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हरिशंकर परसाई होने का अर्थ

प्रकाशन :सोमवार, 23 अगस्त 2010
कमला प्रसाद

रिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त 1924 को हुआ और मृत्यु 10 अगस्त 1995 को। उन्होंने सन् 44-45 से लिखना शुरू किया, जो जीवनपर्यंत जारी रहा। लेखक की तरह परसाई पाठकों के प्रतिनिधि रहे हैं। उनकी यात्रा नीचे से शुरू हुई। लड़ने के लिए लिखना है, तो लिखेंगे। पाठक पसंद करता है तो छपेंगे। प्रतिष्ठित प्रकाशक व्यंग्य लेखक और कालमिस्ट को क्या मानेंगे, अछूत के अलावा। इसलिए किताब ‘हँसते हैं रोते हैं’ स्वयं छापी। झोले में डालकर निकल पड़े बेचने। फेरी वालों की तरह। कोई मित्र टकराया, तो सस्नेह भेंट किया- दो रुपए में हरिशंकर परसाई। रिक्शे वाले, फेरी वाले, हॉकरस ब दोस्त। मज़दूरों-कर्मचारियों से ख़ूब जमती। बस स्टैंड में एक पान की दुकान बैठकी का अड्डा बन गई। ट्रेन में सफ़र तीसरे दर्जे में। यह सब इसलिए कि खुले विश्वविद्यालय में ज़िंदगी के विद्यार्थी पढ़े जा सकें। इंद्रियाँ हमेशा सजग रहीं तो आदमी- आदमी की तस्वीरें अंदर तक उतर जातीं। बेढंगी यात्रा ज़िंदगी का स्वभाव बन गई। फक्कड़ परसाई को कबीर सगे लगते। उनकी सूक्तियाँ गुनगुनाते रहते। उन्हीं की पक्तियाँ स्तंभ बनीं- ऐसा लगता है कबीर की भटकती आत्मा उन्हीं के लेखन में मुक्त हुई है। परसाई ने अपने जीवन संघर्ष को स्थिति रक्षा तक सीमित रखा, उसे सामाजिक संघर्ष का हिस्सा बनाया। जबलपुर के वामपंथी मा तरह संघर्षहौल में उन्हें मार्क्सवादी होने में देर नहीं लगी। इस की समझ वर्ग संघर्ष की ओर बढ़ी। साहित्य की दुनिया में से सैकड़ों से अपनी शर्तों में दोस्ती हुई। मुक्तिबोध परममित्र बनें। यह दोस्ती आजीवन चली। घर-परिवार के आत्मीय रिश्तों तक विस्तार हुआ। जबलपुर के मित्रों ने मिलकर सन् 1956 में वसुधा पत्रिका निकाली। परसाई संपादक और रामेश्वर गुरु प्रबंध संपादक। लेखकों का वसुधा मंडल बना- मुक्तिबोध, प्रमोद वर्मा, श्रीकांत वर्मा, श्री बाल पांडेय आदि। मुक्तिबोध की एक साहित्यिक की डायरी इसी में छपी। पत्रिका दो वर्ष चली।

प्रेमचंद के बाद हिंदी के दूसरे लोकप्रिय लेखकों में हरिशंकर परसाई हैं। दोनों की लेखकीय प्रतिष्ठा पाठकों की ओर से आई है। साहित्य-कीर्ति-धारकों की निगाह में इनकी कद्र बहुत दिन बाद हुई। प्रेमचंद को प्रपोगैंडिस्ट और परसाई को कालमिस्ट विशेषणों से नवाजा जाता रहा। व्यंग्य लेखक परसाई को अख़बारों- नईदुनिया, देशबंधु, नवीन दुनिया, अमर उजाला, जनयुग, हिंदी करेंट तथा पत्रिकाएँ - सारिका, हिंदुस्तान, धर्मयुग, कल्पना आदि ने ख़ूब छापा।

सारिका के संपादक कमलेश्वर मानते थे कि परसाई के कॉलम छपने से प्रसार संख्या बढ़ती है। बिक्री की गरज से धीरे-धीरे प्रकाशकों ने इनकी पुस्तिकाएँ छापनी शुरू कीं, जो रचनावली तक जारी रहीं। मुत्यु के बाद भी प्रकाशकों की राय में इनकी किताबों और रचनावली की बिक्री लगातार बढ़ी है। दरअसल साहित्य बाज़ार में किसी जन लेखक की ऐसी सेंधमारी कम देखी गई है। पाठकों के दबाव का फल ऐसा कम लेखकों को मिला है। हरिशंकर परसाई के लेखन की विधा और क्षेत्र के बारे में प्राय: सवाल उठते रहे हैं। अधिकांश समीक्षकों ने उन्हीं की रचनाओं के आधार पर व्यंग्य की विधा के रूप में उनकी चर्चा शुरू की। बावजूद इसके कि परसाई ने हमेशा कहा कि उन्होंने कहानी और निबंध लिखे हैं। व्यंग्य रचनाओं की स्प्रिट है। यह विधा नहीं हो सकती। उनके तीन लघु उपन्यास हैं- रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज और ज्वाला और जल। बोलती रेखाएँ- तिरछी रेखाएँ रेखाचित्र हैं, शेष निबंध और कहानियाँ हैं। प्रमुख संग्रह हैं- पूत के पाँव पीछे, जैसे उनके दिन फिरे, सदाचार की ताबीज, पगडंडियों का ज़माना, वैष्णव की फिसलन, शिकायत मुझे भी है, अपनी-अपनी बीमारी, ठिठुरता हुआ गणतंत्र, निठल्ले की डायरी, एक लड़की पाँच दीवाने, और अंत में सुनो भाई साधो, विकलांग श्रद्धा का दौर आदि। 

परसाई ने विधा के परिचित दायरे तोड़े हैं। गद्य विधाओं का एक दूसरे में आंतरिक विलयन हुआ है। रूढ़ आलोचकों की यही परेशानी रही हैं। उनके लेखने का क्षेत्र असीमित है। जीवन जगत के अनेक बिंबों को छोटी सी परिधि में लाना संभव हुआ है। यही उनका औपन्यासिक औदात्य है। समय की राजनीति में जो विकृति है, दलबंदी और जो पाप-जाल है, उसका बेबाकी से खुलासा उनकी रचनाओं में हुआ है। इसमें कौन सी पार्टी कितनी जनतांत्रिक और प्रगतिशील है तथा कौन सी चैंपियन प्रतिक्रियावादी, यह स्पष्ट दिखेगा। समाजवादी, लोहिया समाजवादी, कांग्रेस, जनसंघ-भाजपा, कम्युनिस्ट पार्टी तथा छोटे-छोटे दलों के वर्ग चरित्र का उन्होंने जैसा जितना सटीक अंकन किया है- अन्यत्र दुर्लभ है। उन्होंने अमेरिकी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ खुलकर लिखा है। विवेक शक्ति इतनी तीक्ष्ण और नुकीली थी कि वे तत्काल आर-पार देख लेते थे। सूत्रबद्ध कैसे करते थे इसे देखना दिलचस्प है। सूक्ष्म निरीक्षण, वस्तुपरक विवेचन और तदनुरूप भाषिक गठन उन्हें अद्वितीयता प्रदान करता है। नमूने के तौर पर पर देखें- लोहियावादी समाजवादियों के बारे में‘हर रोज़ सबेरे अख़बार में पढ़ लेते हैं कि कल लोहिया ने क्या कहा। उसके मुताबिक दिन भर काम करते हैं। इस तरह रोज एक कदम आगे बढ़ते हैं। ऐसा न करें, तो उलझन में पड़ जाएँ।’ राजनीति के अलावा हमारी सामाजिक व्यवस्था तथा भारतीय सरकार से लेकर पुलिस के अधिकारी, कर्मचारी, उनकी पत्नियाँ और बच्चे, पुलिस लाइन के मंदिर, घूंस पद्धति जैसी बिंग मालाएँ, परसाई की कहानियों को पैना बनाती हैं। वास्तविकता की सतह के नीचे के जो आभासी रूप हैं, उनके वहां अंकित किया गया है। कोई चरित्र अपनी प्रकृति में जैसा लगता है और जो उसका छद्म रूप है, उसकी अभिव्यक्ति देखी जा सकती है, खतरे उठाने के साहस के साथ। परसाई के रचना कौशल को पुराने मानकों से नहीं समझा जा सकता। समकालीनों से तो यह बिल्कुल अलग उद्भावना है। जीवन की व्यापक छवि तथा उसके नए रूपाकार, इस बहाने समय की मीमांस का दूसरा उदाहरण नहीं है। व्यंग्य लेखन की लोकप्रियता के चक्कर में सैकड़ों ने यह रास्ता चुना और फेल हो गए। वह दृष्टि और समझ अनुकरण से तो नहीं ही आ सकती थी। व्यक्तियों के प्रति प्रतिक्रिया से व्यंग्य नहीं बनता। इसकी उपज करुणा की कोख से होती है। व्यक्ति माध्यम हो सकता है, पर प्रतिनिधि बनाया जा सके तब। मुझे लगता है कि परसाई के लेखन को खोलना (डिकोड) अभी शेष है। हरिशंकर परसाई होने का विशेष अर्थ अभी पूरी तरह समझना शेष है।


  कमला प्रसाद
संपादक, वसुधा
एम-31, निराला नगर, दुष्यंत मार्ग
भदभदा रोड़, भोपाल 461003.
vasudha.hindi@gmail.com
 
         
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