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बुध्दि कहाँ रहती है?

प्रकाशन :शुक्रवार, 6 जनवरी 2012
गोवर्धन यादव

राजा भोज अपनी न्यायप्रियता के लिए जाने जाते थे। एक दिन, एक बालक राजमहल जा पहुँचा। वह राजा से प्रत्यक्ष मिलना चाहता था। द्वारपाल ने उस लडके को द्वार पर रुकने को कहा और अंदर जा कर उस बालक के आने की खबर अपने राजा को बतलाई। राजाजी ने उसे आदर सहित राजदरबार में लाने की आज्ञा दी। एक दस-बारह साल का बालक अपने राजा के सामने खडा था।

राजा ने मुस्कुराते हुए उस बालक से पूछा, बेटा, राज दरबार में तुम्हारा स्वागत है। बोलो किस प्रयोजन से तुम हमसे मिलना चाहते हो तुम जो भी मांगोगे, तुम्हें जरुर मिलेगी. बालक ने निडरता से कहा, महाराज, मैं आपसे कुछ भी मांगने नहीं आया हूँ। मैं तो केवल जिज्ञाशावश आपसे एक प्रश्न का उत्तर जानने आया हूँ। मैंने सुना है कि आपके राजदरबार में बडे-बडे विद्वान आश्रय पाते हैं, तो मैंने सोचा कि उसका उत्तर मुझे यहाँ मिल जाएगा। बस, मैं इसी अभिलाषा से यहाँ चला आया था। राजा ने उसे प्रोत्साहित करते हुए कहा, “हाँ.. हाँ क्यों नहीं। तुम प्रश्न पूछॊ, तुम्हें उसका उत्तर अवश्य मिलेगा।” बालक ने हाथ जोडकर कहा, महाराज, कृपया यह बतलाने का कष्ट करें कि बुध्दि कहाँ रहती है? क्या वह दिल में रहती है? दिमाग में रहती है? या फ़िर पूरे शरीर में रहती है ? प्रश्न बिलकुल सीधा-सादा था, लेकिन उसे सुनते ही राजा के माथे पर बल पड गए, और सभा मे विद्दमान सभी विद्वान गहरे सोच में पड गये। किसी को भी इस प्रश्न का उत्तर खोजे नहीं मिल रहा था. राजा ने एक सरसरी निगाह से पूरे दरबार को देखा। सारे सभासद अपनी गर्दन लटकाए बैठे थे। इससे स्पष्ट था कि किसी को भी इस प्रश्न का उत्तर मालूम नही है।

राजा ने अपने दरबान को बुलाकर कहा, “ इस बालक को फ़िलहाल अतिथि-गृह में आदर के साथ ठहराया जाए. कल सुबह इसका उत्तर दे दिया जाएगा। बालक को अतिथि-गृह में भिजवाने के बाद उन्होंने सभी विद्वान दरबारियों से कल सुबह तक उस प्रश्न का उत्तर खोज निकालकर लाने की आज्ञा दी।

महामंत्री ने रात में चुपके से अथिथि-गृह में जाकर उस बालक से उसका उत्तर जानना चाहा। बालक ने कहा, “ इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए आप मुझे एक हजार स्वर्ण मुद्राएं दें तो मैं इस प्रश्न का उत्तर बतला सकता हूँ। महामंत्री ने एक हजार स्वर्ण मुद्राएं देकर प्रश्न का उत्त्तर जान लिया।

दूसरे दिन राजदरबार में उस बालक को बुलवाया गया और महामंत्री से कह गया कि वे उस प्रश्न का उत्तर दें। महामंत्री ने जवाब देते हुए कहा, “ महाराज, बुध्दि न तो दिल में रहती है और न दिमाग मे और न ही पूरे शरीर में. वह तो श्रेष्ट पुरुषॊं में रहती है। बालक ने प्रसन्नता पूर्वक उसे स्वीकार कर लिया और उसने तत्काल ही दूसरा प्रश्न दाग दिया।” महाराज, महामंत्री ठीक कहते हैं लेकिन मैं यह जानना चाहता हूँ कि वह खाती क्या है ? मामुली से लगने वाले इस प्रश्न को सुनकर, सभी के चेहरे देखने लायक थे। महाराज से यह बात छिपी न रह सकी थी। उन्होंने एक दिन का समय मांगा और उस बालक से अतिथि-गृह में रुकने को कहा, रात में महामंत्री अतिथिगृह में जा पहुँचे और उसका उत्त्तर जानना चाहा। बालक ने कहा, “ यदि आप इस प्रश्न का उत्तर जानना चाहते हैं तो इसके बदले मुझे दो हजार स्वर्णमुद्राएं देना होगा”। स्वर्ण मुद्राएं देकर उन्होंने इस प्रश्न का उत्तर जान लिया और लौट आए।

दूसरे दिन फ़िर उन्होंने महामंत्री को इसका जवाब देने को कहा। महामंत्री ने उसका जबाब दिया कि “ महाराज ,बुध्दि गम खाती है।

प्रश्न का सटीक उत्तर पाकर महाराज बहुत प्रसन्न हुए। वे अपने महामंत्री को धन्यवाद देना ही चाहते थे कि बालक ने तीसरा प्रश्न पूछ डाला, ”महाराज महामंत्रीजी का उत्तर ठीक है लेकिन कृपया वे ये बतलाएं कि वह करती क्या है ?” इस विचित्र प्रश्न को सुनकर सभागृह में फ़िर सन्नाटा सा छा गया। बात की नजाकत को देखते हुए महाराज ने सभी सभासदॊं से इस प्रश्न का उत्तर खोज लाने की आज्ञा दी और दरबार समाप्त करने की घोषणा की।

दिन ढलते ही प्रधानमंत्री फ़िर अतिथिगृह में जा पहुँचे और उस बालक से प्रश्न का उत्तर जानना चाहा। बालक ने कहा, “ मंत्रीजी यदि आप इस उत्तर के लिए मुझे सहस्त्र मुद्राएं भी देंगे तो मैं इसका उत्तर कदापि नही बतलाउंगा। मैं इसका उत्तर कल दरबार में ही दूंगा।” महामंत्री ने काफ़ी मिन्नतें की ,लेकिन वह बालक अपनी जिद पर अडा रहा। आखिरकार महामंत्री खिन्न होकर लौट आए। दूसरे दिन महाराज ने उस लडके को राजदरबार में लाए जाने की आज्ञा दी. लडके को राजदरबार में लाया गया और राजा ने सभी सभासदॊं को जबाब देने को कहा, लेकिन उस प्रश्न का उत्तर किसी ने भी नहीं दिया। सभी अपनी गर्दन नीचे किए बैठे रहे।

महाराज समझ गए कि यह बालक साधारण बुध्दि का बालक नहीं है। वे उस् प्रश्न का उत्तर जानते थे, लेकिन अनजान बने रहना ही श्रेयस्कर लगा था उन्हें। वे जानते थे कि बालक इस प्रश्न के साथ कोई गहरा राज मन में छुपाए हुए है जो वह प्रश्न के माध्यम से देना चाहता है आखिरकार महाराज ने स्वय़ं पहल करते हुए उस बालक से उत्तर बतलाने की गुजारिश की। बालक ने कहा कि वह एक शर्त पर इस प्रश्न का उत्तर दे सकता है। जब उसकी शर्त मान ली गई तो उसने अत्यन्त ही विनम्रता से कहा, “महाराज, इसका उत्तर तो सिर्फ़ सिंहासन पर बैठ कर ही दिया जा सकता है। कृपया मुझे राजसिंहासन पर बैठने की अनुमति प्रदान करें और वे सभी अधिकार दिए जाएं,जो राजा के पास होते हैं।”

सिंहासन पर बैठने के पश्चात भी उस बालक ने कोई जवाब नहीं दिया और ठहाका मार कर हंसता रहा.. बालक ने हंसते हुए इसका अर्थ बतला दिया था, लेकिन अब भी कोई समझ नहीं पा रहा था। अधीर होकर महामंत्री ने उस प्रश्न का जबाब जानना चाहा तो उसने कहा:- मत्रीं जी, अभी तक आप उस प्रश्न का उत्तर नहीं जान पाये? चलिए मैं ही इसका उत्तर दिए देता हूँ। उसने सेनापति को आज्ञा दी कि महाराज और महामंत्री को बंदी बना लिया जाए और इन्हें जेल में डाल दिया जाए. आज्ञा पाकर सेनापति ने दोनों को बंदी बना लिया. जैसे ही दोनो के कारावास में ले जाने के वह बढा ही था कि उसने पहल करते हुए सेनापति को रोक कर कहा कि दोनो को बंधनमुक्त कर दिया जाए। तत्काल ही सेनापति ने उनके हाथ में पडी बेडियों को खोल दिया। उसने महाराज और महामंत्री से पूछा, क्या अभी भी, उस प्रश्न का बतलाया जाना जरुरी है?

महामंत्री को अब भी कुछ भी समझ नहीं आ रहा था, लेकिन महाराज समझ गए और उन्होने आगे बढकर उस बालक को गले से लगा लिया.और शाबाशी देते हुए उस बालक से उसका और उसके पिता का नाम जानना चाहा और यह भी पूछा के वह कहाँ का रहने वाला है।

बालक ने मुस्कुराते हुए जबाब दिया, महाराज, पहले तो आप अपने सिंहासन पर विराजें। इसका उत्तर मैं आपको तभी दूँगा।

महाराज के सिंहासन पर बैठ चुकने के बाद उसने कहा, महाराज,मैं आपके ही राज्य में रहता हूँ। रहा नाम का, तो नाम में क्या रखा है? क्या अच्छा सा नाम रख लेने मात्र से कोई व्यक्ति विद्वान हो जाता है? यदि ऎसा हुआ होता तो इस देश में कोई भी मुर्ख नहीं रह पाता। बुद्धि ही सर्वोपरी है, जो आदमी को एक अच्छा और बुरा इंसान बनाती है। बुध्दि ही उसे विषेश दर्जा दिलाती है। शक्ति संपन्न बनाती है। शक्ति संपन्न बनने के बाद वह दुर्बुध्दि का प्रयोग कर सकता है और सदबुध्दि का भी। राजा बनते ही मैं क्या कर सकता था, इस बात को तो आपने प्रत्यक्ष देख ही लिया है। गद्दी पर बैठते ही मैंने आपको और महामंत्री को बंदी बना लिया। जिस समय मैंने, आप दोनो को बंदी बनाने का हुक्म दिया वह समय दुर्बुध्दि का समय था और जैसे ही मैंने आप दोनो को बंधनमुक्त कर दिया, वह सदबुध्दि का समय था। मैं तीन दिन से आपके आश्रय में रह रहा हूँ। मेरी फ़टी कमीज और पतलून देख कर भी आप समझ नहीं पाए कि मैं किस तरह अपने परिवार के साथ गुजर-बसर कर रहा हूँ। मैं आपको यही बतलाने के लिए ही इस दरबार में आया था। आप जैसे शक्तिशाली और प्रतापी महाराज के रहते हुए हम गरीब किस तरह अपना जीवन बसर कर रहे हैं? शायद अब बतलाने की जरुरत नहीं रह गई है।

राजा उस गरीब बालक की व्यथा-कथा समझ गया था और यह भी समझ गया था कि अरबों-खरबों की वित्तीय सहायता दिए जाने के बाद भी गरीबॊं की हालत जस की तस क्यों है। गरीब और गरीब क्यों होता जा रहा है और अमीर, और ज्यादा अमीर। उन्होंने मन ही मन फ़ैसला कर लिया था कि वे शीघ्र ही राज्य मे जनलोकपाल बिल लाएंगे.और जनलोकपाल के दायरे में खुद को, मंत्रियों को, सभी सांसदों को तथा राज्य के सभी छोटे-बडे अधिकारियों और कर्मचारियों को रखेगे और उनकी जबाबदेही भी तय करेंगे।

  गोवर्धन यादव
103, कावेरी नगर, छिन्दवाड़ा, मध्यप्रदेश – 480001
tallychhindwara@gmail.com
 
         
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