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महिलाओ का श्रम किस गिनती में

प्रकाशन :सोमवार, 15 अगस्त 2011
मैं रोटी बेलती हूँ जैसे पृथ्वी,
ज्वालामुखी बेलते हैं पहाड़,
भूचाल बेलते हैं घर,
सन्नाटे शब्द बेलते हैं,
ज्वर-भाटे समुंदर।
रोज़ सुबह सूरज में
एक नया उचकुन लगाकर,
एक नई धाह फेंककर,
मैं रोटी बेलती हूँ जैसे पृथ्वी।
पृथ्वी–जो खुद एक लोई है,
सूरज के हाथों में,
रख दी गई है, पूरी की पूरी, सामने
कि लो, इसे बेलो, पकाओ,
जैसे मधुमक्खियाँ अपने पंखों की छाँह में,
पकाती हैं शहद।

नामिका की यह कविता 'चौका' एक स्त्री के रोज के काम जैसे रोटी बेलना को एक पूरी पृथ्वी की गोलाई मे समेट दे हैं। वह रोटी जिस से घर भर का पेट भरता है। ताज्जुब है इसके बाद भी माहिलाओं के श्रम को कही कोई गिनती नहीं और घर के दैनिक काम काज को कोई काम की श्रेणी मे ही रखने को तैयार नहीं।

घरेलु काम काज में महिलाएं

घर और बाहर के कामों में महिलाये ही आगे रहती है, चाहे वह शहरी महिलाये हो या गाँव मे रहने वाली महिलाएं। हमारे भारत मे खेती मे महिलाये जुटी रहती है इसके अलावा कई गाँवो मे पानी की भी समस्या है।

भारत के प्रायः सभी गाँवों की तरह हरियाणा की 80 प्रतिशत महिलाएँ खेती के कार्यो की सक्रिय भागीदार होती हैं तथा उनके घरेलुकार्य भी शहरी महिलाओं से काफी भिन्न होते हैं। यहाँ उनके घरेलू कार्यो में पानी लाना एवं ईंधन की जलाऊ लकड़ी लाना भी शामिल है। लगभग सभी महिलाएँ 12-13 वर्ष की अवस्था से अपने घर की आवश्यकतानुसार पानी लाने का काम करती हैं। पानी लाना उनका नियमित दैनिक काम होता है तथा महिलाएँ कम- से-कम 10 मीटर से लेकर अधिकतम 6.25 कि॰ मी॰ तक की दूरी पानी लाने में तय करती हैं। हरियाणा मे एक अध्ययन के अनुसार पानी लाने का काम महिलाओं ने सर्वाधिक कठिन काम की श्रेणी में रखा। कठिनाई सूचकांक पर भी पानी भरने का काम 59.3 प्रतिशत के साथ सबसे कठिन काम पाया गया।

इस अध्ययन में यह पाया गया कि पानी लाते वक्त महिलाएँ खाली बर्तन लेकर जिसका वजन औसतन 5.9 कि॰ ग्रा ॰ होता है (80प्रतिशत मिट्टी का घडा तथा 20 प्रतिशत पीतल का बर्तन इस्तेमाल होता है) सिर पर रखकर पानी के स्रोत तक जाती हैं तथा पानी भरकर जिसका औसतन 24.4 कि॰ग्रा॰ वजन (पानी एवँ खाली बर्तन का वजन) लेकर वापस आती हैं। गर्मियों में एक महिला औसतन 23 मटके पानी प्रतिदिन भरती है, इनमें 17 सुबह एवं 6 शाम के वक्त सिर पर ढोती हैं। इनमें खाना पकाने, पीने की आवश्यकता से लेकर पशुओं को पिलाने तथा नहलाने का पानी होता है। अध्ययन के अनुसार औसतन पानी का एक बतन लाने में 6 मिनट का समय लगता है। यानि घर का पूरा पानी भरने में महिला को 138मिनट समय खर्च करना होता है। इस पकार महिला एक वर्ष में 105 पानी लाने में खर्च करती है।

एक घङा पानी लाने में औसतन 0.25 कि॰ मी॰ की दूरी एक महिला तय करती है यानि घर का पानी लाने में महिला को 5.75 कि॰ मी॰प्रतिदिन चलना होता है। पानी भरने जाते वक्त महिला की चलने की गति 2.8 कि॰ मी॰ प्रति घंटा तथा वापसी में 3.5 कि॰ मी॰ प्रति घण्टा होती है। यह भी पाया गया कि शाम के वक्त पानी भरना अधिक मेहनत व कठिनाई भरा होता है। यह भी देखा गया है कि पानी भरने में महिलाओं को औसतन 40 बार मुड़ना पडा था। हैण्डपम्प से पानी भरते समय भी उन्हें बार-बार नीचे मुड़ना पड़ता है। 21-30 आयु वर्ग की महिलओं के लिऐ यह मुड़ना सामान्य अवस्था की अपेक्षा 1.7 प्रतिशत ज्यादा था तथा 31-40 आयु वर्ग की महिलाओं के लिए 7.3 प्रतिशत ज्यादा था। यद्यपि यह भी पाया गया कि इस दौरान कमर का मोड़ सकारात्मक रहा। दूसरी ओर यह भी है कि पानी लाने वाली महिलाओं की गर्दन एवं कमर में दर्द पाया गया। कंधो के जोड़, ऊपरी पीठ के हिस्से तथा हाथों के निचले हिस्से पर भी अधिक दर्द की शिकायत पाई गई।

(यह शोध कार्य हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में आई सी ऐ आर द्वारा चलाये जा रहे महिला सशक्तिकरण प्रोग्राम के तहत किया गया था )

उद्योग में महिलाओं का श्रम

भारत में बीडी रोलिंग एक ऐसा उद्योग है जिसमें 5 मिलियन से भी अधिक श्रमिक काम कर रहे हैं, उनमें से ज्यादातर महिलाएं इस रोजगार में है। बीडी तंबाकू से तैयार होती है इसलिए लंबे समय तक इस रोजगार को अपनाने वाली महिलाएं दमा, ब्रोंकाइटिस और टीबी की शिकार हो जाती हैं। बीड़ी का काम एक अनौपचारिक और असुरक्षित श्रम का काम है लेकिन गरीबी के कारण महिलाओं को इन्हें अपनाना पडता है। इसके अलावा बिहार की कोयला खदानों और सोने की खदानों मे हजारो की संख्या मे महिलाएं काम कर रही है। गाँव की बजाए शहर मे महिलाए ज्यादा नौकरी कर रही है अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन कई स्थानीय समूहों के साथ शामिल है, जो इस उद्योग में काम कर रही महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिये काम करते हैं और कम खतरनाक और बेहतर नौकरियों के लिये प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। आंकडे बताते हैं कि शहरी महिलाओं में रोजगार वृद्धि की दर तेजी से बढी है।

हाल ही में एनएसएसओ के बड़े नमूना रोजगार सर्वेक्षण से डेटा के लिए इस धारणा की पुष्टि प्रकट होता। 2004 के बाद शहरी महिला श्रमिकों की भागीदारी दर में वृद्धि हुई है, जबकि 1999-2000 में यह डाटा नीचे आ गया था। भारत महिलाओं (23%) कर्मचारियों, जापान (24%), तुर्की (26%) और ऑस्ट्रिया (29%) के बाद की सबसे कम प्रतिशत है, भूमंडलीकरण के युग में महिलाओं का रोज़गार के लिये घर से बहार निकलना जरूरी हो गया है। घरेलु और बहार की दुनिया दोनों मे उन्के दखल है पर घर के उनके काम काज को तरजीह न देकर केवल उनपर ही लाद देना सही नहीं है घर के सभी लोगों को आपस मे मिल बाँट कर घर के कामो मे हाथ बटाना होगा और महिलाओ को खुद आगे बढ़ कर आपने श्रम का मूल्य माँगना होगा और यह तभी हो सकता है की महिलाये घर की काम को केवल अपने हिस्से का काम काम न समझे क्योंकि घर तो सबका है।

  विपिन चौधरी
मकान न. 1008
हाउसिंग बोड कलोनी, सेक्टर 15-ए,
हिसार, हरियाणा-125001
vipin_c_2002@yahoo.com
 
         
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