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मड़प्पा में दबी है एक सभ्यता
पुरातत्वविद् मड़प्पा की सभ्यता को मुर्दों की घाटी के रूप में चिन्हित करते हैं। बकौल वाजपेयी जिस तरह होड़ का अर्थ होता है आदमी और तोपा का अर्थ तोपना या गाड़ना, उसी तरह इस इलाभे के बँग्लाभाषी मड़प्पा को मोड़पा कहते ... पढ़िए
0 टिप्पणी, आलेख, (15 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 17 मई 2012,
अमरेन्द्र सुमन

हिंदी टीचर
जिसके चारों ओर अशोक और मनी प्लांट लगाये गये हैं। दो-दो मेन गेट हैं। पांचवीं से दसवीं तक की क्लास पहले और दूसरे तल पर होती है, जबकि ग्यारहवीं और बारहवीं की क्लास सबसे ऊपरी अर्थात्‌ तीसरे तल पर होती है। ... पढ़िए
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ब्रजकिशोर झा

न प्रगति न जनवाद, निपट अवसरवाद
टाइम्स आफ इंडिया के मालिकों को कि अगर वेतन बोर्ड द्वारा प्रस्तावित तनख्वाह दे दी तो अखबार बंद हो जाएंगे। तब वे लखनऊ में नवभारत टाइम्स के स्थानीय संपादक थे। संपादकीय विभाग के सारे पत्रकारों ने लिखित ज्ञापन देकर उनका विरोध ... पढ़िए
0 टिप्पणी, प्रसंगवश, (10 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 17 मई 2012,
के. विक्रम राव, दिल्ली

मां और मेरी गांठें
नाच खत्म हुआ। सबने ताली बजाई और चले गए। मैं कहां जाता? मैं वहीं बैठा रहा। मदारी ने मुझसे बहुत कुछ पूछा, पर मैं नहीं बता सका। इसी बात से पिताजी नाराज थे। मैं किसी लायक नहीं था। पर मदारी ने ... पढ़िए
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योगिता यादव

भारतीय भाषाओं को समर्थ बनाने की जरूरतः कुठियाला
भोपाल। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.बृजकिशोर कुठियाला का कहना है कि मातृभाषाओं की एकता और अंर्तसंवाद के लिए प्रयास तेज करने की जरूरत है ताकि भारतीय भाषाएं मिलकर अंग्रेजी के साम्राज्यवाद का मुकाबला कर सकें। वे ... पढ़िए
0 टिप्पणी, हलचल, (4 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 16 मई 2012,
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सियाह-क़लम मंटो और सियाह-हाशिये
एक इंसान के तौर पर मंटो की परेशानी शायद यह रही कि विभाजन के बाद उन्होंने अपने आपको महज मुसलमान महसूस किया और पाकिस्तान को ही उन्होंने अपना मुल्क समझा। वहाँ की आबो-हवा में वह असंगत विचारों को भी सहज ही ... पढ़िए
0 टिप्पणी, आलेख, (14 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 16 मई 2012,
बलराम अग्रवाल

राजधानी में गोलीबारी
कहीं कुछ अफसर, कहीं कुछ नेता और बहुत से गुंडे-मवाली जमीनों के काम में अपनी अलग-अलग किस्म की ताकत का खुलकर इस्तेमाल करते हैं और कल शहर के बीच घने इलाके में हुई गोलीबारी ऐसे ही किसी झगड़े की वजह से ... पढ़िए
0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (11 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 16 मई 2012,
सुनील कुमार

जीजिविषा का स्रोत
0 टिप्पणी, कविता, (19 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 16 मई 2012,
अशोक सिंघई

नव्यउदार पूंजीवाद के नए ढिंढोरची अशोक वाजपेयी
दूसरी ओर मार्क्सवादी लोग चुपचाप पढ़ते रहते हैं और प्रतिवाद नहीं करते। पहले मार्क्सवाद के खिलाफ बोलने वाले के खिलाफ मार्क्सवादी जबाव दिया करते थे। लेकिन इन दिनों हिन्दी में सर्वधर्म सदभाव की तरह सर्व विचारधारा मित्रमंडली का दौर चल रहा ... पढ़िए
0 टिप्पणी, नया नज़रिया, (16 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 16 मई 2012,
डॉ. जगदीश्वर चतुर्वेदी

यहाँ से वहाँ
0 टिप्पणी, लघुकथा, (42 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 15 मई 2012,
सुरेँद्र कुमार पटेल

आलोचना का परमसुख
लेकिन इस बार आलोचना का निशाना बाबाओं पर है। अंधभक्तों, अंधविश्वासियों और आस्था के नाम पर लुटने वालों को कौन बचाए ? देश में बाबाओं का वर्चस्व बढ़ रहा है। मठ-मंदिरों की संपत्तियों को देखें तो आंखें खुली रह जाती हैं ... पढ़िए
0 टिप्पणी, व्यंग्य, (25 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 14 मई 2012,
रतन जैसवानी

बचपन बहती गंगा
यदि आपको बच्चों के साथ प्यार का रिश्ता जोड़ना है तो उसकी नींव कहानी से डालें। यदि आपको बच्चों का प्यार पाना है तो कहानी भी एक जरिया है। लेकिन पंडित बनकर भी कहानी नहीं सुनाना। कील की तरह बोध ठोकने ... पढ़िए
0 टिप्पणी, आखर-अनंत, (26 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 14 मई 2012,
ओमप्रकाश कश्यप

मृणाल सेन
फिल्मों में जीवन के यथार्थ को रचने से जुड़े और पढऩे के शौकीन मृणाल सेन ने फिल्मों के बारे में गहराई से अध्ययन किया और सिनेमा पर कई पुस्तकें भी प्रकाशित कीं, जिनमें शामिल हैं- ‘न्यूज ऑन सिनेमा’(1977) तथा ‘सिनेमा, आधुनिकता’ ... पढ़िए
0 टिप्पणी, सिनेमा के शिखर, (33 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 14 मई 2012,
प्रमोद कुमार पांडेय

लोगों के कब्र से निकलने की जरूरत
पूरे छत्तीसगढ़ की सवा दो करोड़ आबादी में इस एक व्यक्ति से अधिक कोई दूसरा ऐसा जुझारू नहीं मिला है जो लोगों की अंधश्रद्धा के खिलाफ खुलकर बोलने की हिम्मत करे और ऐसा एक अभियान अपने खुद के समय को निकालकर ... पढ़िए
1 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (19 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 13 मई 2012,
सुनील कुमार

दीया तले अंधेरा
विज्ञापन के इस युग में चर्चा में आना ही अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है। इतने टीवी चैनल हो चुके हैं कि सिर्फ एक दिन भी अगर आप सभी चैनलों पर थोड़ी-थोड़ी देर के लिए आ जायें तो पूरी दुनिया में ... पढ़िए
0 टिप्पणी, ये भी एक दृष्टिकोण, (20 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 13 मई 2012,
मनोज सिंह

संस्कृति की भाषा:भाषा की संस्कृति
हिन्दी इस देश की भाषा है भले ही उसमें क्षेत्रीय भाषाओं की छौंक लगी हो इसलिए सशक्त हिन्दी सशक्त समाज का निर्माण करेगी। भाषायी राजनीति इसी आधार पर फलती-फूलती है। हिन्दी जब पूरे देश की बात सोचेगी तब उसकी अपनी पहचान ... पढ़िए
0 टिप्पणी, आलेख, (20 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 13 मई 2012,
डॉ. गीता सिंह

वक्त भी तो एक परिन्दा है
1 टिप्पणी, कविता, (44 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 13 मई 2012,
डॉ. सरस्वती माथुर

मंच और नेपथ्य से परे
रंगकर्मियों में अच्छे और नए नाटकों के मंचन की होड़ रहती थी। एक अलग तरह का जुनून था और नाटकों का यह जुनून हर बार हमें अच्छा और बेहतर करने को प्रेरित करता था। स्टेशन के बाहर बना एन.सी घोष इंस्टीट्यूट ... पढ़िए
0 टिप्पणी, बाअदब-बामुलाहिजा, (14 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 13 मई 2012,
फ़ज़ल इमाम मल्लिक

भवानी प्रसाद मिश्र जन्‍मशती समारोह संपन्न
दिल्ली। आकाशवाणी दिल्‍ली केन्‍द्र द्वारा कविवर भवानी प्रसाद मिश्र जन्‍मशती समारोह का आयोजन शुक्रवार सायं 7 बजे गुलमोहर सभागार, इंडिया हेबीटेट सेंटर, लोधी रोड, नई दिल्‍ली में किया गया। इस कार्यक्रम के मुख्‍य अतिथि वरिष्‍ठ कवि एवं आलोचक श्री अशोक वाजपेयी ... पढ़िए
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दिल्ली से अविनाश सिंह चौहान की रपट

आलोचना का वैचारिक पक्ष
आलोचना के वैचारिक पक्ष पर विचार करें तो यह स्पष्ट है कि उन्होंने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ. रामविलास शर्मा का खूब मनन किया और परम्परा तथा आधुनिकता के द्वैत का निर्वाह करते हुये समाज-लोक को ही केन्द्र में रखा। उन्होंने ... पढ़िए
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अशोक सिंघई

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