सीबीआई स्थापना दिवस पर एक और एजेंसी की जरूरत
नेहरू के वक्त लोगों को शायद यह अंदाज भी नहीं रहा होगा कि एक दिन ऐसा आएगा जब सीबीआई का सबसे बड़ा काम भ्रष्ट नेताओं और अफसरों की जांच ही रह जाएगा। और सत्ता के चलते सीबीआई के बेजा इस्तेमाल के ... पढ़िए
निहारता पूर्वोत्तर:निहारने को मजबूर करता
बिहार
2025:कोई लोक भाषा भी हुआ करती थी
पक कर गिरना
क्रिकेट के नायक और खलनायक
जाहिर सी बात है कि जब टीवी तोड़ेंगे तो उनके नायक सहयोग के लिए आएंगे नहीं। इस तरह अपनी किस्मत भी फोड़ी जा रही हैं। वैसे में और भी मुश्किल है, जब नायक, खलनायक बन बैठा हो। आस्ट्रेलिया में जिस तरह ... पढ़िए
हाइकु
फिदा हुसैन पर कविता
बीमार होते देश को बचाने की जरूरत
इस बात को लेकर दुनिया भर में ऐसी कंपनियां पहले तो उस देश के कानूनों को खरीदकर अपनी इस जालसाजी के लिए कानूनी रास्ते बना लेती हैं और फिर उसके बाद ग्राहकों को धोखा देने या अंधेरे में रखने का एक ... पढ़िए
एक वाक्य की कहानियाँ
मैं क्यों लिखता हूं?
साहित्य और मनोविज्ञान
प्रवीण अग्रवाल की दो कविताएं
इधर रोये बिटिया उधर रोये बिटिया
विश्व हिंदी दिवस:2012
जिन रातों की भोर नहीं है
पार्क स्ट्रीट बलात्कार कांड की शिकार एक मध्यम वर्गीय महिला थी, जबकि डनलप बलात्कार कांड की शिकार एक कागज चुननेवाली औरत। दोनों औरतें बलात्कार की शिकार हुईं। एक जीवित है, दूसरी मर गयी। और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री भी एक महिला ... पढ़िए
होना मीना कुमारी का
मीना कुमारी भारतीय नारी की सुंदरतम अभिव्यक्ति है, जो सीता बनकर अपने कैंसरग्रस्त पति राम के लिए ‘रुक जा रात ठहर जा रे चंदा...’ की बेबस आग्रह करती है। छोटी बहू बन दिलों में राज करती है। प्रेमिका बनकर प्रेमी की ... पढ़िए
सामाजिक यथार्थ के दो साधक
डांसिंग डॉल
एक नई सुबह की खोज में
नेहरू के वक्त लोगों को शायद यह अंदाज भी नहीं रहा होगा कि एक दिन ऐसा आएगा जब सीबीआई का सबसे बड़ा काम भ्रष्ट नेताओं और अफसरों की जांच ही रह जाएगा। और सत्ता के चलते सीबीआई के बेजा इस्तेमाल के ... पढ़िए1 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (76 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 2 अप्रेल 2012,
सुनील कुमार
निहारता पूर्वोत्तर:निहारने को मजबूर करता
मानसिक रूप से इनकी दृढ़ता इतनी है कि दुनिया के बाशिंदों को इस दुनिया की भी ' एक संस्कृति है, पहचान है', ये समझना ही पड़ेगा।
इसके लिए कई समाज सेवी संस्थाएं इनकी संस्कृति को बचाने का अनथक प्रयास कई वर्षों से ... पढ़िए
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गुलशन कुमार गुप्ता
बिहार
0 टिप्पणी, कविता > प्रवासी कविता, (42 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 2 अप्रेल 2012,
डॉ. कमल किशोर सिंह
2025:कोई लोक भाषा भी हुआ करती थी
गरज यह कि हिंदी बची रहेगी। पर सवाल यह है कि उसकी हैसियत क्या होगी? क्योंकि यह रिपोर्ट इस बात की तसल्ली तो देती है कि हिंदी भाषियों की आबादी हर पांच सेकेंड में बढ़ रही है। लेकिन साथ ही यह ... पढ़िए
2 टिप्पणियाँ, प्रसंगवश, (117 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 2 अप्रेल 2012,
दयानंद पांडेय
पक कर गिरना
0 टिप्पणी, कविता, (29 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 2 अप्रेल 2012,
कश्मीर सिंह
क्रिकेट के नायक और खलनायक
जाहिर सी बात है कि जब टीवी तोड़ेंगे तो उनके नायक सहयोग के लिए आएंगे नहीं। इस तरह अपनी किस्मत भी फोड़ी जा रही हैं। वैसे में और भी मुश्किल है, जब नायक, खलनायक बन बैठा हो। आस्ट्रेलिया में जिस तरह ... पढ़िए0 टिप्पणी, व्यंग्य, (58 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अप्रेल 2012,
राजकुमार साहू
हाइकु
0 टिप्पणी, छंद > हाइकु, (62 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अप्रेल 2012,
राजेंद्र परदेसी
फिदा हुसैन पर कविता
0 टिप्पणी, कविता, (45 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अप्रेल 2012,
पूनम सिंह
बीमार होते देश को बचाने की जरूरत
इस बात को लेकर दुनिया भर में ऐसी कंपनियां पहले तो उस देश के कानूनों को खरीदकर अपनी इस जालसाजी के लिए कानूनी रास्ते बना लेती हैं और फिर उसके बाद ग्राहकों को धोखा देने या अंधेरे में रखने का एक ... पढ़िए0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (59 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अप्रेल 2012,
सुनील कुमार
एक वाक्य की कहानियाँ
युवती की इज्जत नहीं बचा पाने से दुःखी, रो रहे कुत्ते को रिहायशी इलाके के सुरक्षा-कर्मियों ने इसलिए मार दिया कि कुत्तों के रोने पर अपशगुन होता है। ... पढ़िए
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राजेन्द्र ढकाल
मैं क्यों लिखता हूं?
साहित्य क्या स्वांतः सुखाय है या उसके रचयिता के सामने पाठक अथवा श्रोता के रुप में एक बडा समूह है जिनको ध्यान में रखकर वह रचता है? साहित्य का मुख्य उद्देश्य क्या लोक रंजन ही है अथवा उसके कुछ वृहत्तर सामाजिक ... पढ़िए
1 टिप्पणी, मूल्याँकन, (151 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अप्रेल 2012,
विभूति नारायण राय
साहित्य और मनोविज्ञान
मनोवैज्ञानिक अपने व्यक्तिगत स्तर से ऊपर उठकर निरपेक्ष रूप से समस्या को पहले से स्थापित सिद्धान्तों की पृष्टभूमि मे समझकर समाधान ढ़ूँढने का प्रयत्न करता है। वह कोई नैतिक स्तर नहीं बनाता नाहीं वह निर्णयात्मक होता है। मनोविज्ञान के सिद्धान्त पर्याप्त ... पढ़िए
1 टिप्पणी, आलेख, (44 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अप्रेल 2012,
बीनू भटनागर
प्रवीण अग्रवाल की दो कविताएं
0 टिप्पणी, कविता, (121 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 अप्रेल 2012,
प्रवीण अग्रवाल
इधर रोये बिटिया उधर रोये बिटिया
1 टिप्पणी, कविता, (57 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 31 मार्च 2012,
पी. दयाल श्रीवस्तव
विश्व हिंदी दिवस:2012
कुपरटीनो। भारत के प्रधान कोंसलावास सैन फ्रांसिसको के द्वारा 'विश्व हिंदी दिवस ' 2012 का भव्य समारोह अत्यंत उत्साहवर्धक रहा। हिंदी समारोह की महत्ता को ध्यान में रखते हुए और एक अच्छी बड़ी संख्या में हिंदी भाषा प्रेमियों को इस समारोह ... पढ़िए
0 टिप्पणी, हलचल, (66 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 31 मार्च 2012,
नीलू गुप्ता की रपट
जिन रातों की भोर नहीं है
पार्क स्ट्रीट बलात्कार कांड की शिकार एक मध्यम वर्गीय महिला थी, जबकि डनलप बलात्कार कांड की शिकार एक कागज चुननेवाली औरत। दोनों औरतें बलात्कार की शिकार हुईं। एक जीवित है, दूसरी मर गयी। और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री भी एक महिला ... पढ़िए0 टिप्पणी, आलेख, (63 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 31 मार्च 2012,
विश्वजीत सेन
होना मीना कुमारी का
मीना कुमारी भारतीय नारी की सुंदरतम अभिव्यक्ति है, जो सीता बनकर अपने कैंसरग्रस्त पति राम के लिए ‘रुक जा रात ठहर जा रे चंदा...’ की बेबस आग्रह करती है। छोटी बहू बन दिलों में राज करती है। प्रेमिका बनकर प्रेमी की ... पढ़िए0 टिप्पणी, शेष-विशेष > सिनेमा, (106 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 31 मार्च 2012,
सविता पाण्डेय
सामाजिक यथार्थ के दो साधक
डिकेंस के समान प्रेमचंद ने भी यथार्थवादी दृष्टिकोण को अपनाते हुए अपनी रचनाओं में आम जनमानस की विवशताओं को व्यंग्यात्मक शैली में उकेरने का सफल प्रयास किया है। इस संदर्भ में गोदान के होरी का यह प्रसिद्ध कथन उल्लेखनीय है, यह ... पढ़िए
0 टिप्पणी, पुस्तकायन, (58 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 31 मार्च 2012,
वेदमित्र शुक्ल मयंक
डांसिंग डॉल
0 टिप्पणी, बचपन > बाल गीत, (40 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 30 मार्च 2012,
जया केतकी
एक नई सुबह की खोज में
0 टिप्पणी, कविता, (87 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 30 मार्च 2012,
रीता सिंह "सर्जना"
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