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नदियों के बचने से ही संस्कृति बचेगी-अमृतलाल वेगड़

प्रकाशन :शनिवार, 10 सितम्बर 2011
अजय कुमार शर्मा

नई दिल्ली। ‘‘नदियाँ हमारी संस्कृति की जनक है, मनुष्य और नदी की जुगलबंदी से ही सभ्यता का विकास हुआ है, लेकिन नगर सभ्यता का आकर्षण हमारी सभ्यता और संस्कृति को नष्ट कर रहा है।’’ उक्त विचार प्रख्यात लेखक और चित्रकार तथा नर्मदा के पर्याय बन चुके अमृतलाल वेगड़ ने कल साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित ‘साहित्य मंच’ कार्यक्रम में ‘मेरी नर्मदा परिक्रमा’ पर अपना व्याख्यान देते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि गंगा ने हमारी संस्कृति का निर्माण किया है, वह श्रेश्ठ है लेकिन नर्मदा गंगा से ज्येष्ठ है और देश की अकेली ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है।

1928 में जबलपुर (म.प्र.) में जन्मे और 1950 के दषक में शान्ति निकेतन, कोलकाता से कला की पढ़ाई कर चुके अमृतलाल वेगड़ ने नर्मदा के किनारे 4000 कि.मी. से ज्यादा की पदयात्रा की है और इस यात्रा पर हिंदी में उनकी तीन महत्त्वपूर्ण पुस्तकें,  ‘सौंदर्य की नदी नर्मदा’, ‘अमृतस्य नर्मदा’, ‘तीरे-तीरे नर्मदा’ के अलावा सैकड़ों चित्र, स्केच और कोलाज बनाए हैं। इन किताबों के गुजराती, मराठी, अंग्रेज़ी अनुवाद भी उपलब्ध हैं। मूल गुजराती में लिखे नर्मदा यात्रा वृत्तांत पर उन्हें 2004 का साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिल चुका है।

कथावाचक जैसी रोचक  शैली में नर्मदा परिक्रमा और शान्ति निकेतन के अपने अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने कई रोचक और मार्मिक संस्मरण सुनाए। नर्मदा के प्रति अपने प्रेम का श्रेय अपने कला गुरु नंदलाल बोस को देते हुए उन्होंने बताया कि मेरे गुरु ने मुझे आशीर्वाद देते हुए कहा था, ‘‘जीवन में सफल मत होना, यह बेहद आसान है, तुम अपने जीवन को सार्थक बनाना।’’ यह बात मैंने अपने सीने पर लिख ली। नर्मदा को समझने-समझाने की मैंने ईमानदार कोशिश की है और मेरी कामना है कि सर्वस्व दूसरों पर लुटाती ऐसी ही कोई नदी हमारे सीनों में बह सके तो नश्ट होती हमारी सभ्यता/संस्कृति शायद बच सके। नगरों में सभ्यता तो है लेकिन संस्कृति गाँव और गरीबों में ही थोड़ी बहुत बची रह गई है।

ज्ञात हो कि श्री वेगड़ ने 50 वर्ष की अवस्था में (1977) पहली बार नर्मदा परिक्रमा पर निकले थे और 82 वर्ष की आयु में भी इसकों जारी रखे हुए हैं। उन्होंने कहा भी कि 33 वर्षों से मैं नर्मदा की ‘छड़ी मुबारक’ लेकर घूम रहा हूँ और जब तक जीवित हूँ ऐसे ही घूमता रहूँगा। कर्यक्रम के प्रारंभ में उन्होंने अपने आदर्श महात्मा गाँधी, गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर और शान्ति निकेतन के कई रोचक संस्मरण सुनाए। कार्यक्रम के अंत में उपस्थित श्रोताओं ने उनसे उनकी यात्रा और बनाए चित्रों पर कई सवाल किए। नर्मदा पर बाँध बन जाने के बाद की यात्रा पर जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि अब नर्मदा का सौंदर्य आधा रह गया है, लेकिन मैं बाँध विरोधी नहीं हूँ। आबादी के विस्फोट को सँभालने के लिए यह ज़रूरी हैं।

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि नदियों को बचा पाना अब संभव नहीं लगता क्योंकि बढ़ती आबादी और शहरों के बढ़ते प्रकोप को रोकने के लिए सरकार ने कोई गंभीर प्रयास नहीं किए हैं। कर्यक्रम में उनकी पत्नी कांता जी भी साथ थीं। उन्होंने भी उनके साथ की गई यात्राओं के संस्मरण सुनाए। शान्तिनिकेतन में उनके साथी रहे प्रख्यात शिल्पकार मीठाराम धर्माणी तथा नर्मदा परिक्रमा में उनके साथ पद यात्रा करने वाले डा. मिश्र ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

कार्यक्रम में ओम थानवी, अनुपम मिश्र, कृष्णदत्त पालीवाल, प्रभाकर श्रोत्रिय, सुनीता जैन, वीरेन्द्र कुमार बरनवाल, रणजीत साहा, रीतारानी पालीवाल के अतिरिक्त कई अन्य गणमान्य श्रोता उपस्थित थे। इस कार्यक्रम का संचालन और धन्यवाद ज्ञापन अकादेमी के उपसचिव श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने किया।


  अजय कुमार शर्मा

 
         
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