SrijanGatha

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अन्तरराष्ट्रीय मंच


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सार्वजनिक जीवन के लोग तो दावतों पर खर्च सीमित रखने जितनी समझदारी दिखाएं...

बाद में आर्थिक उदारीकरण की आंधी में उस एक्ट के पन्ने कहां गए, यह भी लोगों को याद नहीं है। लेकिन आज इस पर चर्चा की फिर से जरूरत है क्योंकि देश में आर्थिक असमानता इतनी बढ़ रही है कि बड़े लोगों की देखा-देखी मध्यम वर्ग भी अपनी ताकत से बाहर का खर्च करने लगा है, और दिखावे में देश की उत्पादकता तो खत्म हो ही रही है
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शराबबंदी के वायदों और बातों को करते-करते राज्य सरकार बन गई शराब-कारोबारी!

इससे फर्क महज इतना पड़ेगा कि कमाई का एक बड़ा हिस्सा ठेकेदार की जेब में जाएगा, या कि सत्ता में बैठे हुए नेता-अफसर की जेब में जाएगा। सरकार की जायज और घोषित कमाई तो तकरीबन वैसी ही बनी रहेगी। इस मौके पर हमको इस बात को लेकर हैरानी होती है कि अगले विधानसभा चुनाव के दो बरस पहले छत्तीसगढ़ सरकार कारोबार का यह नया प्रयोग करने जा रही है, और उस वक्त कर रही है जब उससे शराबबंदी की उम्मीद की जाती थी। बिहार के मुख्यमंत्री ने यह बार-बार कहा है कि शराब से होने वाली कमाई से सरकार की जेब जितनी भरती है, उससे अधिक खाली हो जाती है
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साहित्य, संस्कृति और कला का मिलाप

एक सत्र में कांग्रेस की पूर्व सांसद प्रिया दत्त ने अदिति महेश्वरी गोयल और प्रतिष्ठा सिंह से बात करते हुए ईमानदारी से राजनीति सवालों के जवाब दिए । कांग्रेस में नेतृत्व की खोज के सवाल पर उन्होंने माना कि उनकी पार्टी को आत्ममंथन की जरूरत है । प्रिया दत्त भले ही आत्मंथन की बात करें पर इस वक्त कांग्रेस को इंट्रोस्पेक्शन की नहीं बल्कि खुद को रीइनवेंट करने की कोशिश करनी चाहिए
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कविता का सर्वांगीण सौन्दर्य

उनकी आत्मा को यह देखकर खुशी होगी कि वह मुट्ठी भर बीज आज बेहया का जंगल बनकर दिग-दिगंत में छा गया है । साहित्य में नोबेल पुरस्कार पाने के लिए उन्होंने भी भरसक प्रयास किया था, मगर केवल प्रयोग को या क्रान्ति की नक़ल को पुरस्कार नहीं मिलता है,उसकी नाभि-नाल जमीन से जुड़ा भी होना चाहिए । पिछली आधी सदी में जिस नकली कविता को हिंदी की मुख्य काव्यधारा कहकर दो पीढ़ियों को बरगलाया गया, वह अंततः अमरबेल ही सिद्ध हुई है
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नफरत को बढ़ावा देने का नतीजा अमरीका में सामने

वहां की समाज व्यवस्था, ये सब कुछ एक उदार नस्ल-नीति के आधार पर बनी हुई हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह कि भारत एक उदार विविधतावादी संस्कृति पर बना हुआ देश है। ठीक ट्रंप के अमरीका की तरह भारत में लगातार नफरत को और बंटवारे को बढ़ावा देने में कई लोग लगे हुए हैं, जिनमें बड़े-बड़े लोग मोदी सरकार के बड़े-बड़े ओहदों पर कायम हैं। जिस तरह आज अमरीका में यह खतरा दिख रहा है, उस तरह भारत में भी धर्म के आधार पर बंटवारे का एक बड़ा खतरा कायम है
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Garbh Gruh

कूकी की आँखों में आज भी नींद का नामोनिशान नहीं था।अनिकेत को बिस्तर पर लेटते ही नींद आ गई। ऑफिस में चार्ज हेंड ओवर करने का काम, फिर घर के ढेर सारे छोटे-मोटे काम करते-करते अनिकेत बुरी तरह से थक गया था। कूकी की इच्छा हो रही थी कि वह अनिकेत की ललाट पर एक चुम्बन कस दे। मगर उसे डर लग रहा था कि कहीं वह यह न कह दे, "क्या नाटक कर रही हो ? देख नहीं रही हो मैं बुरी तरह थक गया हूँ
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भूखे बच्चों के देश-प्रदेश में सरकार से ईश्वर को चढ़ावा

धर्म के जो सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू हैं, उन पर तो जनता की जरूरत के हिसाब से हमेशा से ही सरकारें खर्च करती आई हैं, और उनको लेकर कोई विवाद भी नहीं होते। नेहरू के वक्त भी कुंभ का इंतजाम सरकार के पैसों से होता था, मुलायम के समय भी होता था, मायावती के समय भी होता था, और आज भी होता है। इसी तरह वैष्णो देवी से लेकर दूसरे तीर्थों तक सरकार बहुत सा इंतजाम अपने खर्च पर करती हैं
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लोकार्पण : मीडिया के अंदर की तस्वीर है पुस्तक, ‘‘मीडियाः महिला,जाति और जुगाड़’’

पटना। वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार (समाचार संपादक, दूरदर्शन) की सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘मीडिया : महिला, जाति और जुगाड़’ का लोकार्पण बिहार संगीत नाट्य अकादमी के निदेशक आलोक धन्वा, वरिष्ठ पत्रकार व जगजीवन राम शोध संस्थान के निदेशक श्रीकांत, प्रभारी हिंदुस्थान समाचार की वरिष्ठ पत्रकार श्रीमती रजनी शंकर, वरिष्ठ पत्रकार व साहित्यकार अवधेश प्रीत कथाकार मदन कश्यप और प्रभात प्रकाशन के पीयूष कुमार ने 8 फ़रवरी को पटना पुस्तक मेला में प्रभात प्रकाशन के स्टॉल पर किया गया
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सोयी हुई जातियाँ पहले जगेंगी

सब जिस जागरण की आशा से पूर्वाकाश अरुण हो रहा है, उसमें सबसे पहले तो वे ही जातियां जागेंगी, जो पहले की सोयी हुई - शूद्र, अंत्यज जातियां हैं। इस समय जो उनके जागने के लक्षण हैं, वही आशाप्रद हैं, और जो ब्राह्मण-क्षत्रियों में देख पड़ते हैं, वे जगाने के लक्षण नहीं, वह पीनक है - स्वप्न के प्रलाप हैं। विरासत में पहले के गुण अब शूद्र और अंत्यज ही अपनावेंगे
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सांस्कृतिक बदलाव का समय

हमारे लिए ब्‍याज हो गए हैं काम निकालने के। उनका शुद्ध उपयोगितावादी मूल्‍य ही अब शेष रह गया है। चूँकि अब हमारा 'मैं' ही केंद्रीय होता हा रहा है, 'हम' की एक कड़ी के रूप में उसकी उपस्थिति कमजोर और हल्‍की पड़ती जा रही है। परिणाम यह कि मैं, समाज, समूह या समुदाय का प्रतिद्वंद्वी या विरोधी बनता जा रहा है। व्‍यक्ति की अपनी पहचान बनाते-बनाते हम यह अक्‍सर भुला बैठते हैं कि व्‍यक्ति अपने आप में समग्र नहीं है, बल्कि समाज (समग्र) है
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साहित्य की उत्तरजीविता अभी से संभावित : डॉ. खगेन्द्र ठाकुर

पटना । “रचनाकर्म और रचनाकार की मंशा एवं दिशा स्पष्ट रहनी चाहिए । नये रचनाकारों की प्रतिबद्ध लेखन एवं सरोकार से आशा बनी हुई है कि साहित्य की उत्तरजीविता संभावनाओं से अभी भी लबरेज़ है ।” - हिंदी के प्रतिष्ठित एवं प्रगतिशील आलोचक डॉ. खगेन्द्र ठाकुर ने 13 वें अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कहा
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ताकतवरों की कैद और सुनवाई दूसरे राज्यों में होना जरूरी हो...

जब ऐसे मुजरिम सत्ता या पैसों की ताकत से लैस होते हैं, तो वे वहां से फोन पर बाहर की दुनिया में अपना कामकाज भी चलाते रहते हैं, और गवाहों और सुबूतों को खत्म भी करते रहते हैं। इसी शहाबुद्दीन का हाल यह है कि जब अभी जेल से वह पैरोल पर बाहर निकला था, तो उसे लेने के लिए बिहार के कई मंत्री-विधायक पहुंचे थे। अब आज अगर शशिकला को कर्नाटक के बजाय तमिलनाडू की जेल में रखा गया होता
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न ज्ञान, न समझ, बच्चे महज इम्तिहानों की अंधी दौड़ में..

बच्चों का अपने आसपास की सफाई का काम करना भी जरूरी है, उनमें रचनात्मकता, कल्पनाशीलता, और लीडरशिप की संभावनाओं को देखना भी जरूरी है। और इन सबके लिए इन बच्चों के दिल-दिमाग से पढ़ाई के बोझ को घटाना भी जरूरी है। हर दिन बच्चों के पास कुछ घंटे उनकी हॉबी के लिए, सामान्य ज्ञान के लिए, उन्हें बेहतर इंसान बनाने के लिए, उन्हें सामाजिक सरोकार सिखाने के लिए, और उन्हें किताबों से परे की समझ देने के लिए भी लगाने चाहिए
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बिसरती विधा का स्मरण

पहली पुस्तक है ‘प्रिय भग्गन’ जो उनके अग्रज और आलोचक नंदकिशोर नवल के उनको लिखे पत्रों का संकलन है। इन पत्रों में सत्तर के दशक से लेकर दो हजार तक के साहित्यक परिदृश्य पर टिप्पणियां भी हैं। ‘भी’ इस वजह से क्योंकि इन पत्रों में दोनों के पारिवारिक समस्याओं का भी जिक्र भी है। इन पत्रों में लेखक-प्रकाशक संबंध, लेखक-लेखक संबंध, दिल्ली की साहित्यक गतिविधियों से लेकर एक वरिष्ठ लेखक की अपनी कृतियों की समीक्षा छपवाने की बेचैनी भी साफ नजर आती है
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मातृ-पितृ दिवस मनाने का यह ताजा पाखंड खत्म किया जाए

सैकड़ों बरस पहले का संस्कृत साहित्य प्रेम की कहानियों से, प्रेम की बातों से ऐसा लबालब है कि उसमें से मादक रस टपकते ही रहता है। एक तरफ तो अपनी जड़ों और अपनी संस्कृति, और अपनी संस्कृत भाषा की रक्षा के लिए भारतीय संस्कृति के ठेकेदार लाठियां लेकर चौबीसों घंटे तैनात रहते हैं, और दूसरी तरफ अपने ही देश के सांस्कृतिक इतिहास में प्रेम की जो लंबी परंपरा रही है, कृष्ण के गोपियों के साथ रास की जो कविताएं, जो तस्वीरें सैकड़ों बरस से चली आ रही हैं
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पटना के संदीप दास को मिला ग्रैमी अवार्ड

पटना । तबला वादक संदीप दास को संगीत की दुनिया का सबसे चर्चित और प्रतिष्ठित अवार्ड ग्रैमी पुरस्कार से नवाजा गया है। म्यूजिक एलबम कटेगरी में वायलिन वादक योयो मा एलबम सिंग मी होम को अवार्ड दिया गया है। यह यो यो मा का 19वां ग्रैमी अवार्ड है
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छत्तीसगढ़ में बैंक खाते से हुई साइबर ठगी, प्रशिक्षण जरूरी

लोगों को बिना नगदी के काम करने की तरफ धकेल रही है, उसे चाहिए कि हर किस्म की साइबर ठगी के खिलाफ लोगों का बीमा करवाए। आज लोग मजबूरी में तरह-तरह के मोबाइल एप इस्तेमाल कर रहे हैं, भुगतान के तरीके इस्तेमाल कर रहे हैं, और उनको न तो इनकी विश्वसनीयता मालूम है, न ही वे अपने खुद के पासवर्ड हिफाजत से रख सकते। हर दिन देश में कहीं न कहीं एटीएम पर दूसरों की मदद से नगदी निकालने वाले लोग ठगी के शिकार होते हैं
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मानवीय विष को निष्क्रिय करना ही कला का मकसद और साध्य है

साथियों इन बीहड़ चुनौतियों का सामना जिन कलासाधकों ने किया और अपने अथक और कलात्मक साधना से इस दिव्य स्वप्न को साकार किया है …वो हैं अश्विनी नांदेडकर ,योगिनी चौक, सायली पावसकर,अमित डियोंडी, वैशाली साल्वे ,तुषार म्हस्के , कोमल खामकर , सिद्धांत साल्वी और विनय म्हात्रे ने 29 मई 2015 को मुंबई के रवीन्द्र नाट्य मंदिर में प्रथम मंचन से दर्शकों को लोकार्पित किया
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रिपोर्ट

यह कहने की जरूरत नहीं कि ऐसे मामलों में मालिकान की इच्छा लगभग भगवान की इच्छा के बराबर होती है। वेतन-जीवी की हैसियत भक्त से अधिक की नहीं होती है। विडंबना यह कि अपने किसी भी फैसले पर भगवान हस्ताक्षर नहीं करते और मालिकान भी नहीं करते। जवाबदेही तो उनकी ही होती है जिनका हस्ताक्षर होता है। बाघ की बलि नहीं होती है, मालिकान की भी नहीं। ऐसे में इसके अलावा उपाय ही क्या रह जाता है
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सोशल मीडिया के खतरों से आगाह रहना और करना जरूरी

जिस तरह लोग शराब या तंबाकू के खतरों से सावधान कराते हैं, ठीक उसी तरह सोशल मीडिया के खतरों से भी सावधान कराने की जरूरत है। सरकार को यह भी सोचना चाहिए कि क्या स्कूल की आखिरी की एक-दो बड़ी कक्षाओं में सोशल मीडिया को लेकर कोई पाठ स्कूली किताबों में जोडऩा चाहिए, क्योंकि इस उम्र के बच्चे अब फोन, संदेश, और सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल करते हैं
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अपने गुलाम पर फ़िदा था अलाउद्दीन खिलजी, बधिया कराकर बना लिया प्रेमी

काफूर को खिलजी के सिपहसालार नुसरत खान ने 1297 में गुजरात विजय के बाद एक हजार दीनार में खरीदा था। इसीलिए काफूर का एक नाम ‘हजारदिनारी’ भी था। खिलजी काफूर की कमनीयता को देखकर मुग्ध हो गया था। कुछ लेखक मानते हैं कि हिन्दू परिवार में जन्मा काफूर जन्म से किन्नर था
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