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टना । माॅल में कबूतर भारतीय भाषाओं में संभवतः अकेली पुस्तक होगी जिसकी सभी कविताएं बाजार केंद्रित हैं। संग्रह की 38 कविताओं में से 15 में माॅल की चर्चा है। माॅल आखिर है क्या और बाजार आखिर है क्या? बाजार पहले बाजार में था अब बाजार में नहीं है। वह टीवी एड के जरिए बेडरूम में आया, परिवार में घुस गया। मेरे-आपके भीतर घुस गया।

ये बातें वरिष्ठ आलोचक रविभूषण ने डाॅ. विनय कुमार के नए काव्य संग्रह ‘माॅल में कबूतर’ के लोकार्पण समारोह के अपने अध्यक्षीय भाषण में कहीं। पटना के नृत्यकला मंदिर में आयोजित इस संग्रह को लेखक एवं रविभूषण के साथ एकांत श्रीवास्तव, अनिल यादव, गौरीनाथ और विपिन कुमार षर्मा ने संयुक्त रूप से लोकार्पित किया। कार्यक्रम की शुरुआत अनीश अंकुर और संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन जयप्रकाश ने किया।

रविभूषण ने बड़े विस्तार में बाजारवाद, भारत एवं तीसरी दुनिया की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्थितियों पर प्रकाश डाला। विनय कुमार की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि विनय की कविताओं में आपको प्रतिरोधी स्वर नहीं मिलेंगे, लेकिन वे सोचने को मजबूर करनेवाले कवि हैं। उनकी अंतिम कविता आशावाद की नहीं है। वे विस्तार में चीजों को रख देते हैं। प्रोटेस्ट नहीं करते, लेकिन वे प्रोटेस्ट से बड़ा काम करते हैं। मानस को सक्रिय करना यह भी बड़ी बात है।

मेरी दृष्टि में यह हिन्दी का महत्वपूर्ण संग्रह है जिसकी सारी कविताएं बाजार को टारगेट कर लिखी गई हैं। विनय शिल्प सजग नहीं, समय सजग कवि हैं। वे मनोचिकित्सक भी हैं। इन दोनों की गंभीर समझ भी उनमें है।

उन्होंने कहा स्थिति और दृश्य को रख देना उनकी विशेषता है। उनमें एक तड़प है इसका बचा रहना बड़ी बात है। हिन्दी में कविता लेखन बेशुमार चल रहा है, लेकिन सृजन कम। विनय कुमार की कविताएं इसी सृजन की नजीर हैं। दृष्टिसंपन्नता, विचार संपन्नता और एक तरह का चैकन्नापन बहुत से लोग बीस तीस साल से सृजन में रहकर भी नहीं देख पाते हैं। लेकिन विनय ने इसे संभव किया है। इनके यहा अभिधा नहीं है व्यंजना है कबूतर। कवि ‘माॅल में कबूतर’ के माध्यम से प्रेरणा देता है कि चले जाइए माॅल में, लेकिन माॅल में कबूतर मत बनिए।

युवा लेखक विपिन कुमार शर्मा ने लिखित पर्चे का पाठ किया। कहा कि हर जीवित समाज के लिए कवि एक जरूरी नागरिक होता है। उन्होंने कहा कि उदारीकरण, पूंजीवाद ये खास किस्म की शब्दावलियां हैं। बौद्धिक वर्ग का काम है कि वह आसन्न संकटों से लोगों को जगाता रहे। उन्होंने कहा कि आधुनिक सभ्यता लोकतंत्र का भ्रम बनाए रखती है।

उन्होंने लेखक की गद्य पुस्तक और नए संग्रह को मिलाते हुए बहुत ही सधे हुए आलेख को पाठ किया। डाॅ. विनय की ‘सूई’ और ‘माॅल में कबूतर’ शीर्षक कविता का खासतौर से जिक्र किया। कहा कि लेखक की शान उसकी अभिव्यक्ति है उसकी भाषा नहीं।

एकांत श्रीवास्तव ने कहा कि डाॅ. विनय जी के नाम से परिचित था। इनके काम से विधिवत परिचय इन किताबों के माध्यम से हुआ। उन्होंने माना कि विषयगत अतिक्रमण ये कविताएं करती हैं। बाजार पर इतनी सारी कविताएं मेरी जानकारी में इसके पहले किसी हिन्दी कविता संकलन में नहीं आई हैं। ये कविताएं गंभीर प्रष्नों से टकराती हैं।

उन्होंने कहा कि व्यापक धरातल इनके पहले संग्र्रह ‘आम्रपाली’ में है। उसमें देशाटन के भी अनुभव हैं। यात्राएं किस तरह से समृद्ध करती हैं इसकी भी मिसाल हैं ये कविताएं। उसमें बुद्ध पर कविताएं हैं। नजर बोचू एकदम नया शब्द है।

उन्होंने कहा कि इन कविताओं को पढ़ते हुए इस कवि के प्रति मेरा मान बढ़ा। एक सधे हुए कवि की यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव हैं ये कविताएं। उन्होंने डाॅ. विनय की पुस्तक ‘एक मनोचिकित्सक के नोट्स की भी चर्चा की। कहा विनय बहुत गंभीर अध्येता हैं। उनका चिंतन बहुत अलग तरह का है। मनुष्य का मन बाजार में किन गुत्थियों में होता है, विनय इसकी केंद्रीय चिंता हुलासगंज में तलाशते हैं।

उन्होंने कहा कि आज राजनीति के प्रतिनिधि बाजार की गिरफ्त में हैं। ऐसे में लेखकों को ही इसका मुकाबला करना होगा। आकर्षण का मनोविज्ञान तो पूरा का पूरा बाजार का मनोविज्ञान है। कविता में कथा आती है तो उसकी संभावनाएं विराट हो जाती है। रैम्प पर कविता है। भुट्ठा सरदार इसमें साधारण मनुष्य की जय और बाजार की पराजय दिखती है। इतना सूक्ष्म विष्लेषण इसी तरह का कवि कर सकता है। भविष्य में विनय जी को एक उपन्यास भी लिखना चाहिए।

गौरीनाथ ने कहा कि पटना की धरती से उन्हें ज्यादा संबल मिला है। उन्होंने जब 07 में अंतिका प्रकाशन की शुरुआत की थी तो पटना पुस्तक मेले में अपनी किताबें लेकर आए थे। उस समय हमें यहां के सभी लेखकों का सहयोग प्राप्त हुआ।

उन्होंने कहा कि डाॅ. विनय कुमार से हमारा 20 वर्षों से संवाद है निरंतर। उनकी हमने तीन पुस्तकें अंतिका से छापीं। हमें हर स्थिति में हर्ष और विषाद दोनों ही घड़ियों में रविभूषण जी का सहयोग मिलता रहा है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि डाॅ. विनय के नए काव्य संग्रह ‘माल में कबूतर’ की गूंज दूर तक जाएगी। यह हिन्दी की पहली किताब है जो बाजारवाद के खास ठिकानें को लक्ष्य कर लिखी गई है।

डाॅ.विनय कुमार ने अपने कविता की सृजन प्रक्रिया के अनुभव साझा किए। कहा कि उनके अंदर कोई कविता पंक्ति इनसाइड के रूप में उभरती है और वही बाद में कविता के रूप में विकसित होती है।

उन्होंने अपनी कविता ‘माॅल में कबूतर’ की चर्चा करते हुए कहा कि पहले इसकी तीन पंक्तियां मेरे जेहन में आईं तो उसे फेस बुक पर डाल दिया। मेरे घर में जिम है। पत्नी को लगता है कि मैं उपर अभ्यास करने जाता हूं, लेकिन उपर से हर दिन मैं एक कविता के साथ लौटता था।

मेरी पूरी कविता इसी माहौल में तैयार हुई। डभ काॅटेज में कबूतरों की बहुतायत है। वहां के कबूतरों में बेदाग की गजब की सफेदी होती है, उसे ही देखते हुए मेरे मन में ख्याल आया कि अगर माॅल में कबूतर घूस जाए तो क्या हो? इस कविता में विलायत का परिवेश है, शहर का जिक्र, माॅल में खाने का एक दाना नहीं, वहीं ट्रक में फंस जाता है। बाकी प्रतीक आप सब पर है।

डा. विनय ने अपनी 6 कविताएं पढ़ीं उनमें ‘लोकलाज’, ‘बड़ी बी बोलीं’, ‘सब ग्लोबल है’,‘सदी का सबसे अनोखा प्यार’, ‘इच्छा और विवेक’ एवं ‘ऐसे दिन’ आदि कविताएं मुख्य थीं।

अनिल यादव ने सवाल उठाया कि बाजार का प्रतिपक्ष क्यों नहीं बन पा रहा है, जबकि बाजार पर बहुत दिनों से बहुत कुछ लिखा जा रहा है? इसके पीछे मंशा थी कि हम बाजार का प्रतिपक्ष खड़ा करेंगे। लेकिन बाजार आपको उपभोक्तावादी बनाता गया। आपकी पुरातन षैली, सामूहिकता और संघर्ष, प्रतिरोध को कुंद करता गया। वैविध्यपूर्ण समाज के खाने-पहनावे, गाने संगीत-सब खत्म होतेे गए। हम कहते थे कि अनेकता में एकता का हमारा समाज है। अनेकता में एकता क्या हो पाई? पटना में पंजाबी की तरह की हिन्दी प्रचलित हो गई। हमारा बौद्धिक वर्ग जो दस साल तक धोती पहनता था सब एक तरह की कमीजें, जूते पहनने लगा। सब की बाॅडी लैंग्वेज एक तरह की हो गई। यह चमत्कार हो कैसे रहा है? अक्सर हम भूल जाते हैं कि हम उस समाज के आदमी हैं जहां पैसा देकर वोट बेचा जाता है, हमारी जाति हमारा धर्म है। छोटा सा लालच हमको भटका देता है फिर यहां तो बाजार है। उन्होंने कहा कि पहली बार एक कविता संग्रह में बाजार की संस्कृति को पकड़ने की कोशिश की गई है।

उन्होंने कहा कि 20 सालों में जितना भारत बदला है उतना वह सौ वर्षों में नहीं बदला। मोबाइल, इंटरनेट, टेबलेट और कंडीशनर ने इसे संभव किया है। हमारी पहले की पीढ़ी ने एक ट्रांजीशन पीरिएड देखा था। कहते थे कि हमने विक्टोरिया का सिक्का देखा है। हमारी पीढ़ी ने इस बदलाव को देखा तो उसके उपर क्या असर पड़ा? क्या वे अनुभव हमारे साहित्य में आ रहे हैं?

उन्होंने कहा कि माॅल 70 में अमेरिका में आया। यह हमारे लिए नया अनुभव है। वहां उत्पादन ज्यादा था। चिंता थी कि इसको खपाया कहां जाए। इसी में सूइ्र से हवाई जहाज एक जगह रह सके और आकर्षक फील गुड के साथ आकर्षक छूट पर उसे बेचा जाए।

उन्होंने कहा कि हमारे यहां उस समय माॅल आ रहे थे जब मध्यवर्ग बड़ा हो रहा था। इसी समय छठा वेतन आयोग आ रहा था। घूस का पैसा आ रहा था। अनाप-शनाप पैसा। पहले यह वर्ग रिटायरमेंट के बाद घर बनाता था। उसके पास सस्ती-सी गाड़ी होती थी। फटफटिया स्कूटर बहुत थी। 25 साल में यह मध्यवर्ग इन्वेस्टमेंट करने लगा। जीन्स पहनने लगा। उसके पास तीन-चार गाड़ियां हो गईं। यह वह समय है जब हमारा मध्यवर्ग बिलासी, आत्मकेंद्रित और बदमाश हो रहा था नैतिकता का उपदेष देते हुए। 30 साल तक बेरोजगार रहना बुरा नहीं था। स्वतंत्र शाॅपर ग्रुप पैदा होने लगा। लड़के-लड़कियां शाॅपर थे। इस पैसे को पूंजीपतियों को अपनी तरफ खिंचना था।

अनिल ने प्रश्नाकुल होते हुए कहा कि हम करें क्या? जिन चीजों का विरोध 70 साल से करते रहे वो सभी चीजें प्रौमीनेेंट हो गईं। आज हर गली में अंग्रेजी के स्कूल हैं। हम गरीबों के पक्षधर बनने चले थे। अजीब-सी फांक और विरोधाभास हमारे चरित्र में घुस गया है। प्रेम पर जाने कितनी फिल्में बनीं, नाटक खेले गए फिर भी 21वीं सदी में प्रेम करना इतना मुश्किल क्यों हो गया? आज भी आप प्रेम में आगे आएंगे तो बाल काटने वाले, मुर्गा बनाने वाले आएंगे और आपको गला दबाकर मार देंगे। योगेश्वर कृष्ण ने अविवाहित राधा से प्रेम किया। और वे हमारे अराध्य हैं। और अपने आसपास के लोगों में प्र्रेम के प्रति इतनी हिकारत। दरअसल हमारे भारतीय चरित्र की प्रमुख विशेषता इसका पाखंड है। हम सार्वजनिक मंच पर शाश्वत सत्य कहते हैं और हमारा निजी जीवन कुुंठाओं, स्वार्थों और इसी तरह के विरोधाभासों से बने हैं। हमें अपने इस विरोधाभास को स्वीकार करना चाहिए।

समारोह में आलोकधन्वा, रामधारी सिंह दिवाकर, प्रेमकुमार मणि, तरुण कुमार, हृषिकेश सुलभ, संतोष दीक्षित, अवधेश प्रीत, प्रभात सरसिज, विनोद अनुपम, जगनारायण सिंह यादव, संतोष यादव, प्रत्यूषचंद्र मिश्रा आदि महत्वपूर्ण लोगों ने भी हिस्सा लिया।