जब
समाज के उतार-चढ़ाव इस हद तक परेशान कर रहे हों कि सामान्य जनमानस उसकी आंच में तप रहा हो, तो कवि जैसा संवेदनशील जीव कैसे अछूता रह सकता है। अपनी ताजातरीन कविता ‘प्रेम के लिए फांसी’ (आनर किलिंग) में अनामिका लिखती हैं-
‘प्रेम के लिए फांसी
पी गई मीरा हांसी
जो जहर का प्याला
चलो, गनीमत है कि
देवर ने भेजा था
उसके भाईयों ने नहीं
भाई भी भेज रहे हैं इन दिनों जहर के प्याले’
इस कविता का व्यंग्य इशारा करता है आज के पिता व भाईयों पर, जो सरेआम अपनी बहन, बेटियों की हत्या कर रहे हैं। तर्क है कि उन्होंने सामाजिक मान्यताओं से परे जाकर अपनी पसंद से अपना जीवनसाथी चुना है।
आज के इस तथाकथित उदारवादी दौर में हर चीज़ को सभ्यता का जामा पहना कर पेश किया जा रहा है, यहां तक कि ‘हत्या’ को भी।
कुछ लोगों को अपना सामाजिक रूतबा बचाने के लिए ‘हत्या’ अंतिम विकल्प दिखाई देता है। इस से यह लगता है कि महज आर्थिक उन्नति ही पुरातन सामन्ती दृष्टिकोण को नहीं बदल सकती। देश के जिन इलाकों में आर्थिक उन्नति का ग्राफ बढ़ा है वहीं इस तरह की विकृतियां नजर आयी हैं। मसलन हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का इलाका। शिक्षा का स्तर भी इन इलाकों में बढ़ा है, बावजूद इसके स्त्री-पुरुष अनुपात सबसे असंतुलित यहींपर है। गांवों में लड़कों की बजाय स्कूल-कालेज में जाने वाली लड़कियांे की संख्या अधिक है पर जल्दी ही विवाह की बेडि़यां लड़कियांे के पैरों में डाल दी जाती हैं फिर ससुराल पक्ष उन पर हावी हो जाता है और लड़कियां। अपनी उन्नति के लिए व्यापक कदम नहीं उठा पातीं।
खाप पंचायतों का इतिहास
(सीयूएनआई) के काउन्सलर मैथ्यू जोलडस्टीन प्राचीन रोम में सम्मान के लिए हत्याओं का जिक्र करते हैं, जहां उन पुरुषों को यह सजा मिलती थी जो अपने परिवार की व्याभिचारी महिलाओं के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं करते थे। भारत में खासकर पश्चिम बंगाल में सम्मान के नाम पर हत्याएं एक सदी पहले से ही बंद हो चुकी हैं। इस विकृत प्रथा को रोकने के प्रयास में स्वामी विवेकानन्द, विद्यासागर, राजा राम मोहन राय और रामाकृष्णा आगे आये तब जाकर यह प्रथा बंद हुई।
खाप पंचायतों ने 1887 के स्वतंत्रता आंदोलन में उल्लेखनीय भूमिका निभाई थी। किसी विवाद का निपटारा भाईचारे और आपसी सहयोग से होता था पर समय के साथ-साथ इसमें विकृति आती गई। सर्वेक्षण के अनुसार समूचे भारत में हर साल सम्मान के नाम पर लगभग एक हजार हत्याएं की जाती हैं। इसमें से 900 हत्याएं, हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में होती हैं। इन खाप पंचायतों में दबंग (अक्खड़) पुरुषांे का दबदबा होता है और आधी आबादी की उपस्थिति यहां गैर मौजूद है।
1911 में सोनीपत जिले के बरौना गांव में खाप पंचायत की बैठक हुई, जिसमें महिलाओं को भाग लेने की मनाही की घोषणा की गई। तभी से यह निर्देष समाजिक आदर्श बन गया। ये लोग सुप्रीम कोर्ट को अपने आगे महत्व नहीं देते और अपने तुगलकी फरमानों के बल पर फलते-फूलते रहते हैं। नेता लोग अपने वोट बैंक के डर के मारे इनसे बच कर चलते हैं। पाकिस्तान में लगभग 245 महिलाओं और 137 पुरुषों को मौत के घाट उतार दिया गया। यह सब किया गया ‘कारो-कारी’ के नाम पर जिस तरह हमारे देश में हत्या के जघन्य कृत्य को ‘इज्ज्त’ के नाम पर हत्या का नाम दिया जाता है। ‘कारो-कारी’ यानी गैर पुरुष और गैर स्त्री के साथ संबंध बनाना। हमारे मासूम प्रेम को भी समाज की तिरछी नजर लग जाती है और उन्हें अपने संबंधियों द्वारा ही मौत के घाट उतार दिया जाता है। इजिप्ट, लेबनान, तुर्की, यमन, मोरक्को और परसिन गल्फ देशों में भी सम्मान के नाम पर सजा के रूप में मौत का फरमान जारी किया जाता रहा है।
समाज का बड़ा धड़ा इन हत्याओं को गलत मानता है तो कुछ लोग मां-बाप की मर्जी के खिलाफ जाकर की जानी वाली सजा चाहे वह मौत ही क्यों न हो, जायज मानते हैं। वहीं कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी भी इस पर लचीला रवैया अपनाते हुए सगोत्र विवाह होने से आनुवांशिक दुष्परिणाम का हवाला देते हुए कहते हैं कि दजदीकी रिश्तेदारों में विवाह होने से बच्चों पर घातक परिणाम हो सकता है। वहीं सरकार जनता की नाराजगी पर एक बार तो कुछ ठोस करने का आश्वासन देती है और मामला शांत होने पर अपने निर्णय से पीछे हट जाती है।
कई बार तो शादीशुदा जोड़ों में सजातीय गोत्र का पता चलने पर उन्हें भाई-बहन बन जाने का फरमान जारी करती हैं ये पंचायतें। उन्हें उनके बच्चे की परवरिश से कोई सरोकार नहीं होता। दरअसल ये खाप पंचायतें पितृसत्ता और रूढि़वाद का ही दूसरा रूप है। गांव-गुहांढ के दूसरे सामाजिक व कल्याणकारी मामलों को दरकिनार कर इज्जत की पैरवी करते ये नजर आते हैं और ‘परम्परा, मर्यादा, इज्जत’ की दुहाई देने में ये आगे रहते हैं।
हिंदू विवाह अधिनियम में सगोत्र विवाह गैर कानूनी नहीं है आज जब हम विश्व भर में मानवता के प्रचार-प्रसार में लगे हैं, तब इस तरह की रूढ़ीगत पंचायतें इंसानियत और मानवीयता के साफ और सच्चे स्वरूप को दूषित करती हैं। समाज के चारों ओर से इनका बहिष्कार होना चाहिए ताकि प्रेम, प्रेम ही रहे एक डर की भावना न धारण कर सके, हमारे मासूम नौनिहालों के मन में।


![Validate my Atom 1.0 feed [Valid Atom 1.0]](valid-atom.png)