नियम-धर्म,
दान-पुण्य, व्रत-उपवास, पूजा-पाठ, किसके लिए बने हैं। इंसान को ऊपर उठाने...उसे परमात्मा से जोड़ने और इस असार संसार से मुक्ति दिलाने...और उसको मोक्ष तक पहुँचाने के लिए ही न। वह इनका उपयोग जो कुछ वह अभी है, उससे कुछ और ज़्यादा बनाने, ख़ुद को कुछ और अधिक महसूसने...कुछ और ज़्यादा पहचानने...कुछ और ऊपर उठाने के लिए करता है। पर इन्हीं में से कुछ लोग हैं जो मानते हैं कि सृष्टि इतनी बुरी नहीं है। यह तो लीला-स्थली है जिसके माध्यम से परमात्मा अपनी कलाएँ दिखाता रहता है। इससे भागना, मुँह मोड़कर बैठे रहना...इसकी आलोचना-अवहेलना करना कुदरत का अपमान है। ऐसे लोग सांसारिक रहकर साधारण जीवन जीने की लालसा रखते हैं। उनका आदर्श होता है संसार में सबके बीच रहकर, भी कमल जैसी निर्लिप्तता प्राप्त कर लेना। ऐसे आस्थावादी और घोर संसारी जीवों की ज़िंदगी में अचानक कोई हादसा या कुछ ऐसा हो जाए कि जीवन महज एक उदासी या घुटन जैसा लगने लगे, जिनसे मदद की उम्मीद हो, जो उनके सुखों के साझीदार रहे हों, जो उनके अपने हमेशा अपने बनते आए हों...जिनको उनके मीत-प्रीत सब समर्पित हों, अगर वे भी अचानक आँखें दिखाने लगें या फिर उनके अपने ही हाथों गढ़ी गई सामाजिक वर्जनाएँ हरेक ख़ुशी के आगे बाड़-सी लगाने लगें; तो मन इस असार संसार से दूर भागने लगता है। यदि भागना संभव न हो तो संसार को छोड़ने और सहेजने में होड़-सी लग जाती है। जिन्होंने दिव्वो मिसरानी के अतीत को देखा-जाना है और जो उनके आज को भी देख रहे हैं; उन्हें हमारी बात के मर्म तक पहुँचने में ज़रा भी मुश्किल नहीं पड़ेगी। यह कहानी उन्हें देखी-भाली, जानी-पहचानी, सुनी-सुनाई-सी जान पड़ेगी...
उन बातों को तीस बरस बीत चुके हैं, जब विवाह के बाद दिव्वो मिसरानी पहली बार इस गाँव में पहुँची थीं। उस समय उनसे भेंट करने पहुँचे हरेक औरत-मरद ने उन्हें गाँव की सबसे भाग्यशाली सुहागिन की संज्ञा दी थी। उसकी वजह भी थी। एक तो ब्राह्मण कुल की ब्याहता, ऊपर से उनका परिवार ब्राह्मणों में भी सबसे ऊँचे कुल में गिना जाता था। इससे भी बड़ी बात यह है कि वह कर्मकांड के बजाए वह खेती पर निर्भर था और गाँव के बड़े जमींदार परिवारों में उसकी गिनती थी। दिव्वो मिसरानी के पति खिच्चू महाराज को गाने का भी शौक था। गाना भी ऐसा-वैसा, चलताऊ क़िस्म का नहीं, ऐसा जिसमें गायन की मर्यादा हो...प्रेम और भक्ति भी हो...तुलसी कृत रामचरितमानस, राधेश्याम कृत महाभारत और रामायण उन्हें पूरी तरह कंठस्थ थीं। किंतु सिर्फ़ पर्व-दशहरा के अवसर पर ही वे अपने हुनर का प्रदर्शन करते। गाँव के बुर्जुगवार बताते हैं कि अच्छा गला और गाने की कला महाराज को ऊपरवाले की ओर से वरदान में मिली थी। अगर चाहते तो उसके दम पर कहीं से कहीं तक जा सकते थे। मगर कभी समझौता नहीं किया।
अपवाद के साथ-साथ एक किस्सा उनके बारे में ख़ासतौर पर चलता था। लोग बताते हैं कि उन दिनों जब खिच्चू महाराज युवा ही थे तब उन्हें इलाक़े के नवाब हकीमउल्लाह का बुलावा आया था। वह उनसे रामायण सुनना चाहते थे। किंतु उन्होंने यह कहकर कि रामायण एक पवित्रा कथा है और किसी मलेच्छ के आगे इसे गाकर अपवित्रा नहीं कर सकते, नवाब के दरबार में जाने से साफ़ मना कर दिया था। हालाँकि उन्हीं खिच्चू महाराज के बड़े भाई जयंतीप्रसाद ने किसी जमाने में रामचरितमानस की हस्तलिखित प्रति तैयार की तो उसे किसी हिंदू को भेंट करने के बजाए उन्होंने उन्हीं नवाब हकीमउल्लाह को सौगात में दी थी। बताते हैं कि उसी को पढ़कर नवाब के मन में राम-कथा के प्रति अनुराग जन्मा था। इसीलिए जब उसने खिच्चू महाराज की चर्चा सुनी तो उन्हें तुरंत बुला भेजा। लेकिन खिच्चू महाराज के इंकार से रामचरितमानस को सुनने की उसकी साध मन ही में रह गई। कुछ लोगों का कहना है कि खिच्चू महराज ने ख़ुद इंकार नहीं किया था। यह उड़ाई हुई बात थी। बताते हैं कि नवाब के आदमी जिस दिन उन्हें बुलाने आए, उनको अतिसार ने घेरा हुआ था। चार कदम चल पाना भी कठिन था। इसलिए उन्होंने फिर कभी ‘सेवा में उपस्थित होने’ का वचन दिया था। पर न जाने किस दुश्मन ने मलेच्छ वाली बात उड़ा दी। तकदीर का लेखा—खिच्चू महाराज को इससे फ़ायदा ही हुआ।
इसी से ख़ुश होकर इलाक़े के ही दूसरे हिंदू जमींदार ने उन्हें पचास बीघा ज़मीन भेंट में दी थी। यह सुनकर नवाब हकीमउल्लाह बहुत तिलमिलाया। वह बात को पी जाने वालों में से हरगिज़ नहीं था। लेकिन कुछ कर पाए उससे पहले ही नवाबी जाती रही। जो हो उस घटना के बाद खिच्चू महाराज का नाम इलाक़े-भर में फैल गया। उन दिनों उनकी अवस्था केवल चैबीस वर्ष की थी। उस उम्र तक उन दिनों विवाह हो जाना आम बात थी। खिच्चू महाराज के लिए भी कई रिश्ते आ चुके थे। उसके बाद तो बेटी वालों ने उनके घर के सामने मानो डेरा ही डाल लिया। पर न जाने कौन-सा भूत सवार था खिच्चू महाराज पर जो वे आजीवन कुँआरा रहने की ठाने हुए थे। जो भी रिश्ता आता उसे किसी न किसी बहाने ठुकरा देते। आख़िर एक दिन जब उनकी बूढ़ी माँ ने आमरण अनशन करने की घोषणा की और बेटे को उन्हीं राम का वास्ता दिया जिनकी मातृ-भक्ति का बढ़-चढ़ कर बखान अपने रामायण-पाठ के दौरान वे अक्सर किया करते थे। तब उनको पिघलना ही पड़ा। दिव्वो मिसरानी जो उन दिनों ठिगने कद की गोरी-चिट्टी देवकी रानी हुआ करती थीं, उनकी अर्धांगिनी बनकर आ गईं।
उम्मीद तो यह थी कि इसके बाद उस परिवार में खुशियाँ अंगड़ाई लेंगी...सुख का परचम लहराएगा...मगर नियति जो लिख चुकी थी उसको बांचना किसी भी महापंडित के बस से बाहर था। खिच्चू महराज की माँ जिसने अपने अनशन के दम पर बेटे का घर बसाने में कामयाबी हासिल की थी, वह उनकी गृहस्थी को फलते-फूलते न देख पाई। एक रात सोने गईं तो पता चला कि वक़्त, सुबह होने से पहले ही उस बूढ़ी औरत की सांसों को समेट चुका था। देवकी रानी पर आते ही सास को ‘खा’ जाने के इल्जाम भी लगे। इस दाग को धोने के लिए उन्होंने अपने ससुर की सेवा में ख़ुद को झोंक दिया जो विवाह के बाद से ही अपनी बंश-बेल बढ़ने का इंतज़ार कर रहे थे और घर-परिवार से उपराम से रहने वाले अपने बेटे यानी खिच्चू महाराज की गृहस्थी को लेकर जिन्हें हमेशा चिंता सताए रहती थी। खिच्चू महाराज तो ग़ैरदुनियादार इंसान थे। कई बार काम के बहाने से वे बाहर निकल जाते फिर कई-कई दिनों तक घर से दूर रहते। उमगती देह की कामनाओं को दबाने के प्रयास में देवकी रानी अकेली छटपटाती रहतीं। उन्हें अपने ससुर के मन में पल रहे अरमानों की पूरी जानकारी थी। बल्कि वह स्वयं भी मातृत्व सुख के लिए लालायित थीं। बिना ईश्वरेच्छा के ऐसा मुमकिन नहीं, यह सोचकर वे सालों से रूठे देवी-देवताओं को मनाती आ रही थीं। इसके लिए न जाने कितनी मनौतियाँ उन्होंने माँग डाली थीं और चढ़ावों की तो गिनती ही नहीं है।

![Validate my Atom 1.0 feed [Valid Atom 1.0]](valid-atom.png)