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 प्रश्न॰ 10 :- किसी भी स्थापित प्रणाली एवं संस्थान के खिलाफ संघर्ष करने के लिए आपके अन्दर साहस, आत्म-विश्वास और ताकत कहाँ से आती है? क्या कभी आपको अपने बैचमेट या ब्यूरोक्रेटिक सर्कल में से किसी ने न्याय,सत्य, र्इमानदारी और पारदर्शिता के लिए संघर्ष करता हुआ देखकर अपनी तरफ से शुभकामनाएँ प्रेषित की?
उत्तर - मेरी इस शक्ति,आत्म-विश्वास और साहस के पीछे तीन लोगों का हाथ हैं।पहला, मेरी माँ, जो मेरी प्रेरणा-स्रोत थी।वह पढ़ी-लिखी नहीं थी,मगर सत्य-निष्ठा और न्याय की प्रतिमूर्ति थी। तत्कालीन समय में लड़के-लड़कियों में बहुत ज्यादा विभेद किया जाता था, जबकि मेरी माँ उस समय भी दोनों को समदृष्टि से देखती थी। मेरी माँ के ये सारे गुण मुझे अपनी विरासत में मिले।
दूसरा,मेरी धर्म-पत्नी श्रीमती उषा पारख,जो पहले से ही सिविल सर्विस की सीमा-रेखा से परिचित थी और उसकी बाध्य-बाधकता को अच्छी तरह जानती थी। मेरे साले साहब 1963 बैच के आईएएस अधिकारी थे। वे भी पूरी तरह से सत्य-निष्ठा का पालन करने वाले शख्स थे। मुझे इस बात का फक्र है कि मुझे ऐसी पत्नी मिली,जिन्होंने आजीवन कभी भी मुझे मेरे मनचाहे र्इमानदारी के पथ से डिगने नहीं दिया। इस वजह से सही मायने में,मैं अपने जीवन की सम्पूर्ण गुणवत्ता को पूरी तरह जी पाया हूँ।
तीसरा, मेरी बेटी श्रीमती सुष्मिता पारख,जो फिलहाल चेन्नर्इ में हैं। उसने कभी भी अपनी आवश्यकताओं से ज्यादा पूर्ति की मांग नहीं की।पत्नी और बच्चे की अवांछित मांगें अधिकांश समय र्इमानदार आदमी को भी बेर्इमान बना देती हैं,ऐसा मेरा मानना है।
( पारख साहब के उपरोक्त कथन से मुझे बुर्ला विश्वविद्यालय, सम्बलपुर के प्रबंधन-संकाय के भूतपूर्व विभागाध्यक्ष व मैनेजमेंट गुरु श्री ए॰के॰महापात्र की एक कहानी याद आ जाती है ।कहानी इस प्रकार है:-
“...... एक बार अखिल विश्व-स्तरीय बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सी॰ई॰ओ॰ के ‘फ्रस्टेशन-लेवल’ की जांच करने के लिए बैठक का आयोजन किया गया,जिसमें दुनिया भर के बड़े-बड़े लोगों ने भाग लिया। इस प्रयोग में पता चला कि भारतीय सी॰ई॰ओ॰ का ‘फ्रस्टेशन लेवल’’सबसे ज्यादा था। उसका कारण जानने के लिए एक टीम ने फिर से ‘व्यवहार तथा सोच’ संबंधित और कुछ प्रयोग किए। जिसमें यह पाया गया कि उनकी धर्मपत्नी बात–बात में उनके ऊपर कटाक्ष करती थी, यह कहते हुए, “आपने क्या कमाया है ? मेरे भाई को देखो।आपके एक गाड़ी है तो उसके पास चार गाड़ी है। आपके पास एक बंगला है तो उसके पास पाँच बंगले हैं। आप साल में एक बार विदेश की यात्रा करते हो तो वह हर महीने विदेश की यात्रा करता है। अब समझ में आया आपमें और उसमें फर्क ?”
ऐसे कटाक्ष सुन-सुनकर बहुराष्ट्रीय कंपनी के अट्ठाईस वर्षीय युवा सी॰ई॰ओ॰ इतना कुछ कमाने के बाद भी असंतुष्ट व भीतर ही भीतर एक खालीपन अनुभव करने लगा।पैसा,पद व प्रतिष्ठा की अमिट चाह उनके ‘फ्रस्टेशन-लेवल’ को बढ़ाते जा रही थी।
इसी बात को अपने उत्सर्ग में पारख साहब ने लिखा की सिविल सर्विस में मोडरेट वेतन मिलने के बाद भी मेरी सारी घटनाओं की साक्षी रही मेरी धर्मपत्नी ने ऐसा कभी मौका नहीं दिया,जो मेरे निर्धारित मापदंडों को उल्लंघन करने पर बाध्य करते।और ऐसे भी अँग्रेजी में एक कहावत है,“चैरिटी बिगेन्स एट होम”। हर अच्छे कार्य का शुभारंभ घर से ही होता है।
पारख साहब अत्यंत ही भाग्यशाली थे कि उन्हें अपने स्वभाव, गुण व आचरण के अनुरूप जीवन–संगिनी मिली। मैं बहिन सुष्मिता को भी धन्यवाद देना चाहूँगा कि अपने निर्मोही पिता के पथ में कभी भी किसी तरह का अवरोध खड़ा नहीं किया,बल्कि एक निर्लिप्तता से उनका हौसला बढ़ाते हुए उन्हें अपने पथ से विचलित नहीं होने दिया। यह है यथार्थ वैराग्य का अनुकरणीय उदाहरण।)
मेरा संघर्ष देखकर अपने बेचमेटों में किसी ने भी मुझे शुभकामनाएं नहीं दी, मगर सीबीआई केस के समय मुझे अपने परिचित-अपरिचित मित्रों, साथ में काम करने वालों और राजनेताओं से भी काफी सबंल प्राप्त हुआ।
प्रश्न॰ 11 :- जिस समय आपके घर में सीबीआई की रेड हुर्इ,उस समय आपकी और भाभीजी की मनोदशा कैसी थी?
उत्तर - ( इस सवाल का जवाब पारख साहब ने नहीं दिया,शायद उस घटना की याद आते ही उन्हें काफी कष्ट हो रहा था।मैंने देखा कि शांत-स्वभाव वाले पारख साहब का मन उन बुरी स्मृतियों को याद कर उद्विग्न होता जा रहा था मानो किसी ने प्रशांत महासागर में किसी प्रकार के प्रक्षेपण से उथल-पुथल पैदा कर दी हो।उन्हें नीरव देखकर भाभीजी ने इस प्रश्न का उत्तर दिया। उनके शब्दों में भी मार्मिक कंपन था।)
यह एक अप्रत्याक्षित घटना थी,हमारी कल्पना से परे।अचानक जब सीबीआई ने हमारे सिंकदराबाद स्थित निवास-स्थान “जागृति रेजीडेन्सी” के फ्लैट नं. 4 A में छापा मारा तो उस समय हम मॉर्निंग वाक पर जाने की तैयारी कर रहे थे।पारख साहब ने शयन कक्ष में आकर मुझे शांत रहने और फिर बाहर जाकर सीबीआई अधिकारियों को अपना काम करने के लिए कहा। फोन के ऊपर फोन आ रहे थे। मैं फोन उठा रही थी। मेरे दोनों हाथों में फोन थे। एक उनका और एक मेरा।कम से कम 1500 कॉल से कम नहीं आए होंगे। इधर टीवी में भी हमारे घर में सीबीआई द्वारा छापे पड़ने की स्क्रॉल जारी कर दी गई थी।फिर भी उनके चेहरे पर किसी भी प्रकार के तनाव की रेखाएं नहीं थी। उनके मन में एक ही बात पर विश्वास था, सांच को आंच कहाँ?बिना किसी प्रकार की खीझ या तनावग्रस्त हुए सौम्य, शांत और संयमित भाषा में इन्होंने(पारख साहब ने )सीबीआई के लोगों से कहा,“अगर कुमार मंगल बिरला ने जो कुछ मुझे दिया होगा। अब तक तो वह मैं हजम कर चुका हूंगा।मुझे सेवा-निवृत्त हुए सात साल से ज्यादा हो गए हैं।आप लोग यहाँ ढूंढ क्या रहे हो?यहाँ क्या मिलेगा आपको?”
उन्होंने कुछ भी उत्तर नहीं दिया। वे लोग कुछ आवश्यक दस्तावेज खोज रहे थे। जहां-तहां तकिये के नीचे,बिस्तर के ऊपर,सोफे के पीछे-सब जगह इधर-उधर झांक रहे थे।उन दिनों पारख साहब अपने संस्मरण लिखने में व्यसत थे,उनके वे हस्त-लिखित कागज टेबल के ऊपर पड़े हुए थे।सीबीआई के अधिकारियों ने उन कागजों को उठाया और अपने काम के लिए आवश्यक दस्तावेज समझ ले जाना चाहते थे।अभी भी पारख साहब ने अपना धीरज नहीं खोया था। उनके अनुरोध पर उन कागजों को उन्हें सुपुर्द कर दिया गया, बशर्ते उनकी एक फोटोकॉपी अपने पास रखने की इच्छा जताकर। फोटोकॉपी का एक सेट मिल जाने पर मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखकर पारख साहब कहने लगे, ‘‘जो किताब प्रकाशित होने देना आप नहीं चाह रही थी, नेताओं के डर से, वह किताब अपने आप अपने गंतव्य स्थान पर पहुँच गई।’’
ऐसी विषम परिस्थिति में भी उनकी विनोद-प्रियता मुझे अचंभित कर रही थी। मुझे डर था कि अगर उनकी यह किताब प्रकाशित हो गई तो कर्इ नेता लोग उन्हें जान से मरवा सकते थे,अपने किसी षड़यंत्र का शिकार बनाकर या किसी अज्ञात व्यक्ति किसी द्वारा पत्थरबाजी या किसी गाड़ी से दुर्घटना करवाकर,कुछ भी कर सकते हैं वे लोग! मेरी सारी दुनिया तो ये ही हैं।उन्हें कुछ हो जाने से .....?
( इस समय भाभीजी काफी भावुक हो गई थी और उनकी आँखों में आंसुओं की कुछ बूंदें साफ झलक रही थी। उनकी आवाज भी आद्र हो गई थी,एक रूआँसापन लगने लगा था। अपने आप को संभाल कर वह आगे कहने लगी )
मुझे आश्चर्य हो रहा था कि इस अवस्था में पारख साहब को न्याय मिल सकता हैं अथवा नहीं? न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार को देखकर आधुनिक युग में ऐसे सारी शंकाएं मेरे मन में गलत नहीं थी।मैं इस घटना को लेकर पूरी तरह से हतप्रभ एवं स्तब्ध थी क्योंकि मैं जानती थी कि इन्होंने कभी भी अपने जीवन में कुछ गलत नहीं किया फिर ऐसा क्यों? क्या यह कोई षड्यंत्र नहीं तो और क्या है?
प्रश्न॰12 :- आपने अपने सिविल सर्विस की सारी जिंदगी ईमानदारी,सत्य-निष्ठा और कर्तव्य- परायणता के साथ बिताई, फिर ऐसी क्या वजह हुई कि सीबीआई को आपके ऊपर शक करना पड़ा?
उत्तर:- सन 1993 में कैप्टिव कोल ब्लॉकों के आवंटन हेतु स्क्रीनिंग कमेटी का गठन किया गया था,जो पार्टी की आर्थिक एवं तकनीकी फिजिबिलिटी चेक करती थी और उसके बाद कोल ब्लॉक का आवंटन करती थी।शुरुआती सालों में बहुत कम आवेदक थे, मगर सन 2003 में स्टील उद्योग में आए उछाल के कारण कोल-ब्लॉकों की मांग में अचानक बढ़ोतरी हुई और प्रत्येक कोल ब्लॉक के लिए आवेदकों की संख्या में वृद्धि होने लगी। इसलिए मैंने खुली निविदा के माध्यम से आवंटन करने का प्रस्ताव रखा। स्क्रीनिंग कमेटी ने तलाबीरा ब्लॉक-II को नेवेली लिग्नाइट कॉर्पोरेशन को आवंटित करने का प्रस्ताव रखा था,मगर जब कुमार मंगल बिरला ने अपने निजी उपक्रम हिंडालको के लिए तलाबीरा ब्लॉक हेतु प्रधानमंत्री और मुझे पुनर्विचार हेतु अपना प्रेजेंटेशन दिया तो मैंने देखा कि उनके तर्कों में कुछ दम था, इसलिए प्रस्ताव पर मैंने कोयला-सचिव की हैसियत से उस ब्लॉक को जाइंट वेंचर हेतु दोनों नेवेली लिग्नाइट और हिंडालको को देने के लिए तत्कालीन कोयला-मंत्री (उस समय प्रधानमंत्री थे) से अपनी सहमति देने हेतु अनुरोध किया,जिसे प्रधान-मंत्री द्वारा स्वीकार कर लिया गया। यही वजह सीबीआई के संदेह का कारण बनी कि नेवेली लिग्नाइट को दिए जाने वाले ब्लॉक को स्क्रीनिंग कमेटी की सिफ़ारिशों को न मानते हुए एक भागीदार हिंडालको को कैसे बनाया गया? जिसका पूरा वर्णन मैंने अपनी पुस्तक के अध्याय “सुप्रीम कोर्ट,सीबीआई एवं कोलगेट” में दिया है।बाद में सीबीआई ने अपनी क्लोज़र रिपोर्ट में मेरे प्रस्ताव को उचित ठहराया।मुझे दुख इस बात का है कि बिना होमवर्क किए सीबीआई को यह कदम नहीं उठाना चाहिए था,और साथ ही साथ केस को इंवेस्टिगेशन फेज से गुजरने से पहले जनता के सामने रखकर सिविल सर्विस के वरिष्ठ अधिकारी के आजीवन ईमानदारी की कमाई पर आधारित बने बनाए चरित्र का हनन नहीं करना चाहिए।

प्रश्न॰ 13 :- आपकी इस पुस्तक के प्रकाशित होने के उपरांत राजनेताओं के आचरण तथा शासन-प्रणाली में किसी भी प्रकार कोई परिवर्तन आया?
उत्तर - मुझे नहीं लगता कि कोर्इ किताब ऐसा परिवर्तन ला सकती हैं। जब तक हमारे देश की निर्वाचन पद्धति में कोई सुधार नहीं आ जाता, तब तक राजनीति में किसी भी प्रकार के परिवर्तन की उम्मीद करना बेकार हैं। मैं मोदी जी द्वारा वर्तमान राजनीति में जो सुधारात्मक कार्यक्रम किए जा रहे हैं, उनकी खुले कंठ से सराहना करता हूँ।उदाहरण के तौर पर विमुद्रीकरण की बात को ही ले लें।लघु अवधि के नुकसानों को अगर छोड़ दिया जाए तो दीर्घ अवधि में इसके फायदे ही फायदे होंगे ।
प्रश्न॰ 14 :- “कॉमर्शियल टैक्सेज़” वाले अध्याय में आपने किमते नामक एक व्यापारी का उदाहरण देते हुए यह लिखा है कि आधुनिक युग में कोर्इ भी व्यवसाय र्इमानदारी से नहीं किया जा सकता है, तब आपके दृष्टिकोण से र्इमानदारी लाने के लिए क्या-किया किया जाना चाहिए?
उत्तर - मुझे इस बात का दु:ख है कि जो लोग हमसे दस गुणा ज्यादा कमाते है, मगर वे हमारे जितना इन्कम टैक्स नहीं भरते हैं। यह अन्तर क्यों? अगर वे लोग अपना पूरा-पूरा टैक्स भरे तो सरकार के राजस्व में अच्छी-खासी वृद्धि हो जाएगी। इस कार्य के लिए निर्वाचन-प्रक्रिया में ठोस संशोधन की आवश्यकता है।
मेरे दृष्टिकोण में “टेक्नॉलॉजी ब्रिंग्स ट्रांसपेरेंसी” कथन एकदम सही है।उदाहरण के तौर पर ई-टेंडरिंग,ई-आक्शन,ऑटो रिफ़ंड,ऑनलाइन पेमेंट आदि ऐसी व्यवस्थाएं हैं। अपने काम के लिए जहां एक आदमी को दूसरे आदमी से संपर्क में आने की आवश्यकता नहीं हैं। इस अवस्था में भ्रष्टाचार स्वत: कम हो जाएगा।
प्रश्न॰ 15:- - आपनी पुस्तक के अध्याय ‘‘गोदावरी फर्टिलाइजर केमिकल लिमिटेड” में एक महाप्रबंधक (वित्त) का उदाहरण देते हुए यह बताया है कि किसी ऑर्गेनाइजेशन का मुखिया अगर भष्टाचारी है तो वो बहुत थोड़े समय में सारे ऑर्गेनाइजेशन को भ्रष्टाचार का सेसपूल बना देता है। इस पर अपने विचार प्रकट करें।
उत्तर - किसी भी ऑर्गेनाइजेशन का मुखिया अगर भ्रष्टाचारी है तो वह अपने प्रभाव का प्रयोग कर अपने अधीनस्थ अधिकारियों एवं मुख्य प्रबंधन को प्रभावित कर आराम से कुछ ही समय में भ्रष्टाचार का सेसपूल बना देता हैं। यह भ्रष्टाचार एक सिडींकेट के रूप में काम करता है और कमाए गए पैसों का आनुपातिक तौर पर सिंडीकेट के सभी लोगों में बंदर-बांट होती है।
प्रश्न॰ 16 :- समूचे देश को हिलाकर रख देने वाली आपकी पुस्तक “Crusader or Conspirator?” में उच्चतम स्तर के कर्इ सरकारी गोपनीय एवं गुप्त-पत्र संलग्न हैं। ऐसी पुस्तक लिखने के आपके संकल्प के पीछे के क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर - मेरी सेवा-निवृत्ति के पश्चात अपने संस्मरणों पर आधारित एक पुस्तक लिखने की सोच रहा था, लेकिन पुस्तक का क्या विषय रहेगा,क्या शीर्षक रहेगा?, इस बारे में कभी भी सोचा नहीं था। कुछ तो पुराने कागज मैंने पहले से ही इकट्ठे कर रखे थे और कुछ मैंने आरटीआई के माध्यम से मँगवा लिए थे। मगर मेरे घर में हुई सीबीआई की रेड ने मेरा काम आसान कर दिया। मुझे अपने पुस्तक की थीम ‘करप्शन’ तथा शीर्षक ‘क्रूसेडर ऑर कोन्स्पिरेटर?’ मिल गया। मैंने मेरे पास समस्त जमा सामग्री को एक पुस्तक का रूप दे दिया।उसे प्रमाणिक बनाने के लिए मैंने मेरे पास सारे संचित गोपनीय एवं गुप्त-पत्र पत्रों को संलग्न कर दिया।
प्रश्न॰ 17 :- श्री पी॰सी॰पारख अपने कैरियर का मूल्यांकन किस तरह करते हैं तथा सर्विस का सबसे अच्छा फेज किसे मानते हैं और क्यों?
उत्तर - मेरा पूरा कैरियर अधिकांश संतोषजनक रहा। मगर जिन तीन क्षेत्रों में मेरा योगदान अत्यन्त ही सार्थक रहा, वे निम्न हैं:-
1) वाणिज्यिक कर विभाग में मैंने डिप्टी कमिश्नर एवं ज्वॉइंट कमिश्नर (इंफोर्समेंट विंग) के रूप में कार्य किया था और मैंने देखा कि जिन लोगों को मैंने चयनित कर इंफोर्समेंट विंग में लाया था, उन्होंने इंफोर्समेंट विंग में आने के बाद अत्यन्त ही र्इमानदारी तथा निष्ठापूर्वक कार्य किया।मैं उसे अपनी उपलब्धि मानता हूँ।
2) उद्योग विभाग में काम की सफलता का एक राज था कि मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू के साथ मेरा सौहाद्रपूर्ण संबंध था।अत: पूरे प्रदेश में निवेश का वातावरण पैदा करने में मुझे कोर्इ पेरशानी नहीं थी।बहुत सारी कपंनियों को मैंने आमंत्रित किया।पहली बार उद्योग विभाग ने सिंगल विंडो फार्मूला तैयार किया था। रिव्यू मीटिंगें हर महीने होती थी।जिससे राज्य के निवेश पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। यूके,यूएसए और साउथ ईस्ट एशिया में रोड-शो भी निकाले गए।हैदराबाद भी बैंगलुरू की तरह देश-विदेशों से निवेशकों को खींचने लगा। यहाँ तक कि बिल गेट़स और बिल क्लिंटन भी हैदराबाद की तरफ आकर्षित हुए।
3) कोल मिनिस्ट्री में सैक्रेटरी के तौर पर मैंने काम करते हुए रिफॉर्म लाने का प्रयास किया।ई-आक्शन लागू करने के साथ-साथ सीएमडी/डायरेक्टर के चयन की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने तथा हानि में डूबी अनुषंगी कंपनियों को प्रॉफ़िट में लाने की भरसक मेहनत की।
प्रश्न॰18 :- इंडियन ब्यूरोक्रेसी के नकारात्मक पहलू पर हमेशा से आलोचना होती आ रही है। क्या आप इससे सहमत है?
उत्तर - ब्यूरोक्रेसी में अच्छे और बुरे दोनों पहलू होते हैं। राजनैतिक नेतृत्व पर अधिकांश चीजें निर्भर करती हैं। सामान्यतौर पर गुजरात, आंध्र-प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों में सिविल सर्विसेज देना बेहतर हैं,जबकि उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार में दे पाना मुश्किल है। फिलहाल नीतिश कुमार के शासन-काल में बिहार के प्रशासन में काफी सुधार आया हैं।
प्रश्न॰ 19 :- ब्यूरोक्रेसी में किस प्रकार के संशोधनों की सलाह आप देना चाहेंगे?
उत्तर - किसी भी अच्छी सिविल सर्विस के तीन मूलभूत सिद्धान्त होते हैं:-
1- राजनैतिक रूप में निष्पक्षता
2- र्इमानदारी
3- जो सही हैं उसे सही कहने का साहस होना चाहिए।
अगर यह तीनों सिद्धान्त किसी भी सिविल सर्विस में लागू हो जाए तो वह एक अच्छी सिविल सर्विस कही जा सकती हैं।

प्रश्न॰20 :- आपकी पुस्तक “Crusader or Conspirator?” के प्रति लोगों का कैसा रेस्पोंस रहा? क्या आप इससे संतुष्ट है?
उत्तर - यह किताब जागरूक पाठकों द्वारा अत्यन्त ही प्रंशसित हुर्इ तथा सन् 2014 की बेस्ट सेलर किताबों में से एक थी।इन्टरनेट अमेज़न के एक सर्वेक्षण ने उस साल की संजय बारू की ‘एक्सीडेन्टल प्राइम मिनिस्टर’, मनोज मित्रा की “फिक्शन ऑफ फैक्ट फ़ाइंडिंग: मोदी एंड गोधरा”, एंडी मारिओ की “नरेन्द्र मोदी : पोलिटिकल बायोग्राफी” और सोमा बनर्जी की “द डिस्सरप्टर : अरविंद केजरीवाल” जैसी बेस्ट सेलर पुस्तकों में इसे शामिल किया था।
मैं अपनी इस किताब को लेकर काफी संतुष्ट हूँ।पाली के कलेक्टर ने मुझे इस किताब के बारे में एक पत्र लिखा तथा पूर्व कोयला सचिव अनिल स्वरूप ने भी पढ़ने के बाद मुझे प्रतिक्रिया-स्वरूप एसएमएस किया। इससे लगता हैं इस पुस्तक ने हर क्षेत्र के पाठकों को आकर्षित किया, खासकर युवावर्ग के प्रशासनिक एवं अधिशाषी अधिकारियों को।मेरे प्रकाशक मानस पब्लिकेशन्स,नई दिल्ली के हिसाब से इस पुस्तक के प्रकाशित होने के कुछ ही महीनों में सोलह हजार प्रतियाँ बिकीं, जो एक रिकॉर्ड था।
प्रश्न॰21 :- मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास ‘नमक का दरोगा’ ने आपको ऐसी किताब लिखने के लिए प्रेरित किया?
उत्तर:- मुंशी प्रेमचंद के बहू-चर्चित उपन्यास ‘नमक का दरोगा’ ने मुझे अपना जीवन उपन्यास के मुख्य पात्र की तरह जीने के लिए प्रेरित किया। सीबीआई रेड की वजह से जनता के समक्ष सारे तथ्य रखने के लिए मैंने यह किताब लिखी।
प्रश्न॰22 :- क्या आपकी कोर्इ और पुस्तक लिखने की योजना हैं? अगर हैं तो इस पर विस्तार से प्रकाश डालें।
उत्तर - हाँ। दूसरी किताब की पाण्डुलिपि लगभग तैयार हैं। यह किताब पहली किताब से पूरी तरह अलग हैं। जिसमें देश की कोयला नीतियों तथा सीबीआई जाँच में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णयों को मैंने आधार बनाया है। यह 250 पृष्ठों की पुस्तक होगी।जिसका प्रकाशन मैं स्वयं करने की सोच रहा हूँ,क्योंकि दूसरे प्रकाशन-गृह वाणिज्यिक होने से ऐसी पुस्तकों के प्रकाशन करने से कतराते हैं कि भविष्य में कहीं सरकारी-तंत्र उन्हें परेशान न करें।
प्रश्न॰ 23 :- अनेक विषम परिस्थितियों के बावजूद आप भारत सरकार के सचिव-पद से सेवा-निवृत्त हुए है। क्या यह आपकी सफलता नहीं है?
उत्तर - मेरा संपूर्ण कैरियर मेरे दृष्टिकोण में सफलता से भरा हुआ था।
प्रश्न॰ 24 :- आपके दुर्दिनों के समय आपके परिवार ने आपको किस प्रकार संबल प्रदान किया?
उत्तर - मुझे मेरे परिवार से पूरी तरह अन-रिजोल्वड़ सपोर्ट मिला।
प्रश्न॰25 :- कृपया आपके जीवन की कोर्इ ऐसी घटना बताएं जो आज तक आपके मानस पटल पर तरोताजा है?
उत्तर - मैंने अपनी किताब के प्रथम अध्याय में आंध्र-प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री के श्री ब्रह्मानंद रेड्डी का जिक्र किया है। जिन्हें हम उनके ऑफिसियल निवास-स्थान ‘आनंद निलयम’ विला पर सौजन्यतावश मिलने गए थे। उन्होंने जो बात कहीं थी आज भी मेरे मन-मस्तिष्क में तरोताजा हैं।उन्होंने कहा था,‘‘आज से आप, लोग राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार या ओड़िशा के नहीं हैं।आप सभी आंध्र-प्रदेश के हों। हमारे राज्य के विकास और इसके लोगों का कल्याण आपके सामर्थ्य। एवं कठिन परिश्रम पर निर्भर करेगा।मुझे पूर्ण विश्वास हैं कि आप सभी मेरे विश्वास पर खरे उतरेंगे।अगर आपको किसी भी प्रकार की कठिनार्इ या कोई समस्या आए तो मेरे घर के दरवाजे आपके लिए सदैव खुले हैं।”
कितने उदार हृदय के थे वे! आज के राजनेताओं में इस प्रकार की उदारता, परिपक्वता और खुले विचारों वाली मानसिकता नहीं मिलेगी। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी मुझे अपने कार्यों में पूरी तरह स्वतंत्रता दे रखी थी,मगर राजनैतिक दबाव के चलते उन्हें भी कर्इ जगहों पर समझौता करना पड़ता था।उनके समय 2 मार्च, 2005 को www. whispersincorridors.com पर मेरे बारे में एक चर्चा शुरू हुर्इ थी कि “विल कोल सेक्रेटेरी बी रिपेट्रिएटेड?”।
प्रश्न॰ 26 :- साक्षात्कार में ऐसी कोर्इ चीज जिसके बारे में मैंने आपको कुछ नहीं पूछा हो तो उसके बारे में ध्यानाकृष्ट करें।
उत्तर - आपने सब-कुछ तो पूछ लिया हैं। ऐसा कुछ भी नहीं बचा हैं,जिसे पूछना बाकी हैं।
प्रश्न॰ 27 :- किसी भी प्रकार का कोर्इ दु:ख या पछतावा?
उत्तर - किसी भी प्रकार का कोर्इ दु:ख या पछतावा नहीं हैं।
प्रश्न॰ 28 :- क्या कोल इंडिया में सीएमडी का चयन अभी भी उसी तरह से हो रहा है, जैसे आपके समय में पारदर्शिता से हुआ करता था?
उत्तर - फिलहाल कर्इ सालों से मेरा कोयला-मंत्रालय से कोई संपर्क नहीं हैं। जहाँ तक मुझे जानकारी है, श्री पीयूष गोयल र्इमानदार छवि वाले मंत्री है और पूर्व कोयला सचिव श्री अनिल स्वरूप भी बेहद अच्छे ऑफिसर और अच्छे इंसान है।अत: मुझे लगता हैं कि आजकल भी सीएमडी का चयन मेरिट एवं दक्षता के आधार पर ही होता होगा।
प्रश्न 29 :- कुछ समय पूर्व कोयला सचिव श्री अनिल स्वरूप को कोयला मंत्रालय से हटाकर शिक्षा विभाग में अचानक क्यों दे दिया गया?
उत्तर - श्री अनिल स्वरूप का कार्यकाल अभी दो-तीन साल बचा हुआ हैं। कोल-सेक्टर में जितने सुधार करने थे,वे सारे सुधार लगभग पूर्ण हो गए हैं। बहुत कुछ ज्यादा नहीं बचा है कोल सेक्टर में सुधार लाने के लिए।
अगर उन्हें शिक्षा-विभाग में दिया गया है तो सरकार ने कुछ सोच समझकर ही दिया होगा। उस क्षेत्र में अभी काफी सुधार लाने बाकी है।मुझे पूर्ण विश्वास हैं, वे इस कार्य में सफल होंगे।
प्रश्न॰ 30 :- सीबीआई के पूर्व निदेशक श्री रणजीत सिन्हा पर सीबीआई कार्यवाही कर रही हैं? इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
उत्तर :- रणजीत सिन्हा का नाम शुरू से ही विवादों के घेरे में रहा हैं। पूर्व में उनका नाम चारा-घोटाला में भी उछला था। मगर मेरे केस में सीबीआई की क्लोजर रिर्पोट में उन्होंने बहुत अच्छा खुलासा किया कि मेरे सारे निर्णय लोक हित में किए गए थे और उसमें किसी भी प्रकार की गलती नहीं हुर्इ हैं।
प्रश्न॰32 :- सेवानिवृत्ति के पश्चात आप दो एनजीओ चला रहे हैं, इस पर कुछ बताएं।
उत्तर - मेरा पहला एनजीओ कृत्रिम अंग लगाने में संबन्धित हैं। विकलांग लोगों के जयपुर फुट लगाकर उन्हें सहायता प्रदान की जाती हैं।अलग-अलग जिलों में कलेक्टर की सहायता से विकलांगों के लिए कैम्प लगाए जाते हैं तथा उन्हें वहां आने के लिए मोबिलाइज किया जाता हैं। कलेक्टर हमें जगह और लोगों के निशुल्क खाने की सुविधा प्रदान करता हैं।एक कैम्प में कम से कम 300-400 पीड़ित लोग आते हैं। हम अपने सारे टेक्नीशियन और वर्कशॉप उन कैम्पों में ले जाते हैं और सुबह आए हुए विकलांग आदमी को देर रात तक तथा दोपहर को आए हुए आदमी को अगली सुबह तक जयपुर फुट लगाकर विदा कर देते हैं। सारे कैम्प सरकारी अस्पतालों में नि:शुल्क ही लगाए जाते हैं।जिसका खर्च कम्पनियों की सीएसआर स्कीम अथवा डोनेशन के माध्यम से किया जाता है।
मेरा दूसरा एनजीओ किडनी डायलासिस से संबन्धित हैं।इसके लिए हमारा एनजीओ प्रति व्यक्ति तीन सौ रुपए खर्च लेता हैं, जबकि बाहर में डायलासिस करवाने पर खर्च ढाई हजार प्रति व्यक्ति आता हैं।मेरी जानकारी के अनुसार किडनी के मरीज का मासिक खर्च चौबीस हजार से पचास हजार आता है,जबकि हमारे यहां यह खर्च दो हजार से पाँच हजार तक आता है। किडनी डायलासिस के हमारे चार केन्द्र हैं, तीन कोटी अस्पताल, भगवान महावीर विकलांग सहायता केन्द्र, राजा रामदेव मेमोरियल, गुरूद्वारा सिकन्दराबाद।
हमारे पास डायलासिस की एक सौ बारह मशीनें है। हमारा एनजीओ आंध्र-प्रदेश का सबसे बड़ा सर्विस प्रोवाइडर है। पाँच साल के भीतर हमने चार लाख से ज्यादा डायलासिस किया हैं। हम अपने डायलासिस केन्द्रों में सरकार द्वारा प्रायोजित बीपीएल रोगियों का उपचार करते हैं, जिसके लिए सरकार हमें बारह सौ रुपए प्रति सेशन भुगतान करती है। जिसमे से जो कुछ बच जाता है,उसे दूसरे एपीएल मरीजों के इलाज को सब्सिडाइज्ड रेट पर करने में काम में लेते है।
( साक्षात्कार समाप्त करने से पूर्व पारख साहब के बारे में उनकी जीवनसंगिनी श्रीमती उषा पारख की राय जानने के लिए दो सवाल मैंने उनसे भी पूछे।)
प्रश्न.30:- अपने पति श्री प्रकाश चन्द्र पारख का मूल्यांकन कैसे करती हो? जब वे किसी तरह का कठोर निर्णय लेते होंगे तब आप के ऊपर क्या प्रभाव पड़ता था?
उत्तर :- (हँसते हुए) विगत पैतालीस सालों से उनके साथ रह रही हूँ। इतनी दीर्घ अवधि का मूल्यांकन किन शब्दों में करूँ,समझ नहीं पा रही हूँ। पारख साहब बहुत ही ईमानदार कर्मठ,झुझारू और अत्यंत ही सहयोगी पति हैं। यह दूसरी बात है कि वे यथार्थ में ज्यादा विश्वास रखते हैं, इसलिए इमोशनल कुछ कम है। मुझे उनका कठोर निर्णय लेना अच्छा लगता है क्योंकि मैं भी राजस्थान के एक ऐसे परिवार से संबंध रखती हूँ, (ऐसे मेरा परिवार जोधपुर का रहने वाला है,मगर मेरा जन्म राजस्थान के सांभर जिले में हुआ),जिसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि में उनकी ही तरह कठोर निर्णय लेने वाले मेरे बड़े भाई श्री पी॰एन॰भण्डारी भी 1963 बैच के आईएएस अधिकारी (सेवानिवृत्त) हैं।मेरे पिताजी श्री आर॰ एन॰ भण्डारी,डाइरेक्टर ऑफ इम्प्लॉइमेंट थे,एक भाई बैंक ऑफ इंडिया,गुजरात में महाप्रबंधक है और दूसरा भाई डुंगरपुर में बिल्डर है। इस वजह से मैं सिविल सर्विस की सीमा-रेखा से पूर्व परिचित थी,मगर फिर उनकी पत्नी होने के कारण जब भी ये कोयला माफियाओं की हृदय-स्थली धनबाद जाते थे तो मेरे दिल में हमेशा धक-धक बनी रहती थी कि कहीं कुछ अघटन न घट जाए।एक विचित्र डर लगने लगता था।
प्रश्न॰31:- पारख साहब की कुछ कमजोरियों के बारे में बताना आप पसंद करेंगी?
उत्तर:- ( फिर से हँसते हुए ) पारख साहब आजकल मेरी सुनते नहीं हैं, अपना ध्यान भी नहीं रखते हैं। यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है। सबसे पहले आदिलाबाद में साहब सब-कलेक्टर थे तो वहाँ के आदिवासियों का एक मुखिया परंपरा के अनुसार मिलने आता था, उसने उनकी तरफ देखकर कहा था, “ जब तक आप अपनी बीवी की बात मानोगे तब तक आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। हमेशा आपकी तरक्की होगी।”
(यह कहते हुए वह अपने अतीत में खो जाती है,शायद उन्हें नौकरी वाले अपने पुराने दिन याद आने लगते हैं।फिर यथार्थ में लौटकर पारख साहब की तरफ देखते हुए कहने लगती है)
उस समय तो मेरी सुनते थे। नौकरी के सारे समय उन्होंने मेरी बात मानी,मगर अब ... ?
(यह कहते हुए वह नीरव हो जाती है।)
पूर्व सचिव,कोयला-मंत्रालय, भारत सरकार
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