हिंदी में नया साहित्य क्या रचा जा रहा है?
इसे जानने के लिए अब सिर्फ पत्रिकाओं के ताजा अंकों पर निर्भर रहने से आपको पूरी जानकारी नहीं मिलेगी। एक ऐसी पीढी इंटरनेट की दुनिया में सक्रिय है, जिसका पठन-पाठन-प्रकाशन पत्र-पत्रिकाओं के दायरे से बाहर आ गया है। वह वेब के माध्यम से तेजी से पंख पसार कर दुनिया के हर कोने में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है।
इंटरनेट पर ब्लॉग से बढ कर बीते कुछ वर्षो में साहित्य की वेब पत्रिकाएं सामने आई हैं और सफल हैं। छपने वाली पत्रिकाएं दसियों वर्षो में जहां सैकडे और कुछ हजार के आंकडे से आगे नहीं बढ सकी हैं, वहीं वेब पत्रिकाओं पर हर दिन हजारों पाठकों के हिट या पेज व्यू होते हैं। इंटरनेट पर हिंदी नेस्ट, अभिव्यक्ति-अनुभूति, रचनाकार, प्रतिलिपि और सृजनगाथा ऐसी पत्रिकाएं हैं जो न केवल नियमित अपडेट हो रही हैं, बल्कि प्रतिमाह इनके पाठकों की संख्या बीस से लेकर पचास हजार तक हैं।
इन पत्रिकाओं के अलावा कुछ साहित्यिक ब्लॉग भी पत्रिकाओं की तरह अनुशासित ढंग से चल रहे हैं। इनमें अनुराग वत्स का सबद, मनोज पटेल का पढते-पढते और प्रभात रंजन का जानकी पुल शामिल है।
बेंगलूर में रह रहे देवरिया के मूल निवासी के युवा कहानीकार चंदन पांडे कहते हैं, वेब क्रांति ने लेखकों को पत्रिकाओं की तानाशाही से मुक्त किया है। उनकी महत्वाकांक्षी कहानी रिवॉल्वर पिछले साल सितंबर में सबद में प्रकाशित हुई थी। एक साल में इस पर 28 हजार हिट हो चुके हैं! क्या हिंदी की किसी पत्रिका में कहानी को इतनी बडी संख्या में लोग देख पाते?
वेब पत्रिकाओं में प्रयोग भी हो रहे हैं। 2008 से प्रकाशित प्रतिलिपि हिंदी-अंग्रेजी, दो भाषाओं में मौजूद है। इस पत्रिका में हिंदी में अनुदित साहित्य के साथ मूल भाषा की स्क्रिप्ट भी होती है। यहां लगभग 25 देसी-विदेशी भाषाओं का साहित्य आप देख सकते हैं। आप चाहें, तो पत्रिका के प्रिंट रूप को ऑर्डर देकर भी मंगा सकते हैं। फोर्ब्स इंडिया ने प्रतिलिपि को प्रमुख साहित्यिक वेब पत्रिकाओं में जगह दी है।
उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में रहने वाले मनोज पटेल लगातार समकालीन अंग्रेजी और उर्दू में लिखी जा रही विदेशी कविताओं से हिंदी के पाठकों को रूबरू करा रहे हैं। सबद ब्लॉग को पत्रिका की तरह संचालित कर रहे अनुराग वत्स लेखकों से रचनाएं मंगाते और प्रकाशित कराते हैं। यही स्थिति जानकी पुल की है।
सबसे पुरानी हिंदी वेब पत्रिकाओं में एक सृजनगाथा के संपादक, जयप्रकाश मानस कहते हैं, विदेश में बसे भारतीयों की बडी संख्या है, जो हिंदी का समकालीन साहित्य पढना चाहती है। उनमें लेखक भी हैं, जो हमारे साथ जुडना चाहते हैं। मानस हिंदी के रचनाकार को बदलते हुए देखते हैं। कहते हैं, सीनियर राइटर उदय प्रकाश से लेकर नए उभरे कवि-कहानीकार विमलेश त्रिपाठी तक आज आपको नेट पर मिल जाएंगे। साहित्य के प्रकाशन जगत का फलक बडा हो चुका है।
प्रतिपक्ष
एक शिक्षित तबका है, जो नेट पर सक्रिय है। उसकी अपनी दुनिया है, लेकिन एक बडा वर्ग अब भी इंटरनेट से वंचित है। खास तौर पर जो छोटे शहरों और गांवों में है। वेब साहित्य तकनीक के भरोसे है। तकनीक बदल जाएगी और वेब से बेहतर कुछ आ जाएगा, तो इस पर रचा-बसा साहित्य कहां जाएगा? संजीव (वरिष्ठ कहानीकार)


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