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 टना। जून महान नाटककार शेक्सपीयर की चौथी पुण्यशताब्दी वर्ष के अवसर पर हिंसा के विरुद्ध संस्कृतिकर्मी (रंगकर्मियों-कलाकारों का साझा मंच) एवं बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के संयुक्त आयोजन हमारे समय में शेक्सपीयर विषय पर परिचर्चा का आयोजन आज सम्पन्न हुआ।

कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए के.के नारायण ने बताया कि आज चाहे समाज में फिल्मों का जितना भी प्रभाव पड़ा हो लेकिन शेक्सपीयर के नाटक आज हमारे समाज का अभिन्न अंग है।विश्वप्रसिद्ध नाटक ‘हैमलेट’,’ओथेलो’, ‘मैकबेथ’ और ‘जूलियस सीजर’ का जिक्र करते हुए नारायण ने कहा कि ये नाटक समाज और व्यक्ति के आपसी रिश्तों के साथ साथ सत्ता के निरंकुश चरित्र को बताता है।चरित्रों का संचयन उनकी विशेषता थी। आमतौर पर जब कोई विरोध करता तो उसे वामपंथी मान लिया जाता है और जब समझौतावादी होता है तो दक्षिणपंथी कह दिया जाता है।

उन्होंने कहा कि शेक्सपियर ऐसे नाटककार थे जिन्हें आलोचकों ने भी माना कि वो वाकई में महान थे। अदृश्य को जानने की शक्ति कलाकार को महान बनाता है।वो अपने नाटकों के चरित्र खुद जीते थे।प्रकृति के प्रांगण में उन्होंने सीखा,उनके पास कोई स्कूल की डिग्री नही थी।व्यंग्यात्मक लहजे में उन्होंने कहा कि जब एक लोग बोले और सभी सुने वो शोकसभा है और जब सब बोले और कोई न सुने वह लोकसभा है।

हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि अरुण कमल ने कहा कि विलियम शेक्सपीयर इंग्लिश कवि, नाटककार और अभिनेता थे जो इंग्लिश भाषा के महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध लेखको में से एक थे। थियेटर नाम यूनानी मूल का शब्द है जिसका अर्थ है देखना। शेक्सपीयर के समय ही इसे थियेटर नाम दिया गया।

अरुण कमल ने कहा कि शेक्सपीयर मेरे प्रिय कवि हैं मैं उनके घर दो बार गया हूँ।उन्होंने कहा महान अभिनेता चार्ली चैपलीन ने कहा था कि ग्रामीण परिवेश से आने वाला यह साहित्यकार शेक्सपीयर हमें शक में डालता है। इनके नाटक में सुख है तो दुख भी है, रुदन है तो हंसी भी है, मतलब जीवन के सभी रूप शेक्सपीयर के नाटक में हैं।

शेक्सपीयर के ‘मैकबेथ’ नाटक का जिक्र करते हुए अरुण कमल ने कहा कि इस नाटक को करने वाले कई लोगों ने आत्महत्या की है।आलम यह है कि थियेटर के लोग आज भी इस नाटक को उसी नाम से नहीं करते हैं,और इसे अपशकुन मानते हैं। शेक्सपीयर ने लगभग 20000 अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल किया जबकि उस समय अंग्रेजी में लगभग 1,20,000 शब्द थे। उन्होंने 17000 शब्दों को खुद बनाया। उनका नाटक पारसी थियेटर में खूब लोकप्रिय हुआ। अंत में कहा कि जो शेक्सपीयर को पढ़ता है वो उस समय शेक्सपीयर ही हो जाता है।

टी पी एस कॉलेज के अंग्रेजी के प्रो. छोटेलाल खत्री ने कहा कि आज पूरी दुनिया शेक्सपीयर का मंच है। आज शेक्सपीयर इंग्लैंड के साथ-साथ पूरी दुनिया के हैं। जिसमें साहित्यकार, नाटककार से लेकर शोधार्थी तक लगातार काम कर रहे हैं। प्रो. खत्री ने कहा कि शेक्सपीयर को प्रकृति पर मजबूत पकड़ थी, इस कारण वो मनुष्य के जीवन के सभी रूपों को वास्तविकता के साथ अपने नाटक में दिखाते हैं। साथ ही, उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के समय सत्ता द्वारा शेक्सपियर को प्रश्रय देने की बात की लेकिन उनकी रचनाएँ विशुद्ध अभिव्यक्ति है, यही उन्हें महान बनाता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कवि आलोक धन्वा ने कहा कि शेक्सपीयर ने अपने नाटकों से दुनिया के समाज को बदला और एक ऐसा समाज बनाने का प्रयास किया जो शोषण विहीन हो। साम्रज्यवाद तन के स्तर पर उपभोक्ता बनाता है और मन का दमन करता है। शेक्सपीयर मन के रचनाकार हैं।

“हमारे समय में शेक्सपीयर” कार्यक्रम का संचालन अनीश अंकुर ने किया। देश में हो रहे किसानों की आत्महत्या गोलीकांड और बिहार की शिक्षा व्यवस्था के निमित निंदा प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया गया, जिसका पाठ और धन्यवाद ज्ञापन मृत्युंजय शर्मा ने किया।

कार्यक्रम को मनोचिकित्सक विनय कुमार ने भी सम्बोधित किया।

शेक्सपीयर की 4थी पुण्यशताब्दी वर्ष के अवसर पर हिंसा के विरुद्ध संस्कृतिकर्मी (रंगकर्मियों -कलाकारों का साझा मंच) और बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी में बिहार गीत के रचयिता कवि सत्यनारायण, वरिष्ठ कवि अनिल विभाकर, माध्यमिक शिक्षक संघ के विजय कुमार सिंह, संस्कृतिकर्मी सुमंत शरण, कवि राजेश कमल, शायर पंकजेश, फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम, सुमन कुमार, सुरेश कुमार हज्जु, रंगकर्मी रमेश कुमार सिंह, रणधीर कुमार, अरुण शादवल, जय प्रकाश, शम्भू कुमार, अक्षय जी, अभिषेक नंदन, रंजीत, अंचित, उत्कर्ष , विनय कुमार,रंजीत, गौतम गुलाल, गजेंद्र शर्मा, कुमार अनुपम, साकेत कुमार, सुमन सौरभ, ज्ञान पंडित, रौशन कुमार, विक्की राजवीर, सीटू तिवारी, सुनील बिहारी, बी.एन विश्वकर्मा, हर्षवर्द्धन शर्मा, सुनील कुमार, इसकफ़ के रवींद्र नाथ राय , सामाजिक कार्यकर्ता अक्षय जी, सुजीत वर्मा, आभा चौधरी , चर्चित छात्र नेता सुशील कुमार, सहित बड़ी संख्या में रंगकर्मी, शिक्षक और बुद्धिजीवी उपस्थित थे।