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आधुनिक समय में भी माहिलाओं के लिये ड्रेस कोड

प्रकाशन :बुधवार, 7 सितम्बर 2011
क्कीसवीं सदी मे भी माहिलाओं को अपने आत्मसम्मान के लिये लड़ना और प्रतिरोध करना पड़ता है।उनकी हर छोटी बड़ी गतिविधि पर निगाहे उठती है। जब लडकियाँ उच्च शिक्षा के लिये घर से बाहर निकलती हैं तो गाँव- शहर- महानगरो हर जगह कोई न कोई कठमुल्लाह संगठन युवा लडकियों के निजी हक पर कुठाराघात करने लगते है। इन प्रतिबंधों से सबसे ज्यादा आहत कॉलेज जाने वाली युवतियां होती हैं क्योंकि कॉलेज ही तो उनके युवा होते मन को नई उड़ान देता है। कालेज वह जगह है जहाँ नए पुराने परिधानों के साथ विभिन्न प्रयोगों को अंजाम दिया जाता है। लडकियों के लिये आज भी देर रात आना जाना संभव नहीं है। और दिल्ली जैसे महानगरों में तो युवतियों के प्रति होने वाले हादसों की खबरें मिलती रहती हैं। पुरुषो की सोच आज भी पुरातनपंथी है लडकियों के परिधानों के मामले में, उन्हे अक्सर यह कहते सुना जा सकता है कि लडकियाँ ऐसे छोटे कपडे पहनती ही क्यों है? पुरुषो का ध्यान तो उन पर जाएगा ही। और ये लडकियाँ खुद ही आमंत्रण देती है पुरुषो को आदि आदि। इस पुरातनपंथी विचारधारा का सीधा मतलब यह है कि पुरुष का नज़रिया तो हर तरह से सही है महिलाओं को ही अपने आचरण, अपने क्रिया कलापों और पहनने ओढने पर पाबंदी लगानी चाहिए। पर आज की युवतियाँ बोल्ड और आक्रामक तेवर लिये हुए हैं, वे अपने जीवन मे किसी तरह का सामाजिक या पारिवारिक दखल नहीं चाहती।

आज मध्यमवर्गीय परिवार भी अपनी बेटियों को दूर दराज के शहरों में पढने के लिये भेज रहे है। महिलाओ के प्रति सामाजिक बंधन कुछ हद तक ढीले पडे हैं। पर सच तो यह है की कपड़ो में नहीं पुरुष की सोच में गड़बड़ ही किसी महिला के लिये परेशानी का सबब बनती है। भरे पूरे कपड़ों में भी महिला किसी बुरे हादसे का शिकार हो सकती है और कम कपड़ो मे भी। महाभारत काल में द्रौपती की लम्बी साड़ी भी दुर्योधन की दुर्भावनापूर्ण भावना से उसे बचा नही सकी थी। आज भी महिलाओ को जिन्दा जलाया जाता है और डायन करार कर नंगा कर गाँव की गलियों मे घुमाया जाता है, कश्मीर के उग्रवादी तत्व और देश के कठमुल्लाह तत्व जब तब ऐसे फरमान लडकियों पर लादते रहते है। बिना किसी रोक टोक के लड़कियों का मानसिक विकास होना इस देश मे असंभव जान पड़ता है। यही हमारे सभ्य समाज का सच है।

पर अब तस्वीर बदलनी चाहिये

समाज बने बनाये ढर्रे पर ही चलता है। कोई कुछ भी कहने से घबराता है। पर कभी तो कही से आवाज आनी चाहिये और इस बार आवाज़ आई दिल्ली विश्व विद्यालय की उन्नीस वर्षीय उमंग सबरवाल की तरफ से। दिल्ली मे 31 जुलाई को होने वाली (Slut walk) अर्थात बेशर्मी मोर्चा की कमान उन्होंने ही सम्भाली थी । एक चिंगारी की तरह से फ़ैली इस मुहीम की हर और चर्चा है और लडकियां ख़ास कर युवा लडकियाँ इसे लेकर काफी उत्साहित है, वैसे तो यह भी कहा जाता है की इस तरह के मोर्चे सिर्फ संभ्रांत वर्ग की शोशेबाजी है, समाज के दूसरे तबके तक इसकी पहुँच नही है।और दिल्ली की उमंग सबरवाल का यह आन्दोलन एक सरसराहट बन गुजर जाएगा। पर सच तो यह है कि यह बेशर्मी मोर्चा स्त्री स्वाभिमान का एक अध्याय जोडने मे सक्षम तो होगा ही।

पश्चिम मे सल्ट वाक

1960 के दशक में नारीवाद का जब पुनर्जन्म हुआ तब महिलाओं के लिए खुद को पत्नी और माँ की पारंपरिक भूमिकाओं से आजाद कराने की मांग की और इसी मांग के तहत माहिलाओं द्वारा सार्वजनिक रूप से सड़को पर उतर कर अपनी-अपनी ब्रा जलाई गयी इस तरह महिला लिब एक शक्तिशाली आंदोलन बन कर उभरा। SlutWalk द्वारा विरोध प्रदर्शन मार्च टोरंटो ( कनाडा) में 3 अप्रैल, 2011 को शुरू हुआ जिसके परिणामस्वरूप दुनिया भर में रैलियों के एक आंदोलन के रूप मे सामने आया। टोरंटो जैसे संभ्रात शहर मे जब टोरंटो के एक पुलिस अधिकारी ने सुझाव दिया कि सुरक्षित रहने के लिए महिला को कामुक ड्रेसिंग से बचना चाहिए। इस टिप्पणी पर काफी शोर शराबा मचा और परिणाम स्वरुप Slutwalk का प्रदर्शन किया गया। इन माहिलाओं ने कम परिधानों में सड़क पर प्रदर्शन किया। जबकि भारत में यह प्रदर्शन गरिमापूर्ण तरिके से होना तय हुआ।

भारत में माहिलाओं के आन्दोलन

भारत मे सरोजिनी नायडू के नेतृत्व मे दांडी मार्च मे हजारो महिलाओं ने भाग लिया, समाज की जड़ व्यस्था मे हलचल लाने मे ये मार्च कोई विशेष क्रांतिकारी परिवर्तन लाने मे कारगार न भी हो सके पर इतना जरूर है कि इन पर एक बहस जरूर चल पड़ती है और टेलीविज़न से गली कुचों और घरो मे बहस चल पड़ती है जिसके केंद्र मे स्त्री होती है।

हम सबने अपने टी वी में देखा की गुजरात के भावनगर की एक महिला को अर्धनग्न अवस्था में अपने ससुराल वालो के खिलाफ सड़क पर प्रदर्शन करना पड़ा क्योंकी पुलिस वाले भी उस की शिकायत दर्ज नहीं कर रहे थे। पूजा चौहान के साथ अपने पति और ससुराल वालो की दहेज़ की मांग पर जब अर्धनगन अवस्था मे अपने ससुराल वालो के खिलाफ उसे सड़क पर उतरना पड़ा तब जाकर पुलिस वालो ने उसकी शिकायत दर्ज की। और इम्फाल (मणिपुर) मे संघीय सैनिकों द्वारा एक महिला थान्ग्जम मनोरमा नामक 32 वर्षीया महिला की संदिग्ध हिरासत मे बलात्कार और हत्या के विरोध में 40 महिलाओ ने असम रायफल्स बेस के बाहर नग्न परेड कर अपने गुस्से का प्रदर्शन किया। इस तरह के मोर्चे चाहे अच्छा या बुरा असर छोडे पर समाज मे इस तरह की जागरूकता जरूरी है की लड़कियों को खुद अपने विवेक पर काम करना चाहियें। अंशु मालवीय ने अपनी कविता ' मांस के झंडे 'में लिखा हैं,

अपने राष्ट्र से कहो घूरे हमें
अपनी राजनीति से कहो हमारा बलात्कार करे
अपनी सभ्यता से कहो
हमारा सिर कुचलकर जंगल मे फ़ेंक दे हमें
अपनी फौज से कहो
हमारी छोटी उंगलियाँ काटकर
स्टार की तरह टांक में वर्दी में
हम नंगे निकल आये हैं सड़क पर
अपने सवालों की तरह नंगे

  विपिन चौधरी
मकान न. 1008
हाउसिंग बोड कलोनी, सेक्टर 15-ए,
हिसार, हरियाणा-125001
vipin_c_2002@yahoo.com
 
         
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