लिक्खा है ख़त आज अमावस ने पूरनमासी के नाम !
पूरनमासी, तुम्हें सलाम !
रात उजासी, तुम्हें सलाम !!
लाखों सदियाँ गुज़रीं; ये आँखें मिलने को तरस गईं !
कितने तूफ़ां आए ! कितनी घोर घटाएँ बरस गईं !!
लिए मिलन की प्यास - आस ,
करती यह प्यासी तुम्हें सलाम !
पूरनमासी, तुम्हें सलाम !!
बहन तुम्हारी मैं; फ़िर भी क्यों भेद किया उस दाता ने ?
भला तुम्हारा, बुरा धराया मेरा नाम विमाता ने !!
पीड़ अभागी मेरे मन की ,
लिखे उदासी; तुम्हें सलाम !
पूरनमासी, तुम्हें सलाम !!
सौ सौ बार जुआ खेला, हर दाँव में लेकिन हार मिली !
प्यार के बदले नफ़रत, श्रद्धा के बदले तक़रार मिली !!
लील रहा अस्तित्व …शोर; हा !
मौन का यह दु:खमय परिणाम ?
पूरनमासी, तुम्हें सलाम !!
आदम की संतान करे शैतानी; और मुझ पर इल्ज़ाम ?
ले'कर मेरी आड़, ज़माना पाप करे और मैं बदनाम ?
मैल पराये पापों का;
हो देह क्यों मेरी स्याह तमाम ?
लिक्खा है ख़त आज अमावस ने पूरनमासी के नाम !!
बहन ! उजाले में, सच है सब लगे सुहाना और सुंदर !
पर… जब मेरा साथ मिले; सब झाँक सकें घट के अंदर !!
बुरी कहाँ मैं इतनी,
जितने लगते हैं मुझ पर इल्ज़ाम ?
लिक्खा है ख़त आज अमावस ने पूरनमासी के नाम !!
कभी ज़माना बदलेगा; इंसाफ़ मिलेगा तब शायद !
चिर-पीड़ित अपमानित मन को प्यार मिलेगा तब शायद !!
सच और झूठ में फ़र्क़ समझने वाले लेंगे जन्म कभी !
तेरा मेरा, काला गोरा; मिट जाएँगे भेद सभी !!
इंतज़ार है… कब तुमसे मैं ,
कब मिलती है भोर से शाम ?!
लिक्खा है ख़त आज अमावस ने पूरनमासी के नाम !!
पूरनमासी, तुम्हें सलाम !
रात उजासी, तुम्हें सलाम !!
लाखों सदियाँ गुज़रीं; ये आँखें मिलने को तरस गईं !
कितने तूफ़ां आए ! कितनी घोर घटाएँ बरस गईं !!
लिए मिलन की प्यास - आस ,
करती यह प्यासी तुम्हें सलाम !
पूरनमासी, तुम्हें सलाम !!
बहन तुम्हारी मैं; फ़िर भी क्यों भेद किया उस दाता ने ?

भला तुम्हारा, बुरा धराया मेरा नाम विमाता ने !!
पीड़ अभागी मेरे मन की ,
लिखे उदासी; तुम्हें सलाम !
पूरनमासी, तुम्हें सलाम !!
सौ सौ बार जुआ खेला, हर दाँव में लेकिन हार मिली !
प्यार के बदले नफ़रत, श्रद्धा के बदले तक़रार मिली !!
लील रहा अस्तित्व …शोर; हा !
मौन का यह दु:खमय परिणाम ?
पूरनमासी, तुम्हें सलाम !!
आदम की संतान करे शैतानी; और मुझ पर इल्ज़ाम ?
ले'कर मेरी आड़, ज़माना पाप करे और मैं बदनाम ?
मैल पराये पापों का;
हो देह क्यों मेरी स्याह तमाम ?
लिक्खा है ख़त आज अमावस ने पूरनमासी के नाम !!
बहन ! उजाले में, सच है सब लगे सुहाना और सुंदर !
पर… जब मेरा साथ मिले; सब झाँक सकें घट के अंदर !!
बुरी कहाँ मैं इतनी,
जितने लगते हैं मुझ पर इल्ज़ाम ?
लिक्खा है ख़त आज अमावस ने पूरनमासी के नाम !!
कभी ज़माना बदलेगा; इंसाफ़ मिलेगा तब शायद !
चिर-पीड़ित अपमानित मन को प्यार मिलेगा तब शायद !!
सच और झूठ में फ़र्क़ समझने वाले लेंगे जन्म कभी !
तेरा मेरा, काला गोरा; मिट जाएँगे भेद सभी !!
इंतज़ार है… कब तुमसे मैं ,
कब मिलती है भोर से शाम ?!
लिक्खा है ख़त आज अमावस ने पूरनमासी के नाम !!

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