संसार भर
मे स्त्री का जीवन कमोबेश एक सा ही दिखाई पड़ता है। देखने मे यह आता है की स्त्री लेखन की अभिव्यक्ती उस प्रदेश की उन्नती और विकास पर भी निर्भर करती है। दक्षिण में जहाँ साक्षरता दर सबसे अधिक है लोग सम्रद्ध हैं वहां घर परिवार और समाज इतना रूढ़ नहीं है। यह बात अलग है की जयादा छूट देने से वहाँ का विकसित समाज भी डरता है। विकसित प्रदेश जैसे पंजाब की स्त्री रचनाकार के लेखन मे भी प्रौढ़ता देखने को मिलती है।
उदहारण स्वरुप पंजाब की लेखिका निरुपमा दत्त, जो अपने बोल्ड लेखन के लिये जानी जाती है वे अपनी एक कविता बुरी लडकी मे लिखती है।
जब तुम मेरे शहर में आओगे
तो बुरी औरतों की फेरहिस्त में
मेरा नाम भी दर्ज पाओगे
मेरे पास है वह सब कुछ
जो एक बुरी औरत के पास होगा
मुँह मे जलती आग
धरकता दिल
थिरकते राग रग
हाथ मे चालकता जाम
मलयालम की कवियत्री सी वृंदा स्त्री के लिये रूढिगत बन्धनों को तोडने की वकालत करती हुये लिखती हैं
एक छाते के नीचे
बिना टकराये चलने की
जगह नहीं है
कानून, पाबंदियां, छाता
सब दूर फेंककर
गले लगाया मैने बारिश को
वही कश्मीर जहाँ आतकवाद का साया लम्बे अरसे से रहा है, किसी भी आपदा का सबसे गहरा असर महिलाओ पर ही पड़ता है। उस सख्त माहोल मे भी महिलाएं अपने भीतरी संघर्ष से जूझ रही होती हैं। वहां की कवियत्री नसीम सिफई लेखनी मे अपना वजूद तलाशती है इस नज़म में
समझ ले बात मेरी
न मे तेरे जैसी
न मैं तेरे खावब की छाप
मेरा अपना वजूद मेरी अपनी हस्ती
मुकाबले मे जो द
तो तुम भी पाओगे
की दौड़ तेरी अलग और मेरी अलग
कश्मीर मे लाल देह, रूपा भवानी, हब्बा खातून के रूप मे मध्यकालीन रहस्यवादी कवियत्रियों का काफी योगदान रहा है। बाद के दौर मे वहां चले आ रहे आतकवाद का साया काफी लम्बे अरसे से वहां तारी रहा । लेखन की दिशा मे पिछले दो दशकों में कश्मीरी माहिलाओं ने अपने काम को प्रकाशित किया है जिसमे नसीम सीफाई बिमला रैना, दरख्शां अंदराबी लेखन की नई लहर लेकर आई हैं।
तमिल साहित्य मे कुट्टी रेवती और प्रतिभा मुदलियार सबसे बोल्ड नाम हैं। 2002 मे जब पहली बार कुट्टी रेवती की लिखी स्तन नामक कविता प्रकाशित हुई थी तो रूढीवादी और पारंपरिक तमिल समाज मे काफी खलबली पैदा हुई थी।
छातियाँ
गीली नाम दलदली धरती मे उठते
बुलबले हैं
मैं विस्मित सी देखती बचकर
उनके होले होले उठते और खिलते उभार का
अपने युवा मौसम के कगार पर खडी
कुट्टी रेवती अपनी एक दूसरी कविता राक्षस में कहती हैं
बहन आओ
हम भी कुम्हार की तरह क्यों हा बनाए
स्तनों को और भी अधिक फैशनेबल
जिस शरीर को लेकर एक महिला को छुई मुई बने रहने पर मजबूर किया जाता है उसी छुईमुईपन से बाहर आने का साहस करने का आहवान करती है कुट्टी रेवती की ये कवितायेँ।
अपने अस्तित्व की सही पहचान बतलाती कवितायेँ
संसार भर की औरते जानना कहती हैं की उनकी जगह क्या है इस जीवन मंे, क्या सिर्फ बच्चे को जन्म देना ही ? ओडिया कवियत्री प्रतिभा सत्पथी स्त्री की अस्तित्व पर सवाल करते हुए पूछती हैं
वह अपनी पति की हर रोज़ की जरुरत थी
सही मायनों मे एक बैड कवर
बच्चो की पढ़ाई पर उसकी देह लुढ़क जाती
पसीने से लथपथ
उसका समय बीतता
उनकी मेज़ पर
बनाते पेंसिल से चित्र
वही आदिवासी कवियत्री निर्मला पुतुल जो अपने अनुभवों से पूरे संसार को अपने और अपने लोगों के सच को बतलाती है
क्या हुँ मे तुम्हारे लिये
एक तकिया
क्या हुँ में तुम्हारे लिये
एक तकिया
कि कही से थका मंदा आया और सिर टिका दिया
गुजराती कवियत्री पन्ना नायक स्त्री मुक्ती को अपने अंदाज़ मे दर्ज करती हैं
दो पैरों मे से
कौन सा एक पैर
खोलते पानी मे रखू
और कौन सा जमी हुई बर्फ पर
यह निर्णय लेने का अधिकार
यानि स्त्री मुक्ती
बेटी बेटा के जन्म पर सामाजिक विरोधाभायास
मलयालम की कवियत्री आशा लता एक लडकी के जन्म पर होने सामाजिक विरोधाभायास पर लिखती हैं
अजन्मी बेटी की कुंडली मे शनि और राहू रेंगते
न जाने कितने और पापग्रह
अजन्मी बेटी की कुंडली मे बेघर माँ
जिसके सपने सपने नहीं होते
तीसरी आँख को खोलकर
नदियों को सोखने वाला बेहराम पिता
मलयालम की ही एक दूसरी कवियत्री इंदिरा अशोक बेटी को समर्पित करते हुए लिखती हैं
तेरे इस स्वपन को फिर से
बेटी नाम से अभिभित करने से
डरती हमें
कहाँ छुपाऊ
इन गिद्ध नज़रों से में अपनी बेटी
प्रशिद्ध बंगला लेखिका तसलीमा नसरीन लडकी के इस बचपन पर लिखती हैं
चुनकी यह जन्म ले चुकी है
उससे अपने घर के किस्सी अंधियारे कोने में
पडे पडे
जिन्दा रहने की आदत सीखने दो
कन्नड़ की कवियत्री प्रतिभा नंदकुमार कहती है
मे एक मुहर हूँ
अंतिम बाज़ी की तरह खेला है मुझे
या मेरी कोख खरीदी है
उन मालिकों ने जो निर्णय लेते हैं
बेटियों कोतो यु भी बह जाना होगा
मैं मरी हुँ पहले भी
पर अजन्मे बच्चे के हाथ नहीं
दलित कवियत्री उर्मिला पवार भी यही सवाल करती है इस पुरुष प्रधान समाज से
हे कवि
आप तो हो आये मुक्त ऐसी कवितायेँ लेख कर
पुरुष होकर
ऐसी कवितायेँ लेखनी पर पाए खूब पुरूस्कार
लेकिन यह कवि
स्त्री होने के चलते ला खड़ा किया मुझे आपने
उसी युद्ध भूमि पर
घायल होने और जानने की खातिर
नागालैंड की कवियत्री मोनालिसा चंगिज़ा लिखती हैं
एक पिटी हुई पत्नी
जीवित प्रमाण है
पुरुष की
कमजोरी और हीनता के दर का
जिससे वह पिर्तसता के समाज मे
मर्दानगी के मुखौटे मे छिपाए रखता है
हिंदी पट्टी के अलावा सारे देश मे महिला लेखन इस कदर सक्रिय है कि वह समाज को एक नई दिशा देने का काम कर रहा है। यक़ीनन आने वाले समय अनगिनत कवियत्रियाँ देश दुनिया को अपनी सशक्त लेखनी सराबोर कर देंगी। पर आज जरुरत है नई स्त्री रचनाकारों को प्रोत्साहन देने की जिससे आज स्कूल कालेजों मे नई पोध उभर कर सामने आ सकेगी।


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