SrijanGatha

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अन्तरराष्ट्रीय मंच


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हेमंत स्मरण और अखिल भारतीय कवि सम्मेलन

मुम्बई । विश्व मैत्री मंच द्वारा युवा कवि हेमन्त की स्मृति में आयोजित हेमंत स्मरण एवं कवि सम्मेलन का आयोजन एवं मुंबई के सभी साहित्यकारों का उसमें अपनी मौजूदगी दर्ज कराना मानो हेमंत की यादों का लौट आना था। सभागार उस समय बेहद भावुक हो उठा जब ललिता अस्थाना, सूरज प्रकाश ,रीता दास राम, सूर्यबाला ,सुधा अरोड़ा ने हेमंत की स्मृतियों को साझा किया
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उत्तरप्रदेश के हाईवे पर फिर मुसाफिरों से गैंगरेप, हत्या

लोगों में यह खुशफहमी भी आ गई कि वे सभ्य हो गए हैं, लेकिन उनके भीतर की मर्दानी-हिंसा कहीं नहीं गई, और जगह-जगह बलात्कार हो रहे हैं। और तो और अभी हमने सीरिया और इराक जैसे देशों में यह देखा है कि ईश्वर और धर्म का नाम लेकर आतंक करने वाले इस्लामी संगठन लगातार महिलाओं को गुलाम बनाकर उनके साथ बरसों तक बलात्कार को धर्म के मुताबिक काम साबित करते हैं
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नए विमर्शों की तलाश

दूसरा नाम अनु सिंह चौधरी का है । अनु ने पहले अपनी पहचान एक कहानीकार के रूप में बनाई । उनका कहानी संग्रह ‘नीला स्कार्फ’ काफी चर्चित रहा और कहानी की दुनिया में उनको गंभीरता से लिया जाने लगा लेकिन जब से उनकी किताब ‘मम्मा की डायरी’ प्रकाशित हई तो उनकी कहानीकार वाली पहचान नेपथ्य में चली गईं और एक स्त्री के कदम कदम पर संघर्ष को सामने लाने वाली लेखिका के तौर पर पहचाना जाने लगा
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कश्मीर के जख्मों पर हिंदू-राष्ट्रवादी नमक

परेश रावल जैसे कमअक्ल वाले बड़बोले-बकवासी चर्चित व्यक्ति जैसी ही समझ वाली फौज का सुबूत भी है। एक तरफ तो फौज अपनी सारी ताकत के बावजूद कश्मीर को काबू में नहीं रख पा रही है, और दूसरी ओर हालत यह है कि कश्मीर के जख्मों पर एक तरफ आक्रामक हिंदुत्ववादी ऐसा नमक छिड़क रहे हैं कि वह बाकी भारत से कभी मन न मिला पाए, दूसरी तरफ जो फौज कश्मीर में तैनात है, वह खुद अपनी ऐसी अलोकतांत्रिक और हिंसक कार्रवाई करने वाले अफसर को सम्मानित कर रही है
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भारतीय मीडिया को फिल्मों और क्रिकेट से फुरसत नहीं

59वें ग्रैमी अवॉर्ड्स से सम्मानित संदीप दास भारतीय मीडिया से शिकायत है। उनका कहना है कि मीडिया को फिल्मों से और क्रिकेट से फ़ुरसत नहीं है। भारतीय मीडिया को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी ताकि लोगों का ध्यान संगीत, कला और संस्कृति पर जाए।
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किसी बुरे इंसान से भी कुछ भली बातें सीखना संभव

दुनिया के जो विकसित और संपन्न देश हैं, उनमें खरबपतियों के बच्चे भी अपने स्कूल-कॉलेज के दिनों में जेब खर्च निकालने के लिए कहीं वेटर की तरह काम कर लेते हैं, कहीं कार धो लेते हैं, तो कहीं किसी और किस्म की मजदूरी कर लेते हैं। विकसित सभ्यताओं में उन बच्चों को हिकारत के साथ देखा जाता है जो अपने संपन्न मां-बाप के पैसों पर पलते हुए बिना कोई काम करते हुए कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर लेते हैं। हिन्दुस्तान में मेहनत को हिकारत से देखा जाता है
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Dinesh mali


अंबेडकर और बौद्ध धर्म

बुद्ध के समय आजीवक संप्रदाय की काफी प्रतिष्ठा थी। आंबेडकर आजीवकों के बारे में मौन रह जाते हैं। कदाचित वे सोचते थे कि अपढ़-अशिक्षित जनसमाज बौद्धिक रूप से इतना परिपक्व नहीं है कि किसी नास्तिक दर्शन को अपना सके। दूसरे आजीवकों के बारे में ऐतिहासिक साक्ष्य बहुत प्रच्छन्न हैं। जो हैं वे केवल सूत्र रूप में प्राप्त होते हैं। उनमें भी भारी दोहराव है। एक मुश्किल यह भी है कि व्यक्ति से उसका विश्वास एकाएक छीन पाना संभव नहीं होता
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अन्ना हजारे, रविशंकर, रामदेव चुनिंदा निशानेबाजी के चैंपियन

आज सोशल मीडिया पर लगातार यह पूछा जा रहा है कि जिस लोकपाल आंदोलन को लेकर वे दिल्ली में अपनी जान भी देने पर उतारू हो गए थे, आज मोदी सरकार के तीन बरस होने पर भी उनके मुंह से लोकपाल शब्द क्यों नहीं निकल रहा है? यूपीए सरकार के रहते तो अन्ना को यह लगता था कि लोकपाल एक ऐसी रामबाण दवा है जिससे कि भारतीय लोकतंत्र की सारी बीमारियां दूर हो जाएंगी, लेकिन अब अन्ना नाम का यह हकीम इस लोकपाल नाम की दवा की पर्ची लिखना ही भूल गया है
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सांस्कृतिक नीति की आवश्यकता

इन अकादमियों को राज्य सरकारों ने अपना प्रचार विभाग बना दिया है चाहे वो दिल्ली की हिंदी अकादमी हो या बिहार की संगीत नाटक अकादमी। बिहार की इस अकादमी को तो राज्य सरकार ने इवेंट मैनेजमेंट कंपनी बना दिया है। सरकार को जब कोई कार्यक्रम आदि करना होता है तो वो अकादमी को एक निश्चित राशि अनुदान के तौर पर दे ती है। इस अनुदान के साथ यह आदेश भी आता है कि अमुक कार्यक्रम, अमुक संस्था या अमुक व्यक्ति को दिया जाए
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बेबात की बात

खूब ऊंचाई पर रस्सियों से बने ‘बर्मा ब्रिज’ पर चलकर जान की बाज़ी लगानी हो, तो पचास के टिकट में काम चल जायेगा। यदि हड्डीतोड़ कमांडो ट्रेनिंग लेने के लिये ‘कमांडो नेट’ से गुज़रना हो तो भी पचास के टिकट से काम चलेगा। यदि इस नश्वर शरीर को जीवित जलाने का खतरा मोल लेना हो, तो टायर क्रौसिंग का टिकट भी पचास का ही मिलेगा। यदि अपने शरीर का भुरकुस बनवाने का जोखिम उठाना हो, तो पचास रुपये में ट्रैम्पलिंग का मज़ा लिया जा सकता है
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अगर योगी के ऐसे महंगे अंदाज हैं तो बाकी से फिर क्या उम्मीद?

एक दिन पहले से अफसरों ने इस मामूली घर में जुगाड़ लगाकर, बांस-बल्ली से टांगकर एसी लगवा दिया, और घर के भीतर सोफा और कालीन सजा दिया। अगले दिन योगी आकर गए, और आधे घंटे बाद सारा सामान हटा दिया गया और एसी भी निकाल दिया गया। अब सवाल यह उठता है कि अगर एक योगी के भी मुख्यमंत्री बनने पर सादगी नहीं आ सकती, तो कब आएगी? बहुत से नेता सत्ता पर आते ही ऐसा बर्ताव करने लगते हैं कि उनके पुरखे मानो बादशाह रहे हों
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वेब- पत्रकारिता और हिन्दी

2003 में बीएसएनएल की मोबाइल फोन सेवा की लखनऊ में शुरुआत करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मोबाइल फोन को पंडोरा बॉक्स ही कहा था। भारत में मोबाइल तकनीक और फोन सेवा की संभावनाओं का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के बड़े टेलीकॉम ऑपरेटरों ने 3जी सेवाओं के लाइसेंस के लिए हाल ही में करीब 16 अरब डॉलर यानि 75600 करोड़ रूपये की बोली लगाई
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प्लेटो और अरस्तु

आवश्यक है कि राज्य अपेक्षित रूप में उदार हो। निरंकुश, अल्पतंत्रात्मक राज्यों में जनसाधारण से उसके चयन का अधिकार छीन लिया जाता है। इस कारण प्लेटो ने निरंकुश राज्य को सबसे बुरा माना है। उसके अनुसार निरंकुश राज्य में नीचे से ऊपर तक सभी स्वार्थ–लिप्त होते हैं। संसाधनों पर कुछ लोगों का अधिकार होता है। बहुसंख्यक वर्ग से अपेक्षा की जाती है कि वह अल्पसंख्यक शासक वर्ग की मनमानियों को सहते हुए शासन में सहयोग करे तथा राज्य के हित को, जो वास्तव में उसपर शासक वर्ग द्वारा थोपा हुआ उसका स्वार्थ होता है—अपना हित समझकर वर्ताब करे
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विरासत

सारी रात बिस्तर पर करवटें बदलते हुए बीतती थी । मैं हफ़्तों , महीनों नहीं सो पाया । घरवालों ने आयुर्वेदिक , होम्योपैथी , ऐलोपैथिक -- सभी क़िस्म की दवाइयाँ खिलाईं । पर कोई फायदा नहीं हुआ । नींद नहीं आनी थी । सो नहीं आई । जब देश से एमरजेंसी हटाई गई तब जा कर मेरी नींद वापस लौटी ... 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद जब सिखों के विरुद्ध दंगे शुरू हो गए और हज़ारों निर्दोष सिखों को जान से मार डाला गया तो एक बार फिर मेरी रातों की नींद उड़ गई
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बाल साहित्य की उपेक्षा क्यों?

असमिया की युवा लेखिका रश्मि नारजेरी को बाल साहित्य के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसी तरह की स्थिति मलयालम और तमिल में भी देखी जा सकती है। फिर सवाल उठता है कि हिंदी के युवा लेखकों में बाल साहित्य के प्रति उपेक्षा का भाव क्यों है। दरअसल हिंदी साहित्य का जो पिछला करीब ढाई दशक का कालखंड है जो कुछ नारों और आंदोलनों के इर्द गिर्द के लेखन का काल है। चाहे वो स्त्री विमर्श हो, दलित लेखन हो या फिर फॉर्मूलाबद्ध वैचारिक लेखन हो। इन आंदोलनों और नारेबाजी के लेखन में बाल साहित्य कहीं सिसकी भर रहा है
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अरस्तु : विद्वानों का विद्वान

उस व्यवस्था को प्लेटो के ‘आदर्श राज्य’ तो नहीं कह सकते, परंतु शिक्षक और विद्यार्थी के बीच अनौपचारिक बातचीत को बढ़ाने, शिक्षा में सहजता लाने की भावनाएं उसके पीछे अवश्य थीं। तदनुसार विद्यार्थी अपने बीच से एक विद्यार्थी को चुनते थे। अगले दस दिनों तक वही विश्वविद्यालय के प्रशासक का काम करता था। इसके बावजूद ‘लीशियम’ में पर्याप्त अनुशासन था। भोजन–व्यवस्था वहां सामूहिक थी। महीने में एक दिन विशेष परिचर्चा के लिए सुरक्षित था
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रंजना जायसवाल की कविताएँ


खुफिया निगरानी के जमाने में नसीहतों की क्लास की जरूरत

शोषण किया और उसके बाद शादी से इंकार कर दिया। ऐसी वायदाखिलाफी और सेक्स-संबंध को लेकर अदालतों का एक नया रूख सामने आ रहा है जिसमें अदालतें यह मान रही हैं कि हर वायदाखिलाफी को बलात्कार करार नहीं दिया जा सकता, और एक वयस्क लड़की को संबंध बनाने के पहले यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ऐसे हर संबंध शादी में बदलें यह जरूरी भी नहीं है। हमने भी पहले कई बार इस बात को लिखा था कि शादी का वायदा करने के बाद आपसी सहमति से बने देह संबंधों को वायदाखिलाफी की नौबत आने पर बलात्कार कहना सही बात नहीं होगी
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मृत्यु नामक चट्टान की धार पर नर्तन करता हराभरा बुढ़ापा

`ब्लु चिप’ में हो उससे भी अधिक उमदा निवेश कौन सा? बालकों को संस्कार मिले ऐसी जीवनशैली। यह एक ऐसा निवेश है,जो ढलती अवस्था में चक्रवृद्धि व्याज के साथ वापस मिलता है। मनुष्य का बुढ़ापा कमोबेश रुग्ण होता है। दवाई के सहारे जीना कौन चाहेगा? इंस्युलिन के इंजेक्शन लेना कौन चाहेगा? दांत,कान,आँख कमजोर हो जाये ऐसा कौन पसंद करेगा? सीटी-स्केन करवाने के लिए कहीं जाना कौन चाहेगा? MRI की जाँच करवाने के लिए कौन जाना चाहेगा? ७५ साल की अवस्था के बाद मानों एक नयी शब्दावली इन्सान के मत्थे मढ दी जाती है
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जेरी ने बदला रास्ता!

केस को सुलझाने की जिम्मेदारी मिलती है मुंबई पुलिस के एक ईमानदार अफसर इंसपेक्टर झेंडे को जो इस केस में अपने मित्र बुजुर्ग पत्रकार पीटर डिसूजा को भी साथ रखता है और उससे केस की डिटेल्स पर चर्चा करता रहता है । जैसे जैसे यह अपराध की कथा आगे बढ़ती है वैसे वैसे इंसपेक्टर झेंडे और पीटर डिसूजा के बीच का संवाद बेहद दिलचस्प होता जाता है । कैसे किडनी निकाली गई होगी, क्या मर्डर करनेवाला पहली बार हत्या कर रहा होगा
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