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अपराजिता के जीवन का यह पहला अवसर था, जब वह किसी बड़े नेता से मिलने आई थी । उनके आफ़िस में प्रवेश करते समय वह पूर्णतया सहमी हुई थी । मगर बचपन से ही उसमें आत्म-विश्वास कूट-कूटकर भरा था ।

आफ़िस के बाहर खड़े दरबान ने कहा ," मैडम, विधायक साहब से मिलना चाहती हो ? साहब बहुत व्यस्त हैं ।"

अपराजिता ने विनीत-भाव से उत्तर दिया ," मैं उनसे एक आवश्यक काम के लिए मिलना चाहती हूँ। उन्होंने कहा भी था जब ज़रुरत पड़े तो मिलने आ सकती हो।"  

दरबान ने अपराजिता के चेहरे की तरफ़ देखते हुए कहा," अच्छा, ठीक है मैडम ! पर्ची पर अपना नाम, स्थान एवं काम लिखकर दीजिए। मैं साहब से बात करता हूँ आपके बारे में।"

  वह मन ही मन घबरा रही थी कि वह गोपाल जी से मिल भी पाएगी या नहीं या वह उसे बाहर से ही लौट जाने को कह देंगे। कुछ देर बाद दरबान  जब वापिस आया तो उसने न सिर्फ़ अन्दर आने को कहा बल्कि इज्ज़त के साथ बैठक-कक्ष में ले गया । जबकि आफ़िस के बरामदे में मिलने वाले लोगों का तांता लगा हुआ था । वह उस बैठक-कक्ष में बैठकर तरह -तरह के विचारों के उधेड़-बुन में खो गई । वह मन ही मन अत्यंत ख़ुश हो रही थी कि गोपाल जी ने उसे विशिष्ट स्थान प्रदान कर अनुग्रहित किया है। जहाँ उनको मिलने के लिए आम- लोगों को  लम्बी-कतार में खड़े होकर दीर्घ प्रतीक्षा करनी पड़ती है, वहाँ उसे न तो किसी भी प्रकार का इंतज़ार करना पड़ा बल्कि उसे बैठक-कक्ष में जाने का इशारा कर आम-लोगों की नज़रों में ऊँचा उठा दिया। वह मन ही मन अपने आप को गौरवान्वित अनुभव कर रही थी कि अवश्य विधायक-साहब कहीं न कहीं उसके प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के किसी न किसी पहलु से प्रभावित हुए है । अब उसे मन ही मन लग रहा था कि वह दिन दूर नहीं है, जब उसके सारे दुर्दिन दूर हो जाएँगे तथा उसकी ज़िंदगी में वे सारी ख़ुशियाँ लौट आएगी जिसका उसे एक लम्बे अरसे से इंतज़ार था । वह मन ही मन इस बात से फूली नहीं समा रही थी कि गोपाल जी ने उनके घर पर पहली मुलाक़ात में दूसरे लोगों की तुलना में उस पर विशेष ध्यान दिया हैं ।

वह उनके सुसज्जित बैठक-कक्ष को ध्यानपूर्वक निहारने लगी । उसने देखा कि बैठक-कक्ष की प्रत्येक वस्तु बहुत ही सलीक़े से रखी हुई थी। देखते -देखते उसे अपना अतीत याद आने लगा । ऐसी बात नहीं थी कि अपराजिता विधायक साहब को पहले नहीं मिली हो । वह उनको दो-तीन माह पूर्व क्षेत्रीय चुनावी कार्यकर्मों के दौरान मीटिंगों में दो-तीन बार मिल चुकी थी। उसकी संगठन-क्षमता तथा भाषण-शैली से प्रभावित होकर एक बार गोपाल जी ने कहा,

" अपराजिता, तुम एक अच्छी कार्यकर्त्ता हो। भविष्य में पार्टी के लिए एक वरदान साबित होगी। अगर तुम्हें किसी भी सिलसिले में मेरी सहायता की ज़रुरत अनुभव हो,तो बेझिझक मुझसे मिलने आ सकती हो। मेरे घर के दरवाजे हमेशा तुम्हारे लिए खुले मिलेंगे। "

अचानक नौकर को सामने पाकर उसका ध्यान टूटा। नौकर ने शांत भाव से उसके सामने पानी का गिलास रख दिया तथा न्रमतापूर्वक पूछने लगा," मेम साहिब, चाय लेंगी या कॉफ़ी ?"

अनमने-भाव से अपराजिता ने चाय के लिए हामी भर दी ।

अपराजिता बचपन से ही कुशाग्र-बुद्धि वाली थी, साथ ही साथ महत्वाकांक्षी भी। वह बुलंदियों के शिखर को छूना चाहती थी, परन्तु लक्ष्य को पाने के लिए विरासत में मिले संस्कारों को छोड़ना नहीं चाहती थी। उसकी भारतीय संस्कारों में दृढ़ आस्था थी । किसी भी कीमत पर वह उन्हें खोना नहीं चाहती थी । बचपन से ही उसके संस्कारयुक्त मन ने महत्वाकांक्षा के कई हवाई-किलों का निर्माण कर लिया था। परन्तु ज्यों-ज्यों उसकी उम्र गुज़रती गई तथा वह ज़िंदगी के यथार्थ धरातल से परिचित होती गई,एक-एककर उसके सारे सपने चूर चूर होकर टूटते नजर आए। सपनों को टूटता देखकर भी उसने हिम्मत नहीं हारी, वरन वह अपनी दुगुनी शक्ति के साथ जीवन की कठोरताओं के साथ डटकर संघर्ष करने के लिए तत्पर हो गई।

संघर्ष करते-करते अब उसका जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदल गया था। वह एक मंझे हुए परिपक्व इंसान की भाँति सोचने लगी थी। जब उसकी मुलाक़ात पहली बार गोपाल जी से हुई थी तो उसे लगने लगा था मानो ईश्वर ने उसकी अन्तः-पुकार सुन ली हो तथा उनको उसके लिए एक मसीहा के रूप में अवतरित किया हो । अक्सर वह अपराजिता के सौंदर्य, प्रतिभा तथा वाक्-कुशलता की भूरी-भूरी प्रशंसा करते थे, यह भी एक कारण था कि उसके दिल में कमलजी के प्रति एक अलग स्थान था।

तभी कमरे में नौकर ने चाय के प्याले के साथ प्रवेश किया । उसके क़दमों की आवाज सुनकर वह अपने अतीत की दुनिया से लौटकर वर्तमान में आ गई । वह सोचने लगी कि जब गोपाल जी कमरे के भीतर प्रवेश करेंगे तो किस तरह उसे उनका अभिवादन करना चाहिए । क्या वह उनके पाँव छुएगी या हाथ जोड़कर प्रणाम करेगी ? किस तरह वह अपनी समस्याओं को उनके समक्ष रखेगी ? उसका तो राजनैतिक क्षेत्र से कभी भी सम्बन्ध नहीं रहा है । वह तो इस क्षेत्र में पूर्णतया अनाड़ी है । उसके मन में अभी भी यह अटूट विश्वास था कि वह अपने ईश्वर-प्रदत किसी देवता के सामने गुहार लगाने आई है, जो उसकी मुराद को ज़रुर पूरा करेंगे । उसका मन इस बात की गवाही दे रहा था तभी तो उन्होंने उसे अपने बैठक-कक्ष में बैठने के निर्देश दिए थे । आधा-घंटा बीतने के बाद कमलजी ने बैठक-कक्ष में प्रवेश किया । ज्यों-ही उन्होंने कमरे में प्रवेश किया, वैसे ही अपराजिता उनके स्वागत में खड़ी हो गई और चरण-स्पर्श करने के लिए आगे की ओर झुकी । गोपाल जी ने हलके-से उसकी पीठ थपथपाई और बीच में अवस्थित सोफ़े पर जाकर इस तरह बैठ गए मानो एक राजा अपने सिंहासन पर विराजमान हो रहा हो । फिर स्नेहिल-निगाहों से उसकी तरफ़ एकटक देखने लगे तथा पूछने लगे," अपराजिता ! यह बताओ, मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूँ ? अच्छा यह बताओ, ज़िंदगी में क्या करना चाहती हो ?"

अपराजिता तो इसी अवसर की तलाश में थी कि कब गोपाल जी उसे अपनी बात रखने को कहे । बिना रुके एक ही साँस में उसने अपनी बात उनके सामने रख दी ।

वह कहने लगी,"जी, मैं अपने महाविद्यालय की अच्छी छात्राओं में से एक थी । मुझे अपने आप पर पूर्ण विश्वास है कि अगर ईश्वर ने मुझे एक मौक़ा दिया तो मैं उस पर पूरी तरह खरी उतरूँगी । ऐसे मुझमें एक अच्छे संगठन-कर्ता के अलावा वह सभी गुण भी विद्यमान है जो किसी नेतृत्व करनेवाले में होने चाहिए। आप तो इस बात से परिचित भी है कि मैं अपने दायित्वों के प्रति पूर्णरूपेण समर्पित हूँ । दुःख तो केवल इस बात का है कि आज तक मुझे समझने वाला कोई सच्चा मार्ग-दर्शक नहीं मिला । अब आपके संपर्क में आने से मुझे लग रहा है कि मैं भी समाज के कुछ काम आ सकती हूँ और अपने जीवन को सार्थक बना सकती हूँ ।"

इतना बताने के बाद वह एकदम चुप हो गई। कमरे में शान्ति व्याप्त हो गई । गोपाल जी भी कुछ नहीं बोले । वह मन ही मन सोच रही थी कि कैसे उसने अपने मन की बात इतने आत्म-विश्वास के साथ उनके सामने रख दी । वह सोच रही थी कि गोपाल जी की चुप्पी इस बात की प्रतीक है कि उन्होंने कैसे उसकी बात को गंभीरतापूर्वक लिया है। परन्तु ये क्या।! गोपाल जी ने अचानक उसके हाथ को अपने हाथ पर रख लिया और उसे बड़े प्यार से सहलाने लगे।

उस समय कमरे में उन दोनों के अलावा और कोई नहीं था। अपराजिता की दृष्टि में वह पितृ-तुल्य इंसान थे। हाथ सहलाने से वह सिहर उठी ।वह तो भय से अन्दर तक काँप गई । उसकी समझ में कुछ नहीं आया कि माज़रा क्या है। उसे लगा मानो उसके पैरों के नीचे की ज़मीन खिसकती जा रही है वह अपने हाथ को खींचने का प्रयास कर रही थी। कमरे में कुछ देर तक ऐसा सन्नाटा छाया रहा कि अगर एक सुई भी गिरती तो उसकी आवाज़ भी प्रतिध्वनित होती।

उस समय अपराजिता अपने आप को बहुत लाचार-सा अनुभव कर रही थी । उसे अपने सपनों का महल टूटता बिखरता नजर आ रहा था । वह सोच रही थी कि जिस तरह की उम्मीद गोपाल जी उससे कर रहे है वह पूरी करना उसके बस की बात नहीं है। जीवन-भर के कठोर संघर्षों से जूझते-जूझते वह थक-सी गयी थी । एक उम्मीद की किरण जागी थी । अब उसे अपने सब तरफ़ अँधेरा दिखाई पड़ रहा था। गोपाल जी के रूप में उसे लगने लगा था कि शायद कोई मसीहा भगवान् ने उसके लिए भेज दिया हो। अब उसे लग रहा था कि काश धरती फट जाए और वह उसमे समा जाए। वह ख़ुद को बेजान-सा महसूस कर रही थी। कुछ देर बाद अपराजिता बहुत हिम्मत बटोरकरबोली, "ऐसी क्या ख़ासियत है मुझमें, और मैं तो उम्र में भी आप से बहुत छोटी हूँ।"

पर उनकी आँखों में तो अपराजिता को लेकर अजीब-सी चमक दिखाई दे रही थी। फिर काफ़ी सोच विचारकर के अपनी बुद्धि का उपयोग करते हुए अपराजिता बोली,

"आप मेरे से उम्र में भी काफ़ी बड़े है और इतने बड़े आदमी भी है । मैं आपकी बहुत इज्ज़त करती हूँ और आपका बहुत ऊँचा स्थान है मेरे मन में। मैं तो एक बहुत मामूली-सी औरत हूँ आपकी समाज में इतनी मान प्रतिष्ठा है। मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से उस पर ज़रा सी भी आँच आए । मैं इतनी ज़ल्दी आपको और क्या कह सकती हूँ ?"

 अपराजिता यह भी नहीं चाहती थी कि वह इस समय कोई बेवकूफ़ी करे और ज़ल्दबाज़ी में कोई जवाब दे । उसे उस समय बात को टाल देना ही बेहतर लगा । वह चाहती थी कि साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे । गोपाल जी ने भी एक चतुर नेता की तरह अपराजिता का चेहरा पढ़ लिया और कहने लगे,

" अपराजिता, घबराओ मत, मैंने तो सिर्फ़ अपने मन की बात तुम्हें बताई है, अगर दुनिया में आगे बढना है तो इन छोटी-मोटी बातों की परवाह नहीं करनी चाहिए । फिर भी मैं तुम्हें एक बात का आश्वासन देता हूँ कि मैं हमेशा ही तुम्हारा अच्छा दोस्त बना रहूँगा और तुम्हारी पूरी मदद करता रहूँगा ।"

यह बात सुन कर अपराजिता की जान में कुछ जान आई। गोपाल जी कहने लगे कि दोस्ती में उम्र नहीं दिल देखा जाता है ।

गोपाल जी को थोडा सहज-सा होते देख अपराजिता भी कुछ ठीक महसूस करने लगी और सामान्य होकर कुछ देर बातें करती रही । इतनी देर में नौकर चाय लेकर आ गया, गोपाल जी ने उसे चाय लेने को कहा । अपराजिता के लिए यह   क्षेत्र बिलकुल नया था । उसने तो अपना सारा जीवन पढ़ने -लिखने में ही बिताया था। वह तो राजनैतिक शब्दावली को समझने में असमर्थ थी। किस बात का सही मायने में क्या अर्थ था उसकी समझ से परे लग रहा था ,फिर भी वह ख़ुद को सहज दर्शाते हुए चाय ख़त्म करने लगी। जैसे ही चाय ख़त्म हुई तो अपराजिता ने बहुत हिम्मत बटोरकर बाहर जाने की इज़ाज़त माँगी। उन्होंने इसी बीच उसे दोपहर के खाने का न्यौता दे दिया वह सिर हिलाकर उठ खड़ी हुई। गोपाल जी भी उसके साथ ही उठ खड़े हुए तो कुछ क्षण वह रुकी और औपचारिकतावश अभिवादन करने के लिए झुकी तो आशीर्वाद देने की जगह गोपाल जी ने उसके अधरों का चुम्बन लेना चाहा तो अपराजिता का मानो काटो तो ख़ून नहीं। वह कमल जी के इस तरह के अप्रत्याशित व्यवहार से सन्न रह गई । उसने गोपाल जी को इंकार कर दिया । वह उसके जीवन की सबसे बड़ी अस्वाभाविक घटना थी उसके हाथ पैर काँप रहे थे और सांस उखड रही थी। जैसे-तैसे ख़ुद को थोडा सहज करके वह बिना इधर-उधर देखे तेज़ क़दमों से बाहर निकल गई ।

 गेट के बाहर पहुँच कर भी अपराजिता की साँस उखड़ी हुई थी उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ है।

गेट पर खड़ा दरबान उसे देखते ही मुस्कराते हुए बोला ," मैडम, चिंता मत कीजिए । आपका काम शत-प्रतिशत हो जाएगा ।"

दरबान की बात को अनसुनी कर तरह -तरह के भयानक विचारों के सागर में गोते लगाते हुए वह कब अपने दरवाज़े की दहलीज़ पर पहुँच गई कि उसे पता ही नहीं चला ।

 वह सुबह जहाँ से इतने सपने लेकर चली थी उसी जगह वापिस खड़ी थी। उसे भय लग रहा था । उसे लग रहा था कि गोपाल जी को मिलकर अपनी समस्या का निदान पाना महज एक मृग-मरीचिका थी !


  अलका सैनी
मकान न. १६९,
ट्रिब्यून कालोनी,
जीरकपुर, चंडीगढ़
[email protected]
  

 
         
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