रंगकर्मी राजेश कुमार के नाटक ’हिन्द स्वराज’ की प्रस्तुति 30 जनवरी, 2012 को वाल्मीकि रंगशाला, उप्र संगीत नाटक अकादमी, लखनऊ में
लखनऊ । गाँधी के जीवन वृत, परस्पर संबंध व किसी घटना पर केन्द्रित अनेकों फ़िल्में, उपन्यास, नाटक रचे गये हैं पर कहानी को सुनाने व दिखाने की अपेक्षा विचारों को दिखाने का प्रयास पहली बार नाटककार-निर्देशक राजेश कुमार अपनी आगामी प्रस्तुति ‘हिन्द स्वराज’ द्वारा करने जा रहे हैं। उनका मानना है कि आज सबसे बड़ा संकट “विचार” का है। वर्तमान राजनीतिक, सांस्कृतिक व साहित्यिक परिदृश्य से सर्वाधिक लुप्त विचार ही हो रहा है। या यों कहें कि महत्वहीन व हाशिये पर जा रहा है।
लंदन से दक्षिण अफ्रीका लौटते हुए गाँधी जी ने नवम्बर, 1909 में संवाद शैली में गुजराती में जो ‘हिन्द स्वराज’ लिखा, निर्देशक राजेश कुमार ने इसे मौजूँ और नाटकीय ज़रूरत समझकर मंचन हेतु इसका चयन किया। नाटक के बँधे-बँधाये खाँचे में बँधे रंगकर्मियों को यह चयन नागवार लग सकता है या जो परम शुद्धतावादी हैं, उन्हें नाटक में उठाये गये सवालों से आपत्ति हो सकती है पर गाँधी जी ने इस पुस्तक में स्वराज्य, पार्लियामेन्ट, सभ्यता, हिन्दुस्तान के हालात, शस्त्रबल, डाक्टर, वक़ील, सत्याग्रह, शिक्षा, ब्रह्मचर्य और मशीन जैसे अहम विषयों पर जो विचार रखे हैं, वे किसी भी प्रतिबद्ध और सामाजिक सरोकार रखने वाले संस्कृतिकर्मी के लिए चुनौती हैं।
“विचार” को मंचन देने वाले निर्देशक राजेश कुमार, इसकी प्रथम प्रस्तुति 30 जनवरी, 2012 को वाल्मीकि रंगशाला, उप्र संगीत नाटक अकादमी, लखनऊ में करने जा रहे हैं। पाठक और संपादक के माध्यम से गाँधी जी ने जिन विचारों को अभिव्यक्ति दी उसे रंगमंच पर प्रतिबद्ध रंगकर्मी नीतिन शर्मा और आलोक यादव उद्घाटित करेंगे। जिस ‘हिन्द स्वराज’ को पढ़कर गोखले ने कहा था, ‘एक साल हिन्दुस्तान में रहकर गाँधी जी ख़ुद ही इस किताब को फाड़कर फेंक देंगे।’ जिन विचारों, आकांक्षाओं और सपनों को गाँधी जी जीवन के अंत तक याद करते रहे और दूसरों को याद दिलाते रहे, उस पर नेहरू ने लिखा, ‘मेरा ख़्याल है कि हमारे सामने सवाल सत्य बनाम असत्य या अहिंसा बनाम हिंसा का नहीं है।’ उन्हें मंच पर उतारना आज इसलिए ज़रूरी हैं कि गाँधी जी ने जिस ब्रिटिश पार्लियामेन्ट को बाँझ और वेश्या बताया था, आधुनिक सभ्यता को शैतानी सभ्यता और डाक्टर, वक़ील और अंग्रेज़ी शिक्षा को ग़ुलामी की नींव बताया था। आज के हालात को उससे इतर नहीं हैं, बल्कि बद से बदतर हैं।
भूमंडलीकरण ने जिस तरह हमें अपनी हर ज़रूरत और सपने के लिए पश्चिम-यूरोप और अमेरिका की तरफ़ देखने के लिए मजबूर किया है, योजनाबद्ध ढंग से कुसंस्कारित किया है, विकास के नाम पर ज़र-ज़मीन-खनिज को लूटने में लगे हैं, ये आज ज़ोरों पर है और इन सवालों से रंगकर्मी मुँह नहीं मोड़ सकता।
‘धार’ के रंगकर्मी इस विचार के मंचन को गाँव, शहर-नुक्कड़ों पर ले जाने के प्रयास में हैं, क्योंकि इसे संसद से लेकर सड़क तक ले जाने में ही ‘हिन्द स्वराज’ की सार्थकता है।


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