श्रेणियाँ

वासंती एक शाम

प्रकाशन :बुधवार, 8 फरवरी 2012
श्री सूरजपुरी
पोर-पोर, शाम-शाम, उतर गई आज शाम
वासंती एक शाम,वासंती एक शाम।

चढी धूप उतर गई, सीढी पर ताल के
दियने कुछ थिरक उठे, लहरों की चाल पे,
मंदिर के कलशों से उतर गई आज शाम।

बिन्दी एक लुढक गई, पश्चिम के भाल से
तारे कुछ उभर रहे, संध्या के गाल पे,
केश गुंथे जूडे पर, जुही जुडी आज शाम।

धूल उठी गैलों से, शाखों से उलझ गई,
दिन भर की अकुलाहट,पातों की सुलझ गई
अमुवा के बौरों से, लिपट गई आज शाम।

आंगन के तुलसी के बिरवे के नीचे,
जुडॆ हाथ,झुका माथ, दो अंखियां मीचे,
सधवा के वंदन में,सिमट गई आज शाम।

  श्री सूरजपुरी
सेवानिवृत सीएमओ
ताप्तीकुण्ड वार्ड,
मुलताई,
जिला बैतुल(म.प्र)
 
         
Bookmark and Share
टिप्पणी लिखें
 
वाक्यांश खोजें




Bing


Site Search Site Search
लेखागार (Archive)
लेखक की प्रविष्टियाँ

RoboForm: Learn more...