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चाय

प्रकाशन :गुरूवार, 22 दिसम्बर 2011
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
जो विदेश से चलकर आई।
वही हमारे मन को भाई।।

कैसे जुड़ा चाय से नाता,
मैं इसका इतिहास बताता,
शुरू-शुरू में इसकी प्याली,
गोरों ने थी मुफ्त पिलाई।
वही हमारे मन को भाई।।

यह जीवन का अंग बनी अब,
बहुत चाव से पीते हैं सब,
बिना चाय के मेहमानों को,
खातिर नहीं समझ में आई।
वही हमारे मन को भाई।।

बच्चों को नहीं दूध सुहाता,
चाय देख मन खुश हो जाता,
गर्म चाय की चुस्की लेकर,
बीच-बीच में मठरी खाई।
वही हमारे मन को भाई।।


  डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
टनकपुर रोड, खटीमा, ऊधमसिंहनगर, उत्तराखंड, भारत - 262308. Phone/Fax: 05943-250207,
roopchandrashastri@gmail.com
 
         
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