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33 करोड़ देवी-देवता, 26 करोड़ भूखे-नंगे

प्रकाशन :बुधवार, 1 दिसम्बर 2010
दिनेश कुमार शिक्षार्थी

म्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश भारत और यहाँ का लोकजीवन उसी तन्त्र से प्रताड़ित होता जा रहा है। वर्तमान समय तक भी 26 करोड़ लोग रात को भूखे सोते हैं फिर भी मेरा देश महान् ! उद्घोष करना कितना आसान है जबकि लोकतन्त्र में रहकर लोक के लिए ही काम करना कितना मुश्किल है क्योंकि वे भ्रष्टाचार को नहीं छोड़ना चाहते। इसी कारण आज़ादी के 62 साल बीत जाने के बाद तक भी अछूतों, दलितों, पीड़ितों, आदिवासियों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों, या साढ़े 6 हज़ार जातियों में बँटे लोगों और सभी वर्गों की महिलाओं की स्थिति आज भी वैसी ही है। फिर आज़ाद भारत की 15 लोकसभाओं ने क्या किया? केवल वही जो हमारे संविधान निर्माता संविधान में दर्ज कर गए, किन्तु वो तो इनकी मजबूरी थी और उसे सही ढंग से अगर लागु किया होता तो आज भारत की तस्वीर ही कुछ ओर होती। फिर कहते हैं मेरा देश महान्!

यह कैसा महान् देश है जहाँ आज भी जाति, धर्म और लिंग भेद के आधार पर मानव से अमानवीय और भेद भाव पूर्ण व्यवहार किया जाता है यद्यपि समानता का अधिकार मौलिक अधिकार है। फिर ये भेद-भाव हो भी क्यों न क्यों कि सारा संविधान तो बहुत दूर की बात मौलिक अधिकार भी अभी तक लागु नहीं हुए हैं। शिक्षा का अधिकार 2010 में लागु होना इसका स्पष्ट उदाहरण है। इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि अछूत अपना नेता चुनने में असफल रहे हैं और सत्ता की चाबी स्वर्णों के हाथों में सौंप कर अपने पाँव में स्वयं कुल्हाड़ी मार रहे हैं।

आज का नेता भ्रष्टाचार में संलिप्त है, रक्षक ही भक्षक बन बैठा है। सब नेता एक जैसे बन गए है क्योंकि जो पकड़ा जाए वो चोर और जो सारी उम्र चोरी करता रहे और पकड़ा न जाए तो वह मुँह में राम बगल में छुरी का नाटक चलाए रखता है। यह आज का नेता है। फिर यह नेता कहते हैं मेरा देश महान्! राष्ट्रवाद का नारा देने वाले यही नेता देश को ख़ाली करने में लगे हैं। पैसा इकठ्ठा कर बाहर के देशों में रखना और रहना इनकी नीति बन चुकी है और आम जनता को मूर्ख बनाकर यह देश पर राज़ करना चाह रहे हैं। वोटों की राज़नीति के लिए यह ओछे कर्मों पर ऊतर आते हैं। भारत को बर्बाद करने वाले कोई विदेशी नहीं वल्कि देश के अनगिनत नेता, धार्मिक नेता या कुल 5000 महाराज व्यापारी वर्ग, आदि हैं। आज भी देश के अन्दर पाँच हज़ार महाराज, पाँच लाख साधु, धार्मिक नेता, ग्रन्थी, पादरी, मौलवी, 33 करोड़ देवी-देवते फिर भी 26करोड़ लोग रात को भूखे सोते हैं। यह सब तो अपना चमत्कारी हाथ उठाते ही ग़रीबों के घर में खाने के भण्डार भर दें जैसा कि कृष्ण ने सुदामा के घर में भर दिया था फिर आज कृष्ण को असहाय लोगों पर तरस क्यों नहीं आता, क्योंकि भगवान एक कल्पना है और वह कभी कमज़ोर की सहायता में नहीं आता हमारी सुनी कहानियाँ काल्पनिक हैं। यह भगवान दुनियाँ का पालनहार नहीं मारनहार है या यह उनके ऊपर कृपा करता है जो धर्म के नेता या ठेकेदार हैं। भगवान शब्द ही मिथ्या है क्योंकि भाषा के विकसित होने पर ही भ ग वा न या गॉड शब्द बना है इससे पहले आदिमानव हा हे हू ही हो आदि भाषा में बात करता था तब भगवान कहाँ था या वह किस नाम से जाना जाता था? इतने सारे साधुओं, धार्मिक नेता, ग्रन्थी, पादरी, मौलवी, 33 करोड़ देवी-देवते होने के बाद भी भारत आर्यों, डचों, हुणों, पुर्तगालियों, मुस्लमानों, अँगरेज़ों आदि के द्वारा गुलाम क्यों हुआ, यह सब तब कहाँ सोए थे। साढे़ 6000 जातियों में बाँटने को भारत के चन्द लोग इसे जगतगुरू कहते हैं । संत कबीर जी ने साफ़ तौर पर कहा था कि ब्राह्मण गुरु जगत का भगतन का गुर नाहीं । उरझ पुरझ कर मरि रहयो चारों वेदों माहीं।। अर्थात् यह मात्र एक डिडोंरा है कि मैं सारे जगत का गुरु हूँ किन्तु वेदों के आधार पर किसी को नींचा बना कर ऊँचे हो कर बैठना कोई गुरु पद नहीं। फिर वही लोग कहते हैं मेरा देश महान्! यह कहाँ तक उचित है।

आज यदि किसी डेरे, मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरूद्वारे आदि में भी बिजली जल रही है तो वह केवल और केवल बिजली के अविष्कारी बैंजामिन फैंक्लिन के अथक प्रयासों से जिसे शुरू में पागल क़रार कर था कि वह पानी से बिजली बनाने की बात करता है और फिर आज यदि डेरों, मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों, गुरूद्वारों आदि से यह बिजली बन्द कर दी जाए तो अन्दर बैठा भगवान इनमें उजाला कर पाएगा नहीं या फिर सदियों से पड़े अँधेरे को दूर हटाने के लिए बैंजामिन फैंक्लिन की जगह उस भगवान ने क्यों नहीं सोचा कि मेरे भक्तों को उजाला मिले और बिजली से मिलने वाली आधुनिक सुख-सुविधाएं प्राप्त हों? और यदि उस भगवान को बिजली की आवश्यकता नहीं थी तो वहाँ बिजली जगाते ही बंद क्यों नहीं हो जाती। फिर धर्म की राज़नीति करने के बाद यह कहा जाता है कि मेरा देश महान्!

आज डेरावाद फैल रहा है और चर्म सीमा पर है कभी इन्ही डेरों में शूद्रों का खाना-पीना बैठना-उठना, अलग-अलग होता था तब इनका भगवान या महाराज सबको एक नज़र से क्यों नहीं देखता था? इसका अर्थ साफ़ है कि इनका भगवान और महाराज भी भेदभाव करता था। यह कैसी आस्था यह तो महज़ एक अंध विश्वास और भेड़चाल है। अब इन सबके पीछे क़ानून का संवैधानिक डण्डा फिर रहा है तो इन सबको यह समानता की राजनीति करना पड़ रही है।

फिर तब यह भगवान कहाँ था जब भारत के 85 प्रतिशत लोगों को नंगा रहना पड़ा और उन्हें 33 करोड़ देवी-देवताओं में से एक भी इन शूद्रों को मानवीय अधिकार दिलाने के खड़ा नहीं हुआ तब यह जीवित थे या मरे हुए थे जो आज वीवित हो उठे जो आज सभी वर्ग के लोग इनके मंदिरों में जा रहे हैं नहीं यह न तब थे न आज हैं क्योंकि यह भगवान तब भी उस पुजारी को कोई सज़ा नहीं देता था जो वहीं बैठे बेईमानी करता था और आज भी करता है फिर यह भगवान आम लोगों को दुख क्यों देता है क्या यह भेद-भाव सहनीय है? असल में यह एक धर्म की सत्ता चलाने के लिए आम लोगों के ऊपर मानसिक गुलामी थोपी गई है। तब यह भगवान कहाँ था जब शूद्रों को 1. उनके सिर पर छत नहीं थी न ही उसे बनाने का अधिकार था, और सुबह-शाम की धूप पर इनका कोई अधिकार नहीं था, 2. उत्तर दिशा से बहने वाला और तालाबों का पानी वे प्रयोग में नहीं ला सकते थे, 3. धरती पर वे थूक नहीं सकते थे, रास्ते पर चलने तक की मनाही थी, 4. अच्छा रहन-सहन इन लोगों से कोसों दूर था, 5. पूजा-पाठ, पठन-पाठन और आत्मसम्मान के साथ जीना इनसे छीन लिया गया था, 6. राज़-पाठ, शास्त्र-शस्त्र और सम्पति रखना इनके नसीब में कभी नहीं आता यदि गुरू रविदास, सत्तगुरू कबीर जी, संत नामदेव आदि जैसे समाज सुधारक और बाबा साहिब जन्म पाकर संघर्ष न करते। फिर समाज के ठेकेदार कहते हैं मेरा देश महान्!

भारत पर आज 2 करोड़ आर्मी रखने में एक दिन का अरबों रूपयों का ख़र्चा है अगर आध्यात्म और आज के पाखण्डी महाराजों से ही सब हो जाए तो यह ख़र्चा बच कर ग़रीबों में नहीं लग सकता। आज कई शूद्रों का कहना है कि अब हालात अच्छे हैं उनको अपना अतीत ही भूल चुका किन्तु वे ही लोग जब घर से निकलते हैं तो वे अपनी जाति बदल लेते हैं और अपनी मां को स्वयं गाली देते है कि हम बड़ी जाति के हैं अर्थात् हमारी माँ ने हमें बड़ी जाति के मर्द से जन्मा है। यह कितना बड़ा अनर्थ कर रहें हैं। बन्धुओं हालात आज भी वैसे के वैसे ही बने हुए हैं किन्तु क्रिया के ढंग में बदलाब आया है।

  दिनेश कुमार शिक्षार्थी
गाँव-कण्ढारल
डाक-भरवाना वाया-पंचरूखी तह-पालमपुर
ज़िला-कांगडा हिमाचल प्रदेश- 176103
मो-09817185485
shiksharthidinesh@gmail.com
 
         
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