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आतंक के 20 साल बाद कश्मीर

प्रकाशन :सोमवार, 1 मार्च 2010
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क्या कश्मीर समस्या का समाधान संभव नहीं है जवाब मिलना संभव तो है लेकिन यहाँ के राजनीतिक दल ही नहीं चाहते कि ये मामला सुलझे, क्योंकि यदि यह समस्या सुलझ गई तो राजनीतिक दलों एवं छद्म मानवाधिकारवादियों के पास कश्मीरी आवाम को बरगलाकर शासन करने का मुद्दा ही ख़त्म हो जायेगा। इस उठापटक में पिस कौन रहा है मर कौन लोग रहे हैं, तनाव के दंश से कौन लोग गुज़र रहे हैं और बंदूक के साये में जीने के लिए मजबूर कौन हैं, वह न तो कोई राजनेता हैं और न ही अलगाववादी, बल्कि आम कश्मीरी आवाम को इन समस्याओं से जूझना पड़ रहा है।

उमाशंकर मिश्र श्रीनगर से लौटकर

जम्मू पहुँचते ही प्रीपेड मोबाईल फ़ोन का बंद होना इस बात का प्रतीक बन गया था कि जम्मू एवं कश्मीर में शांति एवं सुरक्षित वातावरण एवं खुली हवा में साँस लेने की तमाम दलीलें भले ही दी जाती हों, लेकिन इस राज्य एवं स्थानीय निवासियों की नियति की हक़ीक़त तो कुछ और ही है। दरअसल सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए प्रीपेड-मोबाईल सेवाओं पर राज्य भर में प्रतिबंध लगा दिया था। इस बात का ज़िक्र जब मैंने जम्मू पहुँच कर राज्य सूचना सेवा में कार्यरत एक अधिकारी से किया तो जवाब मिला-दिस इज दि टैªजेडी विद जे.एण्ड के. पीपुल्स। ठीक एक दिन पहले ही साम्बा में पाकिस्तानी घुसपैठ की कोशिश को भारतीय सेना ने नाकाम किया था। बहरहाल आगे मुझे श्रीनगर और फिर वहाँ से सीमावर्ती जिले कुपवाड़ा तक का सफ़र तय करना था। उक्त सूचना अधिकारी महोदय ने मुझे श्रीनगर के कुछ संपर्क सूत्र दिये और मैं आगे के सफ़र पर निकल पड़ा। 1989 में शुरू हुए जेहादी आतंकवाद के बाद से लेकर अब तक एक नई पीढ़ी तैयार हो चुकी है, जिसने बचपन से लेकर जवानी तक का सफ़र बंदूक के साये में बिताया है और खुली हवा में साँस लेने का मतलब क्या होता है, वे नहीं जानते। एक प्रतिष्ठित न्यूज एजेंसी में कार्यरत कश्मीरी पत्रकार साथी की बात नहीं भूलती-हम नहीं जानते हमारे साथ अगले पल में क्या होने वाला है, लेकिन कुछ भी हो, हमने इसी मिट्टी में जन्म लिया है, इसे छोड़कर भी तो नहीं जा सकते और जाएँगे भी कहाँ । हर आम और ख़ास कश्मीरी आवाम के दिलो-दिमाग़ में इस तरह की बातें जब तब घुमड़ती रहती हैं।

जम्मू तक तो मेरा जाना पहले भी हुआ था, लेकिन कश्मीर घाटी की यह पहली यात्रा थी, जिसे लेकर मन में कई तरह के सवालों के साथ उहापोह और रोमांच भी था। यह यात्रा महत्वपूर्ण थी, ख़ासकर ऐसे समय में जब कश्मीर में आतंकवाद के दौर से लेकर अब तक 20 साल पूरे हो हैं। राज्य के हालात, कश्मीरियों की मनोदशा एवं स्थानीय परिवेश को समझने का बेहतर अवसर शायद ज़ल्दी नहीं मिलेगा! यह बात बख़ूबी मेरे जे़हन में थी। यही कारण था कि मैं इस सफ़र के हर लम्हें को मन में संजो लेना चाहता था। जम्मू से श्रीनगर तक क़रीब नौ घंटे का सफ़र सड़क मार्ग से तय करना था। जम्मू से घंटों लम्बा सफ़र करके मेरा श्रीनगर पहुँचना कुछेक कश्मीरी मित्रों के लिए अनापेक्षित घटना थी, क्योंकि उनके मन में दिल्ली के पत्रकार की एक हाई प्रोफ़ाईल छवि थी, जो सड़क मार्ग से श्रीनगर तक का सफ़र बमुश्किल ही करना चाहेंगे।

कठुआ से लेकर जम्मू और फिर वहाँ से उधमपुर, पटनीटॉप, चन्द्रकोट, रामबण, रामसू, पनथल, बनिहाल, जवाहर सुरंग, काजीगुंड एवं अनंतनाग होते हुए श्रीनगर पहुँचने तक गांवों-कस्बों, पर्वत की चोटी से लेकर गहरी घाटियों के बीच, सड़कों एवं चौराहों पर और यहाँ तक कि सड़क के किनारे मकानों की छतों पर भी सेना के जवान तैनात दिखाई दे जाते हैं। सपनों की दुनिया मानों साकार हो रही थी, लेकिन कई सवाल भी मन में उठ रहे थे। कश्मीर के प्राकृतिक सौन्दर्य को देखने के कौतूहल के साथ-साथ वहाँ भारी संख्या में फौज की तैनाती को देखकर लगा मानो 20 साल बाद भी कश्मीर में आतंकवाद की काली छाया मिट नहीं पायी है और मन एक तरह के भय से अनायास भर जाता है। बाहर से कश्मीर भ्रमण के लिए जाने वालों के लिए तो बंदूक के साये में रहने का अहसास क्षणिक होता है, लेकिन कश्मीरी जनजीवन में फौज की मौज़ूदगी के कई तरह के मायने देखने को मिलते हैं। फौज की मौज़ूदगी का मामला सिर्फ़ सुरक्षा कारणों से ही नहीं जुड़ा, बल्कि इसका मूल कारण राजनीति को माना जाता है। सच तो यह है कि कश्मीर के भोले-भाले लोग अपने ही राजनीतिज्ञों के हाथों की कठपुतली बनकर रह गए हैं, राजनीतिज्ञ जैसा चाहें लोगों को अपने इशारों पर नचाते हैं। शायद यही कारण है कि आज कश्मीर की आबादी का एक हिस्सा जहाँ ख़ुद को हिन्दुस्तानी मानता है तो दूसरी ओर एक ऐसा वर्ग भी है, जिसे यह लगता है कि हिन्दुस्तान ने उनके हितों पर, उनकी ज़मीन पर ज़बरन क़ब्जा जमाया हुआ है। सवाल उठता है कि हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आपस में सब भाई-भाई का नारा लगाने वालों के मन में ज़हर का यह बीज आख़िर बोया किसने है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है। लेकिन कश्मीर में जाने पर अनायास ही यही वाक्य न जाने क्यों एक अंर्तद्वंद में तब्दील हो जाता है। तमाम भारतवासियों के मन में अंर्तद्वंद का यह बीज बोने के लिए आख़िर कौन ज़िम्मेदार है । इस सवाल का जवाब ढूँढने पर भी नहीं मिलेगा, बड़े-बड़े बुद्धिजीवी और समाज के झंडाबरदार भी इस सवाल का जवाब देने से कतराते हैं। चर्चा छिड़ी तो बस यहीं तक सिमट जाती है कि जिम्मेदार कौन । महाराजा हरि सिंह, जवाहर लाल नेहरु, शेख अब्दुल्ला, पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस या फिर हुर्रियत कांफ्रेस एवं जेकेएलएफ जैसे अलगाववादी संगठन!

मन में एक उहापोह इस बात को लेकर भी थी कि शेष भारत के लोग तो कश्मीर को देश का अभिन्न हिस्सा मानते हैं और कश्मीर और वहाँ के लोगों को कभी अलग करके नहीं देखा जाता, केन्द्र सरकार भी तमाम तरह की रियायतें देती हैं, फिर वहाँ के लोग आख़िर कैसी आज़ादी चाहते है! उनके लिए आज़ादी के मायने क्या हैं। आख़िर ऐसी कौन सी ज़्यादतियाँ भारत की लोकतांत्रिक सरकार ने कश्मीर वासियों पर की हैं । फिर अभी तो स्थानीय लोगों ने ही अपने मताधिकार का प्रयोग कर अपनी सरकार को चुना था। इन सवालों के साथ एक और बात मन को परेशान कर रही थी। ये बात कश्मीर में सेना की मौज़ूदगी को लेकर थी। 1989 में जब कश्मीर में ज़ेहाद की लड़ाई के नाम पर आतंकवाद का दौर आरंभ हुआ तब से लेकर अब तक बर्फ से ढंकी चोटियों से लेकर गहरी एवं वीरान घाटियों समेत गांवों, शहरों एवं क़स्बों में सेना का पहरा लगा हुआ है। इससे तथाकथित ज़ेहादियों के हौसले ज़रूर पस्त हुए हैं, लेकिन सेना की मौज़ूदगी ने अलगाववादियों समेत प्रादेशिक राजनीतिक दलों को बैठे-बिठाये मुद्दा मुहैया करा दिया है। जैसा कि छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्र में मानवाधिकार की आड़ में सेना के खिलाफ प्रोपेगेण्डा की बात सामने आई थी, ठीक उसी तरह कश्मीर में सेना की मौज़ूदगी को मानवाधिकार हनन से जोड़कर देखा जा रहा है। अलगाववादियों समेत राज्य की पीडीपी सरीखी राजनीतिक पार्टियाँ भी सेना एवं अर्द्धसैनिक बलों पर मानवाधिकार हनन का आरोप लगाकर कटघरे में खड़ा करती रही हैं। सेना की तैनाती अलगाववादियों की आँखों की किरकरी तरह है, जिसका समर्थन कुछेक राजनीतिक संगठन भी करते हैं। आमतौर पर छद्म मानवाधिकारवाद राज्य के विरोध का सबसे सशक्त हथियार माना जाता है। शायद यही कारण है कि कश्मीर में इस तरह की कवायदें बख़ूबी जारी हैं, जिससे सरकार पर दबाव बनाकर अपनी बात मनवाई जा सके।

वर्ष 2009 के मई महीने के आख़िर में घटित कश्मीर का चर्चित शोपियाँ कांड इस बात का ताज़ा प्रमाण कहा जा सकता है। दो लड़कियों का बलात्कार और फिर उनकी हत्या का आरोप सीआरपीएफ पर लगाया गया। मामले की जाँच सीबीआई को सौंपी गई और जिसमें पाया गया कि उन लड़कियों के साथ न तो बलात्कार हुआ था और न ही उनकी हत्या की गई थी। बल्कि उनकी मौत नाले में डूबने से हुई थी। कश्मीर के मानवाधिकारवादियों ने इस बात को लेकर ख़ूब हो-हल्ला किया और एक बार फिर सेना की मौजूदगी के ख़िलाफ़ बिगुल फूँक दिया। कश्मीर में 15 दिसंबर की सुबह अलगाववादियों के आह्वान पर राज्यव्यापी बंद ने मेरा स्वागत किया। कश्मीर की मनोहारी प्राकृतिक छटा के बीच व्याप्त तनाव को महसूस करने के लिए इतना समय पर्याप्त था। इससे पहले 14 दिसंबर की शाम को श्रीनगर के रास्ते में मैंने ड्राईवर से कहा कि मुझे लाल चौक पर उतार देना, मार्किट में पीसीओ से कुछेक फ़ोन करूँगा, क्योंकि मेरा फ़ोन काम नहीं कर रहा था। प्रत्युत्तर में वह हँसा और कहने लगा कि-अब कहाँ मार्किट खुली होगी, यह श्रीनगर है। यह बात किसी भी अजनबी को हतप्रभ करन के लिए पर्याप्त थी, क्योंकि अभी तो शाम के सिर्फ़ ही साढ़े छः बज रहे हैं फिर श्रीनगर जैसा शहर जहाँ देश-विदेश के सैलानी घूमने के लिए आते हों इतनी ज़ल्दी कैसे बंद हो सकता है। बहरहाल लाल चौक पहुँचकर देखा तो इक्का-दुक्का दुकानें खुली थी, सौभाग्यवश इनमें एक पीसीओ भी था। वहाँ से मैंने सर्किट हाऊस फ़ोन लगाया तो पता चला कि मेरी बुकिंग कन्फ़र्म हो गई है। ऑटो लेकर मैं सर्किट हाऊस की तरफ चल पड़ा। रास्ते में ऑटो वाले से बातचीत की तो उसने बताया कि-ऑफ़ सीजन होने की वजह से आजकल सैलानी बहुत कम आ रहे हैं। वैसे भी हालात ख़राब होंगे तो कौन आना चाहेगा यहाँ। अगले दिन राज्यव्यापी बंद की बात मुझे उसी ऑटो वाले से पता चली थी। जिस पर मैंने उससे पूछा था कि-क्या ट्रांसपोर्ट भी बंद रहेगा, क्योंकि मेरी योजना अगले ही दिन कश्मीर के सीमावर्ती जिले कुपवाड़ा जाने की थी। उसने कहा हाँ, तोड़फोड़ और मारपीट भी हो सकती है। इस बात को जानने के बाद मेरा उत्साह ढीला पड़ गया और अगले दिन दोपहर तक मैं सर्किट हाऊस में ही बैठा रहा।

दोपहर बाद स्थानीय अख़बार में कार्यरत एक मित्र से फ़ोन पर बात की तो उसने मिलने के लिए बुला लिया। हम पैदल ही लाल चौक तक गए। चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा बलों का पहरा था। उसने कहा आओ तुम्हें मेसूमा ले चलता हूँ। लाल चौक के करीब मेसूमा श्रीनगर में होने वाले विरोध प्रदर्शनों एवं पथरावबाज़ी का केन्द्र बन चुका है। एक अन्य स्थानीय पत्रकार मित्र ने बताया कि तंग गलियाँ होने के कारण लोगों को सुरक्षा बलों पर पत्थर मारकर छुपने में आसानी होती होती है। मेसूमा के एक नवयुवक तौसीफ़ ने बातचीत के दौरान बताया कि चाहे कुछ भी हो, सेना के लोग घरों में नहीं घुसते। तौसीफ़ की बातों से लग रहा था कि उसके मन में भी सुरक्षा बलों के ख़िलाफ़ काफ़ी गुस्सा भरा पड़ा था। बातचीत के दौरान उसने बताया कि कई बार उसने भी पथराव किया है। उत्सुकतावश मैंने पूछ लिया कि क्या तुम्हे भी कभी चोट लगी है । जवाब में उसने कहा कि पिछले साल अमरनाथ श्राईन बोर्ड के मामले हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान मुझे रबड़ की बुलेट लगी थी। मैंने उससे पूछा तुम क्यों पथराव कर रहे थे? इस पर उसने कहा कि यह अपनी ज़मीन का मसला था, इसलिए इसमें तो हर कश्मीरी को होना चाहिए था। भूलना नहीं चाहिए तौसीफ़ उस पीढ़ी का हिस्सा है जिसने अपने बचपन से लेकर अब तक की उम्र का सफ़र आतंक एवं तनाव के साये में तय किया है। सूचना क्रांति का विस्तार भी इसी दौर में हुआ। तमाम मीडिया हाऊस खुले, जिनकी बदौलत अलगाववादियों एवं छद्म राजनीतिज्ञों ने अपनी राजनीतिक बिसातों के मोहरे फेंककर तौसीफ़ जैसे युवाओं को बरगलाने का काम किया। आधिकारिक आँकड़े बताते हैं कि गत दो दशकों में कुल चार साल के क़रीब कश्मीर बंद रहा है। इसके कारण स्थानीय अर्थव्यवस्था को होने वाले नुकसान के अलावा लोगों के मानस पर भी असर पड़ा है। तौसीफ़ जैसे नौजवानों की पीढ़ी इसी दौर की बीच पली-बढ़ी है।

बहरहाल 15 दिसम्बर के बंद से माँ, बहन एवं बेटियों के साथ दुराचार की बात पर लोगों की सहानुभूति भी ख़ूब मिल रही थी। बलात्कार एवं हत्या के चलते मामला निस्संदेह संगीन एवं अक्षम्य था। लेकिन इसके पीछे जो गंदी राजनीति खेली गई, कश्मीरी लोग आज से नहीं बल्कि पिछले कई वर्षों से उस राजनीति के दुष्चक्र में फँसे हुए हैं। जिस दिन मुझे वापस लौटना था, उस दिन शंकराचार्य मंदिर जाने की इच्छा हुई तो मैं सर्किट हाऊस से पैदल ही निकल पड़ा। शंकराचार्य मंदिर डल झील के किनारे पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। मंदिर के दरवाज़े पर पहुँचने पर वहाँ तैनात सेना के जवान जे.के. सिंह से मुलाक़ात हुई। बातचीत शुरू हुई तो मैंने उनसे सुरक्षा बलों के प्रति लोगों के रवैये के बारे में जानना चाहा। जवाब में उन्होंने कहा कि-हम तो संतरी हैं, हमें यहाँ से जाने का आर्डर मिलेगा तो बिना कुछ सोचे-समझे अपना बोरिया-बिस्तर बांध लेंगे। दूर बर्फ़ से ढकी चोटियों की ओर इशारा करते हुए वे कहने लगे कि वहाँ कोई जानवर, वनस्पति और यहाँ तक कि गिद्ध भी नहीं रहते, लेकिन हाँड गला देने वाली ठंड में भी सेना के जवान वहाँ पहरा देते हैं, क्योंकि दूसरी तरफ़ महीनों तक आतंकी घुसपैठ के लिए घात लगाकर बैठे रहते हैं। शोपियाँ कांड की बात पर उस जवान ने बताया कि इसमें किसी राजनेता के क़रीबी के शामिल होने की बात भी उठी थी, जबकि सीआरपीएफ पर आरोप लगाकर इस मामले को गोलमोल रुख़ दिया जा रहा है। सीबीआई जाँच के बाद भी यह तय नहीं हो पाया कि क़सूरवार कौन है । फिर भी सुरक्षा बलों के ख़िलाफ़ अलगाववादियों एवं राजनीतिक दलों को एक हथियार मिल गया है। जे.के. सिंह से जब पूछा गया कि क्या कश्मीर समस्या का समाधान संभव नहीं है, तो उसने कहा कि संभव तो है लेकिन यहाँ के राजनीतिक दल ही नहीं चाहते कि मामला सुलझे। मैंने कहा क्यों । तो एकटक जवाब मिला कि-यदि यह समस्या सुलझ गई तो राजनीतिक दलों एवं छद्म मानवाधिकारवादियों के पास मुद्दा ही ख़त्म हो जायेगा।यह बात सुनकर मन में विचार उठा कि सच ही तो कि इस देश में जयचंदों की कमी थोड़े ही है। लेकिन सवाल उठता है कि आख़िर इस उठापटक में पिस कौन रहा है । मर कौन लोग रहे हैं । तनाव के दंश से कौन लोग गुज़र रहे हैं । और बंदूक के साये में जीने के लिए मजबूर कौन हैं । वह न तो कोई राजनेता हैं और न ही अलगाववादी, बल्कि आम कश्मीरी आवाम को इन समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। विडंबना है कि लोग इस बात को समझ ही नहीं पा रहे हैं कि चाहे नेशनल कांफ्रेस हो, पीडीपी, कांग्रेस, बीजेपी अथवा हुर्रियत कांफ्रेस जैसी अलगाववादी ताकतें, सभी ने अपने राजनीतिक हितों के लिए कश्मीर मुद्दे को ज़िंदा रखा हुआ है और इसमें कश्मीरियों को बरगलाकर उनका उपयोग किया है। मुझे कश्मीर टाइम्स के एक पत्रकार की बात आज भी नहीं भूलती जिसमें उसने कहा था कि-अपने चार साल के पत्रकारिता के कैरियर में मैं हर दिन सोच कर निकलता था कि आज एक पॉजिटिव स्टोरी करुँगा, एक उम्मीद की कहानी लिखूँगा, लेकिन मुझे यह मौक़ा आज तक नहीं मिला। हर दिन इसी तरह के तनाव से जुड़ी ख़बरों से सामना होता है।


  उमाशंकर मिश्र
217/2, गली नं.-4, ए ब्लॉक, पहला पुस्ता
सोनिया विहार, पार्ट – 2, दिल्ली – 110094
मो.- 9968425219
ई-मेल : umashankar19mishra@gmail.com
 
         
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