोचकों द्वारा गिनाई गई सूचियों के आधार पर या फिर निजी शोध एवं प्रयत्न से संभव पठनीयता पर ?शैलेन्द्र जी – मेरे समकालीन रचनाकार मित्र अपने साहित्यिक कैरियर को लेकर अति संवेदनशील रहे हैं। कैरियर में गति देने के लिए उनके अपने संसाधन और संपर्क रहे हैं। तथाकथित स्तरीय पत्रिकाओं के संपादकों के भी वे स्नेहपात्र रहे हैं। उन्होंने ढेरों पुरस्कार और बड़े सम्मान प्राप्त किए हैं। लेखन में चर्चित रहे हैं। मेरा यह रास्ता नहीं रहा। मैं अपनी समरेखीय रचनात्मकता को ही ठीक मानता रहा हूँ। बड़े प्रकाशकों, संपादकों, आलोचकों का वरदहस्त ना कभी मेरे ऊपर रहा ना ही मैंने ऐसा कोई प्रयत्न किया। यह एक मूलभूत अंतर रहा। तथाकथित सूचियों के बाहर के रचनाकारों को न जान पढ़ पाने का कुछ कारण ये भी है कि कैसे ऐसे रचनाकारों तक पहुँचा जाए। पत्रिकाओं में रचना-प्रकाशन एक बड़ा स्रोत है। आलोचकों की सूची को मैं बहुत महत्व नहीं देता, वहाँ राजनीति होती है। लेकिन कुछ रचनाकार मुझे पसंद रहे हैं, जैसे कवि अरुण कमल, उदय प्रकाश, ज्ञानेंद्र पति, एकांत श्रीवास्तव। मानस – क्या आप भी मानते हैं कि अक्सर हम साहित्य वाले (खासकर आलोचक) अपनी पहुँच के आधार पर ही किसी विधा के सक्रिय रचनाकारों को परख कर (?) उसकी अंतिम सूची की घोषणा करने के आदी हो चुके हैं, जबकि हिंदी का भूगोल अति विस्तृत है। एक ओर दिल्ली, इलाहाबाद, भोपाल है, दूसरी ओर कहीं सुदूर गाँव देहात हैं, जहाँ अधिक उर्वर और पृथक रचनाकार हैं, मतलब एक समूचा संसार है जिसका मूल्यांकन हम नहीं करना चाहते ?शैलेन्द्र जी – आप बिलकुल सही कह रहे है, अधिकांशतः ऐसा ही हो रहा है आजकल। त्रिलोचन जी ने एक बार कहा था अच्छे रचनाकार अब कस्बों, देहातों से ही निकलेंगे। दिल्ली वालों को तो बसों में चलने, लोगों को मनाने, टीवी, पत्रिकाओं, अकादमियों, संस्थानों आदि में जुगाड़ करने में अधिकांश समय निकल जाता है, उन्हें अच्छा लिखने की फुरसत कहाँ। मानस – एक सच्चे विधा-परीक्षक की पहुँच कहाँ तक होनी चाहिए ? यह किस तरह का इतिहास रचना है साहित्य का ? कुछ पत्रिकाओं में छपने के आधार पर या कुछ संग्रह आ जाने पर इन दिनों आलोचक चिरपरिचित रचनाकारों को गिनाकर शेष की उपेक्षा किए जा रहे हैं। यह उनकी सीमा है या लाचारी या अतिवादिता ?शैलेन्द्र जी – आदर्श रूप में तो एक सच्चे विधा-परीक्षक की पहुँच सुदूर देहातों तक होनी चाहिए। पर सी माएँ तो होती ही हैं। हाँ, जो लोग जान-बूझकर सिर्फ कुछ लोगों को उछाल रहे हैं, वे अच्छा नहीं कर रहे। यह उनके उथलेपन का ही सबूत है और बे-ईमानी का भी। मानस – एक आलोचक के रूप में आप किसी विधा के समस्त रचनाकारों तक कैसे पहुँचते हैं ? क्या आप भी सुविधा के अनुयायी हैं जिसमें यह ज़रूरी होता है कि रचनाकार आलोचक की पसंदवृत्त का चेहरा हो, अनुगामी पत्रिका में छपे, पसंदीदा ख़ेमे का हो, मनमाफिक विचारों का शरणागत हो ?शैलेन्द्र जी – आप बहुत सही बात पर हैं। असल में समस्त रचनाकारों तक पहुँचना मायने नहीं रखता, यह संभव भी नहीं है।हाँ जो अच्छा रच रहे हैं उनकी बहुविध खोज न करना और पता चलने पर उनकी उपेक्षा करना ग़लत है, जो आजकल हो रहा है। बाकी आपका कहना सही है कि अधिकांश आलोचक संकीर्णता के शिकार हैं और अपने दायरे में ही कैद हैं। गुटबाजी अब ख़ेमेबाजी को भी वे प्रश्रय देते हैं। पर हिंदी साहित्य का दुर्भाग्य है कि अधिकतर रचनाकार उन्हें बाइज्ज़त ढोते रहते हैं। मैंने हर वक्त इस प्रवृत्ति के ख़िलाफ अपनी असहमति दर्ज की है और आगे भी करता रहूँगा। मानस – एक आलोचक के रूप में किसी रचना को परखते समय आप किन औजारों को उपयोग में लाते हैं ?शैलेन्द्र जी – रचना की परख के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात जो मुझे लगती है वह यह है कि रचना आपको संवेदित, विचलित या आनंदित करती है या नहीं। उसका कथ्य, निर्वाह, शैली, प्रस्तुति और भाषा किस सीमा तक रचना को प्रभावी बनाने में सक्षम हो पाए हैं। कुल मिला कर यह कि रचना अपना समग्र प्रभाव छोड़ पाने में समर्थ है या नहीं। रचना परिवेश और समय को कितना अभिव्यक्त कर पाती है। मानस – आप अपनी आलोचना में किन पौर्वात्य (और पाश्चात्य भी) सिद्धांतकारों को समीचीन पाते हैं, आज जिनके साँचों में कविता और कहानियों को रखकर आप तटस्थ रूप से उसकी मूल्यवत्ता ज्ञात करते रहे हैं ?शैलेन्द्र जी – कई ऐसे सिद्धांतकार हैं जिनसे कुछ सीखा जा सकता है। लेकिन हर व्यक्ति का अपना एक व्यक्तित्व होता है। आज शास्त्रीयता का समय नहीं है कि एक को मानक के रूप में रखा जाए। पर फिर भी आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ. रामविलास शर्मा, मुक्तिबोध सभी से बहुत कुछ सीखा सकता है। मानस – मैंने पाया है और आप भी देख रहे होंगे – आलोचना का मतलब आज कथ्य में सरोकार की तलाश हो गया है। भाषा, छंद, प्रतीक और प्रतीक और बिम्बों तथा साहित्यिक मूल्य आदि में जाने का जोखिम कम ही आलोचक उठा रहे हैं। आप क्या सोचते हैं ?शैलेन्द्र जी – कथ्य महत्वपूर्ण है। भक्तिकाल, रीतिकाल, वीरगाथा काल प्रत्येक समय में अच्छी रचनाओं में कथ्य को प्रमुखता दी गई है। रचनाकार की दृष्टि भी महत्वपूर्ण होती है। कथ्य में सरोकार भी निहित होता है, पर जैसा कि मैंने पहले कहा है कि कथ्य के साथ भाषा, शैली, निर्वाह, प्रस्तुति का भी महत्व है प्रभावी रचना में। मीडियोकर आलोचक साँचे में बंधी आकृतियाँ ही देख पाते हैं। यह उनकी सीमा है। मानस – क्या ऐसा करने वाला आलोचक एक तरह से संभावित रनचाकारों को साहित्य के नैसर्गिक मूल्यों से दूर नहीं ले जा रहा है ?शैलेन्द्र जी – यह कुछ ऐसा ही है – नीम हकीम खतरे जान। ऐसा अधकचरा आलोचक सिवाय भ्रम पैदा करने के और लोगों को गुमराह करने के अलावा क्या करेगा ?
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