मणिपुर का दर्द
रांची। मणिपुर का शाब्दिक अर्थ ‘आभूषणों की भूमि’ है। पर इस अर्थ के खोखलेपन का एहसास मणिपुर की ‘द प्रोस्पेक्टिव रेपर्टरी थिएटर’ ने कराया। रांची के एक्सआइएसएस सभागार में झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा के सौजन्य से तीन दिनी दलित-आदिवासी नाट्योत्सव ... पढ़िए
प्रतिमा
तुलसी अब प्रतिमा स्थापित करना चाहता था। पर उसके पास पैसों की कमी थी। सो उसने साहूकार से पंद्रह हज़ार रूपये क़र्ज़ ले लिए। साहूकार ने सोचा दलित है जब तक जियेगा तब तक भरेगा। उसने ये सारी पूँजी कमर में ... पढ़िए
क्रूर क्षेत्र
बड़ोदरा में लगा भाषा विज्ञानियों का मेला
सिंहासन
चुनावी क्षणिकाएं
पतझड़ की आवाज़
साहित्यक लम्पटों का शराबोत्सव
अदम एक किसान ग़ज़लगो
जबान पर चढ़ जाने वाली और झकझोर देने वाली वह सच्चाई, वो ताप, तल्खी-तुर्शी और सपाट बयानी किसी के पास नहीं है। शायरी की दुनिया में 'अदम' ताउम्र एक किसान रहे। अल्पमत देहाती आवश्यकताएं, न्यूनतम भाषा और बेलाग अभिव्यक्ति, कलात्मक अभिव्यक्ति ... पढ़िए
‘जहाँ बाँस फूलते हैं’
सराहनीय बजट
कविता बदलाव की जमीन तैयार करती है:निशांत
मूल्य परक बाल साहित्य की आवश्यकता क्यों?
भारतीयता की पहचान है कैलास यात्राःतरूण विजय
हर मील के पत्थर से मुहब्बत हो गयी
जीवन शैली यानी रचना प्रकिया:शेखर जोशी
आज़ादी
उपन्यास की प्रासंगिकता और सरोकार
अमरेन्द्र सुमन की कविताऐं
प्राण शर्मा की दो ग़ज़लें
रांची। मणिपुर का शाब्दिक अर्थ ‘आभूषणों की भूमि’ है। पर इस अर्थ के खोखलेपन का एहसास मणिपुर की ‘द प्रोस्पेक्टिव रेपर्टरी थिएटर’ ने कराया। रांची के एक्सआइएसएस सभागार में झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा के सौजन्य से तीन दिनी दलित-आदिवासी नाट्योत्सव ... पढ़िए0 टिप्पणी, हलचल, (54 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 7 अप्रेल 2012,
रांची से संजय कृष्ण
प्रतिमा
तुलसी अब प्रतिमा स्थापित करना चाहता था। पर उसके पास पैसों की कमी थी। सो उसने साहूकार से पंद्रह हज़ार रूपये क़र्ज़ ले लिए। साहूकार ने सोचा दलित है जब तक जियेगा तब तक भरेगा। उसने ये सारी पूँजी कमर में ... पढ़िए0 टिप्पणी, कहानी, (37 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 7 अप्रेल 2012,
पुष्पेन्द्र सिंह
क्रूर क्षेत्र
5 टिप्पणियाँ, कविता, (175 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 7 अप्रेल 2012,
राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल
बड़ोदरा में लगा भाषा विज्ञानियों का मेला
बड़ोदरा। भाषा रिसर्च एण्ड पब्लिकेशनज़ सेन्टर के सौजन्य से सात और आठ जनवरी 2012 को सम्पूर्ण देश तथा विश्व भर से आये लगभग एक हजार भाषा विज्ञानियों का मेला लगा । इस मेले का नाम विश्व भाषा सम्मेलन ग्लोबल लेंगुएज़ मीटद्ध ... पढ़िए
0 टिप्पणी, हलचल, (51 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 6 अप्रेल 2012,
बड़ोदरा से नेम चन्द अजनबी की रपट
सिंहासन
0 टिप्पणी, कविता, (48 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 6 अप्रेल 2012,
राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल
चुनावी क्षणिकाएं
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शशांक मिश्र भारती
पतझड़ की आवाज़
उन्हीं दिनों मुझे यह ज्ञात हुआ कि इस लड़की की मां-मौसी आदि ने मुझे पसन्द कर लिया है (स्कूल डे के उत्सव के दिन देखकर) और अब वे मुझे बहू बनाने पर तुली बैठी हैं। ये लोग नूरजहां रोड पर रहते ... पढ़िए
1 टिप्पणी, कहानी, (59 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 5 अप्रेल 2012,
कुर्रतुल-ऐन-हैदर, उर्दू से अनुवाद : शम्भु यादव
साहित्यक लम्पटों का शराबोत्सव
यह इक्कीसवीं सदी की उत्सवधर्मिता का जगमग करता हुआ साहित्य उत्सव है, इसका विरोध करने के बजाए भागीदारी खोजना ही चतुर सयानों को ठीक लगा, इसलिए वे अपने अपने तरीके से भागीदारी निभाने चले आए, जैसे ओपेरा विन्फ्रे आई, अनुपम खेर ... पढ़िए
0 टिप्पणी, प्रसंगवश, (121 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 5 अप्रेल 2012,
भंवर मेघवंशी
अदम एक किसान ग़ज़लगो
जबान पर चढ़ जाने वाली और झकझोर देने वाली वह सच्चाई, वो ताप, तल्खी-तुर्शी और सपाट बयानी किसी के पास नहीं है। शायरी की दुनिया में 'अदम' ताउम्र एक किसान रहे। अल्पमत देहाती आवश्यकताएं, न्यूनतम भाषा और बेलाग अभिव्यक्ति, कलात्मक अभिव्यक्ति ... पढ़िए0 टिप्पणी, संस्मरण, (92 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 5 अप्रेल 2012,
देवेंद्र आर्य
‘जहाँ बाँस फूलते हैं’
भारत की क्षेत्रीय अखंडता तोड़ने का षड्यंत्र रचने वालों की मदद से मिजोरम को आजा़द करने की लड़ाई काफ़ी लम्बी चली। आज भी उत्तर-पूर्वी भारत में भारतीयता और भारतीय परंपराओं के विरुद्ध प्रचार जारी है; जिसका अनेक मोर्चों पर सामना किया ... पढ़िए
0 टिप्पणी, पुस्तकायन, (79 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 4 अप्रेल 2012,
महेंद्र भटनागर
सराहनीय बजट
‘‘हाँ, हाँ, एक बार बोलने से समझती नहीं हो क्या? आजकल तुम बहुत बोलने लगी हो।’’ चिल्लाते हुए कहा। पत्नी पति के चिल्लाहट में छिपे उनके दर्द को जान चुकी थी। चुपचाप जाकर अपने काम में लग गयी। ... पढ़िए
2 टिप्पणियाँ, लघुकथा, (126 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 4 अप्रेल 2012,
संजय जनागल
कविता बदलाव की जमीन तैयार करती है:निशांत
वैचारिक प्रतिबद्धता के सवाल पर उनका मत था कि रचनाकार की प्रतिबद्धता अपने लेखन के प्रति होनी चाहिए। उन्होने स्वयं को मानवता को बचाने के लिए सामाजिक अन्याय व विसगंतियों के खिलाफ़ प्रतिबद्ध बताया। ... पढ़िए
0 टिप्पणी, कथोपकथन, (69 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 4 अप्रेल 2012,
मदन गोपाल लढ़ा
मूल्य परक बाल साहित्य की आवश्यकता क्यों?
दूसरों के दुःख बांटने की प्रवृत्ति घट रही हो। दस-दस फिल्मी गीतों, अभिनेता-नेत्रियों के नाम याद हों परन्तु देशगीत, देश के महापुरुषों, उनके कार्यों को नहीं जानते हों और नही नैतिकता, मानवता और जीवन मूल्यों को। जिनकी वर्तमान में सर्वाधिक आवश्यकता ... पढ़िए
0 टिप्पणी, आलेख, (97 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 4 अप्रेल 2012,
शशांक मिश्र भारती
भारतीयता की पहचान है कैलास यात्राःतरूण विजय
रायपुर। वरिष्ठ पत्रकार और सांसद तरूण विजय का कहना है कि कैलास यात्रा भारतीयता की पहचान है। कैलास मानसरोवर की यात्रा भगवान शिव की कृपा के बिना नहीं हो सकती। यह यात्रा वास्तव में शब्दातीत है, वहां जाकर अर्निवचनीय आनंद की ... पढ़िए
0 टिप्पणी, हलचल, (51 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 3 अप्रेल 2012,
रायपुर से संजय द्विवेदी
हर मील के पत्थर से मुहब्बत हो गयी
0 टिप्पणी, छंद > ग़ज़ल, (36 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 3 अप्रेल 2012,
हिमकर श्याम
जीवन शैली यानी रचना प्रकिया:शेखर जोशी
वर्धा । महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के इलाहाबाद क्षेत्रीय केंद्र में ‘‘मेरी शब्द यात्रा’’ विषय पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान हिंदी के वरिष्ठ कथाकार शेखर जोशी ने अपनी रचना प्रक्रिया को साझा करते हुए कहा कि जीवन शैली से ... पढ़िए
2 टिप्पणियाँ, हलचल, (126 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 3 अप्रेल 2012,
वर्धा से श्रीप्रकाश मिश्र की रपट
आज़ादी
0 टिप्पणी, भाषांतर, (43 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 3 अप्रेल 2012,
सिंधी लेखक: मोहन उदासी अनुवादः देवी नागरानी
उपन्यास की प्रासंगिकता और सरोकार
अगर ऐसा होता तो औपन्यासिक कृतियां बिक्री के लिहाज से सबसे पीछे होतीं। जबकि हालात बिल्कुल विपरीत हैं। इस तर्क में तो दम हो सकता है कि व्यस्तता के चलते कुछ लोग बड़ी रचनाओं के लिए समय नहीं निकाल पाते। परंतु ... पढ़िए
0 टिप्पणी, आखर-अनंत, (45 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 3 अप्रेल 2012,
ओमप्रकाश कश्यप
अमरेन्द्र सुमन की कविताऐं
0 टिप्पणी, कविता, (58 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 3 अप्रेल 2012,
अमरेन्द्र सुमन
प्राण शर्मा की दो ग़ज़लें
0 टिप्पणी, छंद > ग़ज़ल, (70 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 2 अप्रेल 2012,
प्राण शर्मा
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