एक
बाहर कहाँ मिलेगा, जो अन्दर नहीं मिला!गोरख है परेशान, मछ्न्दर नहीं मिला।
ताउम्र भटकती हुई, जीवन की नदी ने,
रो-रो के बताया कि समन्दर नहीं मिला।
रुस्तम बहुत मिले हमें हिटलर बहुत मिले,
जो दिल को जीत ले, वो सिकन्दर नहीं मिला।
मिलने की आरज़ू लिये, वो नाचती रही,
धरती से एक बार भी अम्बर नहीं मिला।
बातें तो मुझे आपसे, करनी थीं बहुत-सी,
अफ़सोस! मगर आपका नम्बर नहीं मिला।
साँसों ने प्रेम-पत्र, घटाओं पे लिख दिये,
इससे मुफ़ीद कोई पयम्बर नहीं मिला।
दुनिया ने कई बार, तलाशा उसे मगर,
‘जौहर’ मिला कभी तो जितेन्दर नहीं मिला।
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